जन-जन के हृदय में रहेंगे मुनि तरुण सागर

जन-जन के हृदय में रहेंगे मुनि तरुण सागर

Ashok Singh Rajpurohit | Publish: Sep, 02 2018 05:56:01 PM (IST) Chennai, Tamil Nadu, India

दीक्षा दिलाने वाले गुरु आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा

चेन्नई. मुनि तरुण सागर किसी व्यक्ति विशेष नहीं बल्कि समष्टि के संत थे। वे सम्प्रदायवाद से पूरी तरह मुक्त थे। उनके लिए सभी एक समान थे। उनके मन में कोई छोटा या बड़ा नहीं था। यह कहना था आचार्य पुष्पदंत सागर का मुनि तरुणसागर के देवलोक गमन पर जो कि उनके गुरु थे। आचार्य ने कहा मुनि तरुण सागर दूरदृष्टा, प्रतिभाशाली एवं कला पारखी थे। वे ज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी थे और जो भी बोलते थे स्पष्ट बोलते थे। उनको कोई धनपति खरीद नहीं सका। आज भले उन्होंने शरीर छोड़ दिया लेकिन वे गए नहीं बल्कि जन-जन के हृदय में हमेशा रहेंगे।

गिल्ली-डंडा खेलता बालक

मुनि तरुण सागर के दीक्षा लेने के बारे में आचार्य ने बताया कि वर्ष १९८० में मैं विहार करते हुए दमोह जिले के गोची गांव में रुका जहां प्रवचन के दौरान मैंने जब कहा कि तुम भी परमात्मा बन सकते हो, तुम्हें परमात्मा बनने से किसने रोका है? उस समय एक बालक जो आठवीं कक्षा में पढ़ता था, वहां गिल्ली-डंडा खेल रहा था मेरे पास आया और पूछा क्या मैं परमात्मा बन सकता हूं? इस पर मैंने कहा जरूर। उसने कहा कैसे? तो मैंने कहा मेरे साथ चलो मैं तुम्हें कला सिखाऊंगा। यह सुनते ही वह मेरे साथ हो चलने को तैयार हो गया।
इसके लिए उसके माता-पिता ने भी हामी भर दी। करीब १५ दिन बाद गुरु ने उसे सामायिक सिखाकर संत के नियम समझाए और साथ ध्यान-साधना सिखा दी। एक साल बाद उसने साधु बनने की इच्छा जताई तो उसे क्षुल्लक दीक्षा दे दी। धीरे-धीरे उनका अध्ययन बढ़ता गई। १९८८ में उसे बागीदोरा में मुनि दीक्षा दे दी गया। उसके बाद उनकी लोकप्रियता बढ़ती गई और लोग उनको सुनने को लालायित होने लगे। लगातार उनकी प्रतिभा में निखार आता गया और आगे बढ़ते चले गए। १९९० में उनको धर्म प्रभावना के लिए अलग कर दिया। तब से लगातार उनकी प्रतिभा सूर्य के प्रकाश की तरह बढ़ती ही चली गई।
आचार्य ने कहा वे शुरू से ही प्रतिभाशाली थे। मैं उनको दूज का चांद समझता था। वे शुरू में ही समझ गए थे कि वह आगे चलकर पूर्णिमा का चांद बनेगा। आज वे जन-जन के चांद बन गए जो कभी अस्त नहीं होने वाला।
उनकी प्रतिभा एवं प्रवचन के प्रभाव का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके प्रवचन सुनने के लिए सब्जी विक्रेता से लेकर मॉल चलाने वाले तक काम छोड़कर आते थे।
आचार्य ने बताया कि वे किसी भी विषय को खिलौने की तरह यानी साधारण बनाकर पेश करते थे अर्थात श्रोताओं को चॉकलेट का नाम देकर रसगुल्ले का स्वाद देते थे। उनकी कड़क आवाज में भी मिठास था। उनको जो भी देना था वह किसी व्यक्ति विशेष को नहीं आमजन को दिया।
किसी के सामने झुकना नहीं सीखा और हमेशा सत्य के लिए लड़ते रहे। देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री ही नहीं अनेक बड़े-बड़े राजनेता तक उनके पास आते थे वे किसी के पास नहीं जाते थे। उनके आदर्श एवं संदेश श्रद्धालुओं को हमेशा मार्ग दिखाएगा।

मैं करूंगा उनकी भरपाई...

आचार्य पुष्पदंत सागर के पास दर्शनार्थ मुम्बई से आए गणपत जैन के पुत्र आर्यन जो कि सवेरे मुनि तरुण सागर के देहावसान की खबर सुनने के बाद से ही आंसू बहा रहा है ने कहा उनके जाने से पूरे जैन समाज को बहुत नुकसान हुआ है। उनकी क्षतिपूर्ति दीक्षा लेकर मैं करूंगा, मैं बनूंगा छोटा तरुण सागर। आर्यन अभी आठवीं कक्षा में पढ़ रहा है। उसके पिता ने दीक्षा के बारे में सहमति देते हुए कहा अभी हम इसे पढ़ाना चाहते हैं। जब यह समझदार हो जाएगा उसके बाद दीक्षा ले लेगा।

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