पुरुषार्थ से बड़ा आदमी का कोई मित्र व बंधु नहीं

माधवरम में जैन तेरापंथ नगर स्थित महाश्रमण सभागार में आचार्य महाश्रमण ने कहा आदमी पुरुषार्थ तो करता है, किन्तु पुरुषार्थ की भी एक सीमा है। पुरुषार्थ से सबकुछ प्राप्त नहीं किया जा सकता। शास्त्र में छह बाते ऐसी बताई गई है जिनमें कोई पुरुषार्थ अथवा पराक्रम कार्य नहीं कर सकता। इनमें पहली बात है कि कोई यह सोचे कि मैं पुरुषार्थ से जीव को अजीव बना दूं, ऐसा नहीं हो सकता।

By: मुकेश शर्मा

Published: 15 Nov 2018, 11:59 PM IST

चेन्नई।माधवरम में जैन तेरापंथ नगर स्थित महाश्रमण सभागार में आचार्य महाश्रमण ने कहा आदमी पुरुषार्थ तो करता है, किन्तु पुरुषार्थ की भी एक सीमा है। पुरुषार्थ से सबकुछ प्राप्त नहीं किया जा सकता। शास्त्र में छह बाते ऐसी बताई गई है जिनमें कोई पुरुषार्थ अथवा पराक्रम कार्य नहीं कर सकता। इनमें पहली बात है कि कोई यह सोचे कि मैं पुरुषार्थ से जीव को अजीव बना दूं, ऐसा नहीं हो सकता। जीव को अजीव तो स्वयं तीर्थंकर और चक्रवर्ती भी नहीं कर सकते। दूसरी बात बताई गई कि कोई कहे मैं अजीव को जीव बना दूंगा।

कोई कहे पुस्तक को जीव बना दूं तो ऐसा असंभव है। तीसरी बात बताई गई कि एक समय में दो भाषाएं नहीं बोली जा सकती। इसमें कोई पुरुषार्थ काम नहीं आ सकता। चौथी बात है कि आदमी अपने किए हुए कर्मों का फल स्वेच्छानुसार भोगना सोचे कि इस कर्म का फल मैं अभी नहीं भोगूंगा तो ऐसा कर पाना भी असंभव है। इसमें कोई कितना भी पुरुषार्थी हो, उसका पुरुषार्थ काम नहीं कर सकता। पांचवीं बात बताई गई कि कोई परमाणु को टुकड़े करने अथवा उसे जलाने, छेदने और काटने की बात करे तो वह भी असंभव ही है। परमाणु सबसे छोटी इकाई होती है, जिसे न जलाया जा सकता है, न काटा जा सकता है न भेदा जा सकता है। कोई कह दे कि मैं अलोकाकाश में गति करूंगा, यह भी असंभव है। शास्त्र में यह छठी बात बताई गई है कि कोई अलोकाकाश में गति कर ही नहीं सकता।

और तो क्या, वर्तमान में तो चलकर महाविदेह क्षेत्र में भी नहीं जा सकता। इसी प्रकार अनेक बातें और हो सकती हैं, जो असंभव होती हैं। संसारी अवस्था में जन्म लेने वाले की मृत्यु निश्चित है, इसमें किसी का पुरुषार्थ कार्य नहीं कर सकता। संभव की इस दुनिया में आदमी को सत्पुरुषार्थ और विवेकपूर्ण पुरुषार्थ करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को भाग्य के भरोसे नहीं बैठना चाहिए। पुरुषार्थ से बड़ा आदमी का कोई मित्र, बंधु नहीं हो सकता। इसलिए आदमी को अपने जीवन में सत्पुरुषार्थ करने का प्रयास करना चाहिए। इस दौरान जैन विश्व भारती के पूर्व अध्यक्ष धर्मचंद लूंकड़ व रमेशचंद बोहरा ने जैन विश्व भारती द्वारा प्रकाशित नवीन ग्रंथ ‘पंचकल्प सभाष्य’ को लोकार्पित किया। ग्रंथ की संपादक/अनुवादक समणी कुसुमप्रज्ञा ने विचार व्यक्त किए।

मनुष्य भव को न करें बेकार

साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा परमात्मा की दिव्य वाणी सुनने का मौका मनुष्य भव में मिलना बहुत बड़ी बात है। मनुष्य भव के अलावा ऐसा मौका और किसी को नहीं मिलता है। देवगति को अगर परमात्मा का सानिध्य प्राप्त भी हो जाए तो भी आत्मा की निर्जरा नहीं कर सकते। यह सौभाग्य सिर्फ मनुष्य भव को ही मिला है। देवता भी मनुष्य जीवन पाने की इच्छा रखते है ताकि परमात्मा की वाणी से जीवन को सफल बना सके, लेकिन इस अवसर को खोकर मानव मुर्खता का कार्य कर रहा है।

जिस भव को पाने के लिए देवता परेशान होते है, वह भव मानव जीवन को आसानी से मिल गया है। उसका उपयोग नहीं किया जा रहा है। जीवन को सफल बनाने के लिए मनुष्य को इस अवसर का लाभ उठा लेना चाहिए। एक बार समय जाने पर पश्चाताप करने से भी कुछ हासिल नहीं होगा। आंखों की शोभा देवगुरु के दर्शन से ही बढ़ती है। ज्ञानी कहते हैं कि इन आंखों के अंदर मनुष्य चाहे जितना कुछ कर ले लेकिन इनकी शोभा तो गुरु दर्शन से ही पूरी होगी। जीवन के अंदर धर्म का विकास होने के बाद आत्मा सर्वोच्च गुण प्राप्त करती है। ऐसा उत्तम कार्य जब भी करने का मौका मिले तो पीछे नहीं हटना चाहिए। सागरमुनि ने कहा आत्मा के हित के लिए मनुष्य को आचरण करना चाहिए। आचरण के मार्ग पर चल कर जीवन में बदलाव किया जा सकता है।

धर्म के कार्यो से खुद को जोड़ कर मनुष्य अपने कर्मो की निर्जरा कर ऊपर जा सकता है। प्रवचन सुनने से कुछ नहीं मिलता बल्कि कहे गए बातों का अनुसरण करने से जीवन सफल बनता है। इस मौके पर संघ के अध्यक्ष आनंमल छल्लाणी के अलावा अन्य पदाधिकारी उपस्थित थे। मंत्री मंगलचंद खारीवाल ने संचालन किया।

मुकेश शर्मा Reporting
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