ऑनलाइन कक्षाओं से सिरदर्द व तनाव से ग्रसित हो रहे बच्चे

लॉकडाउन के दौर में शुरू हुई ऑनलाइन कक्षाओं को लेकर सभी एकमत नजर नहीं आ रहे हैं। इनके पक्ष में अब कई शिक्षक व अभिभावक भी नहीं हैं। कई निजी स्कूलों के शिक्षकों का कहना है कि इससे शिक्षक व छात्रों के शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ रहा है।

By: Ashok Rajpurohit

Published: 29 Jun 2020, 10:01 PM IST

चेन्नई. लॉकडाउन के दौर में शुरू हुई ऑनलाइन कक्षाओं को लेकर सभी एकमत नजर नहीं आ रहे हैं। इनके पक्ष में अब कई शिक्षक व अभिभावक भी नहीं हैं। कई निजी स्कूलों के शिक्षकों का कहना है कि इससे शिक्षक व छात्रों के शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ रहा है। लंबा समय स्क्रीन पर बिताने से छात्र आंखों व सिरदर्द के साथ ही तनाव व से ग्रस्त रहने लगे हैं। साथ ही हैडसेट लगाए रहने से सुनने की समस्या भी पैदा हो रही है।
शिक्षाविदों का मानना है कि सरकारी स्कूल के छात्र भी ऑनलाइन कक्षा में खुद को असहज महसूस कर रहे हैं। उनका ब्रॉडबैंड कनेक्शन व अन्य उपकरण खरीदना भी किसी समस्या से कम नहीं है। चेन्नई के ही एक शिक्षक का कहना था कि अभिभावकों से लैपटॉप व फोन खरीदने को कहा जा रहा है जो उनके समक्ष नई परेशानी हो गई है। जिन परिवारों में अधिक बच्चे हैं उनमें एक सिस्टम पर काम करना भी काफी मुश्किलभरा काम है। तमिलनाडु नर्सरी, प्राइमरी, मैट्रिकुलेशन व हायर सेकण्डरी स्कूल्स वेलफेयर एसोसिएशन के एक पदाधिकारी कहते हैं, हमारे यहां सभी छात्रों की समानता के लिए समचीर कल्वी (समान पाठ्यक्रम) लागू किया गया है। अभी कुछ स्कूल ऑनलाइन कक्षाएं लगा रहे हैं और ऐसे में सभी को समान शिक्षा का अधिकार नहीं मिल रहा है।
साइबर अपराध में बढ़ोतरी
पुलिस का कहना है कि इन दिनों साइबर अपराध में यकायक बढ़ोतरी हो गई है। ऐसे में बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखना जरूरी है। साइबर बुलिंग व हैकिंग के कई मामले सामने आने लगे हैं। उत्तप्रदेश में ऐसा ही एक मामला सामने आया जहां आनलाइन कक्षा के दौरान एक शिक्षक के खिलाफ अश्लील सामग्री पोस्ट कर दी गई। एक अन्य शिक्षक का कहना था कि जूम कक्षा शुरू करने में शुरू से ही डर लग रहा था। करीब एक महीने तक इस बारे में चर्चा की और आखिर में कोई अन्य ऐप न होने पर जूम ऐप से ही कक्षाएं लगाई गई। या फिर जूम ऐप के माध्यम से कक्षा का विडियो रिकॉर्डिंग कर उसे यूट्यूब पर अपलोड कर सकते हैं। यह साझा किया वीडियो वे अभिभावकों की निगरानी में देख सकते हैं। इससे छात्र कक्षाओं को भी समझ सकेंगे तथा उनकी निगरानी भी रह सकेगी। हालांकि कई जगह इस तरह से पढ़ाई की व्यवस्था भी शुरू की गई है।
शुल्क के लिए न डालें दबाव
एक शिक्षक का कहना था कि हम भी जूम कक्षा लेने के पक्ष में नहीं हैं। यदि सरकार ऋण मुहैया करवाए तो कई शिक्षक इस तरह की कक्षा में रुचि नहीं दिखाएंगे। कई निजी स्कूल शिक्षकों को समय पर वेतन देना चाहते हैं लेकिन इस समय हालात विकट हो चले हैं। निजी स्कूलों की आय का मुख्य साधन फीस ही है। फीस का समय पर भुगतान कम हो रहा है। अभिभावकों की भी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। सरकार की ओर से शुल्क के लिए किसी तरह का कोई दबाव नहीं देने के निर्देश के बाद से निजी स्कूल मालिकों की चिंता और बढ़ गई है। एक शिक्षक का कहना था कि निजी स्कूल केवल इसलिए आनलाइन कक्षा चला रहे हैं ताकि उस स्कूल की इमेज बनी रहे।
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स्वरोजगार विषयक पैतृक कौशल पर हो प्रशिक्षण
मेरे ख्याल में स्कूली छात्रों के लिए चलाई जाने वाली ऑनलाइन कक्षाएं छात्र-छात्राओं विशेषकर प्राथमिक कक्षा के लिए अनुपयोगी ही नहीं बल्कि उनके शारीरिक एवं मानसिक विकास में बाधक साबित होगी। इस क्षति के अनुपात में इन कक्षाओं से होने वाला लाभ बहुत कम या न के बराबर होगा। ऑनलाइन कक्षाओं में जो बातें सिखाई जा रही हैं, वे केवल शहरी परिवेश में ही काम करेंगी -जहां के अधिकांश अभिभावक इतने तो पढ़े लिखे होंगे ही कि किताब देखकर अपने बच्चों को स्वयं ही पढ़ा लें। लगातार यंत्रों के साथ जब बच्चे जूझते रहेंगे तो उस समय भी तो अभिभावकों को ही उनके साथ लगे रहना पड़ेगा। उससे अच्छा ख़ुद पढ़ाएं। उनके साथ ज्यादा समय बिताएं व नैतिक बातें सिखाएं। इससे उनका आपसी स्नेह भी प्रगाढ़ होगा और हानिकारक यंत्रों के तनाव से भी मुक्ति मिलेगी। जिन परिवारों में सभी इतने पढ़े लिखे नहीं हैं कि बच्चों को खुद पढ़ा सकें, मैं समझती हूं उनके लिए तो ऑनलाइन कक्षाओं से जुडऩा वैसे भी टेढ़ी खीर साबित होगा। इससे तो बच्चों में पिछड़ जाने का भय और बढ़ेगा। जिन जगहों पर तकनीकी सुविधा उपलब्ध नहीं है, वहां तो ये ऑनलाइन कक्षाएँ वैसे भी अंधे को आईना दिखाकर चिढ़ाने जैसी ही साबित होंगी। इससे समाज में विषमता बढ़ेगी। अभिजात्य दर्प और ज्यादा बढ़ेगा। महामारी का दौर गुजरने के बाद यह विषमता एक बड़ी चुनौती के रूप में हमारे सामने आ खड़ी होगी। इसीलिए मेरा सुझाव है कि भारतीय परिवेश में स्कूली बच्चों के लिए नियमित ऑनलाइन कक्षाओं का विचार त्यागकर स्वाध्याय, शारीरिक श्रम के अभ्यास, स्वरोजगार विषयक पैतृक कौशल के प्रशिक्षण और संस्कार संवर्धन आदि पर बल देना चाहिए।
-डा. सुधा त्रिवेदी, सहायक प्रोफेसर, एमओपी वैष्णव महाविद्यालय, चेन्नई
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Ashok Rajpurohit
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