बुरे कर्मों से बचने से ही होगा जीवन सुखमय

आचार्य महाश्रमण का कारवां मदुरावायल स्थित वेलम्माल विद्यालय से मंगलवार सवेरे प्रस्थान कर श्रीपेरम्बुदूर स्थित सविता यूनिवर्सिटी पहुंचे। यहां...

By: मुकेश शर्मा

Published: 30 Dec 2018, 10:49 PM IST

चेन्नई।आचार्य महाश्रमण का कारवां मदुरावायल स्थित वेलम्माल विद्यालय से मंगलवार सवेरे प्रस्थान कर श्रीपेरम्बुदूर स्थित सविता यूनिवर्सिटी पहुंचे। यहां यूनिवर्सिटी प्रबंधन के पदाधिकारियों, शिक्षकों ने उनकी अगवानी की। छात्राओं व शिक्षिकाओं ने पारंपरिक विधि के अनुसार हाथ में कलश लेकर दक्षिण भारतीय पारंपरिक वाद्य यंत्रों की मंगल ध्वनि के साथ आचार्य का स्वागत किया।

यहां आयोजित धर्मसभा में आचार्य ने कहा दुनिया में दो प्रकार की विचारधाराएं प्रचलित हैं- आस्तिक और नास्तिक। आस्तिक विचारधारा के अनुसार आत्मा और शरीर दो अलग-अलग चीजें हैं। आत्मा शरीर में निवास करने वाला तत्व है जो स्थाई है। उसे न काटा जा सकता है न जलाया जा सकता है, न गीला किया जा सकता है और न ही सुखाया जा सकता है। आत्मा अमर एवं स्थाई है। वह एक शरीर को छोड़ कर उसी प्रकार नया शरीर धारण कर लेती है जिस प्रकार आदमी पुराने वस्त्रों का त्याग कर नया वस्त्र धारण कर लेता है। शरीर नश्वर व शरीर विनाशधर्मा है। शरीर के टुकड़े किए जा सकते हैं, इसे जलाया एवं भिगोया व सुखाया जा सकता है। इसी तरह आस्तिक विचारधारा पुनर्जन्म और पूर्वजन्म में विश्वास रखती है।

आदमी सुख.दु:ख अपने कर्मानुसार भोगता है क्योंकि कर्म कर्ता का अनुगमन करता है। आदमी द्वारा अपने कर्मों का फल स्वयं ही भोगना होता है। कभी आत्मा कर्मों का फल भोगने के पश्चात् मोक्ष प्राप्त कर जन्म मरण के बन्धन से मुक्त हो सकती है।

आदमी को आस्तिक बनने व अच्छे कर्म करने का प्रयास करना चाहिए। अच्छे कर्मों के माध्यम इस और अगले जीवन में भी सुख और शांति रह सकती है।

जिनवाणी को अमृतवाणी के समान पीता है सच्चा श्रोता

अरिहंत शिव अपार्टमेंट में विराजित मुनि संयमरत्न विजय व भुवनरत्न विजय ने कहा कुछ श्रोता एक कान से सुनता है और दूसरे कान से निकाल देता है। कुछ कान से सुनकर मुंह से निकाल देते हैं। कुछ ही लोग ऐसे होते हैं जो कान से सुनकर जिनवाणी को हृदय में उतार लेते हैं। सच्चा श्रोता वही है, जो जिनवाणी को अमृतवाणी के समान पीता है। महापुरुषों का आचरण ही हमें सदाचरण की ओर ले जाता है। आत्मा के आधार पर ही आध्यात्मिक धर्म टिका हुआ है। आत्मा है तो धर्म है। शरीर के मरणधर्मा होने पर भी हम शरीर का ध्यान रखते हैं, शरीर को भोजन देते हैं, इसकी चिकित्सा कराते हैं। आत्मा तो शाश्वत, अजर-अमर, निराकार है।

आत्मा एक ऐसा तत्व है जिसे शस्त्र छेद नहीं सकता, आग जला नहीं सकती, पानी गला नहीं सकता और न ही हवा उसे सुखा सकती है। इसका न जन्म है और न ही मरण, न आरंभ है और न ही अंत। आत्मा नित्य-शाश्वत है। शरीर के नष्ट होने पर भी आत्मा कभी नष्ट नहीं होती। आत्मा के सूक्ष्म होने की वजह से हम इंद्रियों से उसे देख नहीं सकते। आत्मा नाम का तत्व सभी प्राणियों में समान रूप से विद्यमान रहता है।


वस्त्रों के पुराने हो जाने पर जिस तरह व्यक्ति नये वस्त्र धारण कर लेता है, उसी तरह आत्मा भी शरीर के जीर्ण हो जाने पर एक शरीर को छोडक़र दूसरा शरीर धारण कर लेती है। देह बदलती है, पर आत्मा अमर रहती है। आत्मा न तो मरती है और न ही किसी को मारती है। आत्मा और शरीर अलग है। मुनिद्वय 28 व 29 नवंबर को राजेन्द्र भवन, 30 नवंबर को चूलै और 1 व 2 दिसम्बर को लुम्बिनी अपार्टमेंट में रहेंगे।

मुकेश शर्मा Reporting
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