राजनीति सेवा का एक माध्यम

राजनीति सेवा का एक माध्यम

P S Kumar Vijayaraghwan | Publish: Sep, 06 2018 12:06:20 PM (IST) Chennai, Tamil Nadu, India

राजनीति में भी धर्म रखने का प्रयास करना चाहिए। कभी-कभी कोई राजनेता अथवा राजनीतिज्ञ व्यक्तिगत स्वार्थ के कारण पापाचार, निष्ठुरता, निर्दयता, हिंसा, परिग्रह व काम-भोगों के प्रति आसक्ति में चला जाता है, जिसके कारण राजनीति भी दूषित हो जाती है।

 

 

चेन्नई.माधावरम में जैन तेरापंथ नगर में बने सभागार में आचार्य महाश्रमण ने ‘ठाणं’ आगमाधारित प्रवचन में कहा दुनिया में राजनीति एक आवश्यक तत्व है चाहे वह किसी भी प्रणाली से हो। एक प्रणाली लोकतांत्रिक तो दूसरी प्रणाली राजतांत्रिक होती है। लोकतांत्रिक प्रणाली में जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए मतदान की व्यवस्था है। मानो इसमें स्वयं जनता द्वारा चुना हुआ व्यक्ति प्रधानमंत्री अथवा राष्ट्रपति होता है। इसके माध्यम से एक साधारण आदमी भी देश का प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति बन सकता है। राजतंत्र में एक राजा का शासन चलता है, वह राजनीति का एक माध्यम होता है जहां वंशवाद भी चलता है, लेकिन कभी-कभी इसमें भी एक साधारण आदमी को राजा बनने का अवसर मिल जाता है। दोनों का मूल उद्देश्य प्रजा को सुखी बनाने के लिए और कानून व्यवस्था को सुचारू बनाए रखना होता है। राजनीति में भी धर्म रखने का प्रयास करना चाहिए। कभी-कभी कोई राजनेता अथवा राजनीतिज्ञ व्यक्तिगत स्वार्थ के कारण पापाचार, निष्ठुरता, निर्दयता, हिंसा, परिग्रह व काम-भोगों के प्रति आसक्ति में चला जाता है, जिसके कारण राजनीति भी दूषित हो जाती है।
जो राजा अथवा राजनेता या मुखिया अपनी प्रजा को आसक्ति में आकर कष्ट देता है, पापाचार करता है, हिंसा करता है, काम-भोग और परिग्रह में लिप्त हो जाता है, वैसे लोग मरकर सातवें नरक तक भी जा सकते हैं। राजनीति में भी धर्म कैसे, न्यायपूर्ण व्यवस्था कैसे चले इस पर ध्यान देने का प्रयास करना चाहिए। राजनीति सेवा का एक माध्यम है। राजनीति में धर्म रखने का प्रयास हो और न्यायपूर्ण सुव्यवस्थित चले तो प्रजा सुखी बन सकती है और राजनीति भी सार्थक हो सकती है।
उन्होंने बताया कि दो चक्रवर्ती ऐसे भी हुए जिन्होंने काम-भोगों का त्याग नहीं किया और वे मरकर सातवें नरक तक चले गए। भौतिक दुनिया में चक्रवर्ती से कोई बड़ा नहीं होता और अध्यात्म जगत में तीर्थंकर से बड़ा कोई नहीं होता। चक्रवर्ती सुभूम और ब्रह्मदत्त काम-भोगों के कारण सातवें नरक में चले गए।

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