धर्म से हीन इन्सान है पशु के समान

आचार्य आनंदऋषि व तपस्वी गणेशीलाल का दीक्षा दिवस मनाया

By: Santosh Tiwari

Published: 18 Dec 2018, 05:36 PM IST

चेन्नई. श्री वर्धमान श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन संघ मईलापुर के तत्वावधान में रविवार को आचार्य आनंदऋषि व तपस्वी गणेशीलाल का दीक्षा दिवस समारोह उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि व मुनि तीर्थेशऋषि के सान्निध्य में मईलापुर में लज चर्च रोड स्थित कामधेनु कल्याण महल (पुराना कामधेनु थियेटर) में आयोजित हुआ। स्वागत भाषण सचिव विमल खाबिया ने दिया एवं अध्यक्ष शांतिलाल चोरडिया ने समारोह की जानकारी दी। इस मौके पर उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि ने कहा महापुरुषों की जयंती और दीक्षा दिवस इसलिए मनाया जाता है कि उनके चरित्र, आस्था और सोच के साथ हमारा कोई रिश्ता बन जाएगा और वह उनकी सोच के साथ जुड़ जाए। समाज को जाग्रत करने के लिए तपस्वी गणेशीलाल ने समाज की गुलामी को तोडऩे व इसे भटकने से रोकने के लिए नियम बनाया कि बिना खादी और बिना मुंहपट्टी के धर्मसभा में कोई व्यक्ति बैठ नहीं सकता।

उन्होंने प्रण किया कि जिस घर में सुदेव, सुगुरु और सुधर्म के प्रति आस्था होगी वहीं से आहार पानी लेंगे। जिस घर में मिथ्यात्व होगा, जिस घर में परमात्मा महावीर के शासन और गुरु के प्रति एकनिष्ठा नहीं है उस घर का जल-अन्न नहीं लेंगे। कई बार उपवास के पारणे में ऐसा घर नहीं मिलता था तो वे पुन: तपस्या शुरू कर देते थे। इतिहास में ऐसा महापुरुष आपको नहीं मिलेगा जिसने अपने आहार पानी पर भी शर्त लगाई हो। महावीर के शासन में जिसने दीक्षा ली वह शेर ही बना है। ऐसे दोनों महापुरुष आचार्य आनंदऋषि व तपस्वीराज गणेशीलाल जिनकी १०५वीं दीक्षा जयंती आज मना रहे हैं। दोनों ने ही अपनी इज्जत दांव पर लगा दी थी- एक ने बलिप्रथा रोकने के लिए जहां सिकन्दराबाद में बहती खून की नदियां रुकवाई और दूसरे ने संगठन के लिए अपना जीवन लगा दिया। एक ने ज्ञानशालाएं खोली और दूसरे ने गौशालाएं खोली जो एक थी पशुओं को संभालने के लिए दूसरे को आदमियों को संभालने के लिए।

धर्म से हीन जो इंसान होता है वह पशु के समान होता है। पाश्वीय भावना से मुक्त होना हो तो धर्म ही तुझे बाहर ला सकता है दूसरा कोई नहीं। जो मां-बाप अपने बच्चों को धार्मिक संस्कार नहीं देते हैं, वे अपने बच्चे को इंसान नहीं बनाना चाहते। जो अपने बच्चों को जिनशासन के संस्कारों से संपन्न नहीं करते हैं वे उन्हें पशु बनाना चाहते हैं। बिना धर्म का कोई भी इंसान नहीं बन सकता। यदि पुतलीबाई अपने बेटे मोहन को विदेश भेजने से पहले संतों के पास नहीं ले जाती तो देश को आजादी दिलानेवाला अहिंसा का पुजारी महात्मा गांधी कहां से मिल पाता। जो मां-बाप अपने बच्चों को ऐसा सुरक्षा कवच नहीं देना चाहते हैं वे उनका बुरा करनेवाले होते हैं। हमें संघ और समाज को अपनी जिंदगी देनी चाहिए न कि इनके उपयोग के बल पर अपनी जिंदगी बनानी चाहिए। ऐसे महापुरुषों की दीक्षा जयंती आज हम मना रहे हैं जिन्होंने समाज को अपने कंधों पर उठाया।

जिन-जिन महापुरुषों को आप मानते हैं उनके जीवन का एक ही मंत्र रहा है कि उन्होंने अपना बोझ समाज पर कभी नहीं आने दिया और स्वयं समाज का बोझ उठाने में वे कभी पीछे नहीं रहे। वे आचार्य पदों पर रहते हुए भी स्वयं अपने कार्य करते थे, अकेले चलते थे। समारोह में मोहनलाल चोरडिय़ा को 'सुश्रावक रत्नÓ अलंकरण से नवाजा गया। इस मौके पर सचिव विमल खाबिया ने उपाध्याय प्रवर का चेन्नई का आखिरी कार्यक्रम मईलापुर संघ को देने के लिए आभार व्यक्त किया।

Santosh Tiwari Desk
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