'चावल के कटोरे' का फैसला अन्नदाता के हाथ

'चावल के कटोरे' का फैसला अन्नदाता के हाथ
- तंजावुर लोकसभा की छह विधानसभा सीटों पर इस बार घमासान के आसार
-डीएमके-कांग्रेस के गढ़ को भेद पाना अन्य दलों के लिए चुनौती

By: Ashok Rajpurohit

Published: 01 Mar 2021, 05:15 PM IST

तंजावुर (तमिलनाडु). डीएमके एवं कांग्रेस के गढ़ रहे तंजावुर क्षेत्र में अन्य दलों को चुनावी बिसात बिछाने के लिए इस बार पसीने छूट सकते हैं। चावल का कटोरा कहा जाने वाला तंजावुर सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से काफी ज्यादा समृद्ध है। यही वजह है कि यहां देश-दुनिया के सैलानी आत्मिक और मानसिक शांति के उद्देश्य से आते हैं, लेकिन इस बार राजनीतिक घमासान भी तेज होने के आसार बन रहे हैं। यह इलाका पहले कई बार किसान आन्दोलन का साक्षी बना है। जमींदारों और भूमिहीन किसानों के बीच जिले में कई बार झड़पें देखी गई।
यदि बात लोकसभा चुनाव की जाएं तो यहां बाजी कांग्रेस एवं डीएमके के हाथ ही रही है। इसका सीधा असर भी हर बार विधानसभा चुनाव के समय दिखता रहा है। इस बार भी हालात कुछ ऐसे ही हो सकते हैं। हालांकि यह सब कुछ गठबंधन पर निर्भर करेगा। इतिहास में झांके तो 1979 से 1996 तक तंजावुर संसदीय सीट पर कांग्रेस का कब्जा रहा। 1996 से 2014 तक 5 बार हुए चुनाव में डीएमके एकछत्र विजेता बनी रही। 2016 में एआईएडीएमके मुखिया जयललिता के निधन के बाद से एआईएडीएमके में घमासान छिड़ गया और सियासी समीकरण फिर बदल गए। शशिकला के भतीजे और कभी पार्टी के कोषाध्यक्ष रहे टीटीवी दिनाकरन की अगुवाई में कई विधायकों ने पार्टी और इसकी साख को प्रभावित किया है। ऐसे में पहले से ही इलाके में मात खा चुकी एआईएडीएमके को अब संभलने के लिए फूंक-फूंक कर कदम रखना होगा।
मौजूदा समय में चार डीएमके व दो एआईएडीएमके विधायक
बात यदि तंजावुर लोकसभा क्षेत्र के अधीन छह विधानसभा इलाकों की की जाएं तो मौजूदा समय में चार पर डीएमके का कब्जा हैं तो दो जगह पर एआईएडीएमके के विधायक है। डीएमके एवं कांग्रेस जहां इस बार गठबंधन में सहयोगी हैं वहीं एआईएडीएमके के साथ भाजपा का गठबंधन भी लगभग तय ही है। ऐसे में अन्य क्षेत्रीय दलों की भूमिका भी इस बार हार-जीत को प्रभावित करेगी। राज्य में एआईएडीएमके दस साल से काबिज है। ऐसे में डीएमके सत्ता में वापसी के लिए पूरी ताकत झोंकने में कसर नहीं रखना चाहेगी।
खास शैली के लिए प्रसिद्ध है तंजावुर पेंटिंग्स
तंजावुर पेंटिंग्स अपनी विशेष शैली के लिए प्रसिद्ध हैं। पर्यटक इन्हें खरीदना पसंद करते हैं। इसके अलावा तंजौर प्लेट्स, पंचलोहा प्रतिमाएं, पूजा सामग्री भी खासी प्रसिद्ध हैं। तंजावुर जो पहले तंजौर जिला कहलाता था। ऐतिहासिक जगह है। कावेरी नदी के उपजाऊ डेल्टा क्षेत्र में होने के कारण इसकी भूमि बहुत उपजाऊ है। इसे दक्षिण में चावल के कटोरे के नाम से भी जाना जाता हैं। मतलब साफ है अन्नदाता ही नेताओं के लिए भाग्यविधाता बनते हैं। यह चोल साम्राज्य द्वारा निर्मित बृहदेश्वर मन्दिर और यहाँ पर विशेष शैली से बनने वाले पारम्परिक भारतीय चित्रों के लिए प्रसिद्ध है।
मंदिर व धार्मिक स्थलों को समेटे हुए
दक्षिण भारत का तंजावुर कभी शक्तिशाली चोल साम्राज्य की प्राचीन राजधानी हुआ करता था जिसके बाद ये मराठा और नायकों के अधीन आया। चूंकि यह प्राचीन काल के दौरान एक महत्वपूर्ण जीवंत शहर था इसलिए तंजावुर को देश का एक ऐतिहासिक स्थल माना जाता है, जहा आज भी प्राचीन मंदिर और अवशेष देखे जा सकते हैं। आज भी यहां कई साल पुराने धार्मिक स्थल और मंदिर मौजूद हैं।
ब्रहदेश्वर मंदिर विश्व धरोहर
तंजावुर स्थित ब्रहदेश्वर मंदिर शहर के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में से एक है जो दक्षिण भारत के शक्तिशाली हिन्दू चोल राजवंश के राजा राजा चोल प्रथम द्वारा बनवाया गया था। ये भव्य मंदिर दक्षिण भारतीय मंदिर वास्तुकला का सबसे उत्कृष्ट और जटिल उदाहरण है। इस स्थल के ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए इसे विश्व धरोहर घोषित कर दिया गया है। इस मंदिर का निर्माण चोल साम्राज्य की जीत की खुशी में बनवाया गया था। यह विशाल और बेहद खूबसूरत मंदिर भगवाव शिव को समर्पित है। मंदिर की वास्तुकला देखने लायक हैं जहां सैकड़ों शिव ***** बनाए गए हैं। मंदिर आकर्षक बगीचों से घिरा हुआ है। तंजावुर स्थित भगवान शिव के भव्य मंदिरों में एयरवतेश्वर मंदिर का भी नाम शामिल है।
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तंजावुर लोकसभा क्षेत्र में आने वाले विधानसभा क्षेत्र व मौजूदा विधायक
तंजावुर -टीकेजी नीलामेघन (डीएमके)
तिरुवेयारू -दुरै चन्द्रशेखरन (डीएमके)
ओरतानाडु- एम. रामचन्द्रन (डीएमके)
मनारगुडी-टीआरबी राजा (डीएमके)
पत्तुकोट्टै - सी.वी. शेखर (एआईएडीएमके)
पेरावुरनी - एम. गोविन्दरसु (एआईएडीएमके)
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Ashok Rajpurohit
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