साबुन-टूथपेस्ट में ट्राइक्लोसन मानव स्वास्थ्य ही नहीं पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी खतरा

- तंत्रिका तंत्र को पहुंचाता नुकसान और कैंसर का भी खतरा

By: PURUSHOTTAM REDDY

Published: 09 Jan 2021, 07:14 PM IST

पुरुषोत्तम रेड्डी @ चेन्नई.

विशेषज्ञों का कहना है कि दैनिक उपयोगी उत्पादों मसलन साबुन, टूथपेस्ट और डिओडेरेंट में पाया जाने वाला बैक्टीरिया और सूक्ष्मजीव प्रतिरोधी एजेंट ट्राइक्लोसन मानव स्वास्थ्य ही नहीं बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र (इको सिस्टम) के लिए भी खतरनाक है। आइआइटी हैदराबाद ने हाल में एक अध्ययन में साबुन, टूथपेस्ट और डिओ में इस रसायन की उपस्थिति को चिंताजनक तथा मानव तंत्रिका तंत्र के लिए मारक बताया है। जबकि विशेषज्ञों की राय इससे भी आगे है कि यह जैविक तंत्र के लिए ही नुकसानदायी है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि भारत में ट्राइक्लोसन के उपयोग की स्वीकृत सीमा 0.3 प्रतिशत है। यह बात और है कि स्वीकृत सीमा से 500 गुना कम ट्राइक्लोसन भी मानव तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुंचा सकता है। नहाने का साबुन बनाने वाले बेंगलूरु स्थित कमल कॉटेज इंडस्ट्रीज के मालिक मोहनलाल भरसारिया का कहना है कि नहाने वाले साबुन में ट्राइक्लोसन (रसायन) नहीं मिलाया जाता है। यह रसायन फोड़े-फुंसी को साफ करने के लिए प्रयुक्त साबुन में मिलाया जाता है।

त्वचा पर विपरीत प्रभाव
बकौल, लाइफलाइन इंस्टीट्यूट ऑफ मिनिमल एक्सेस के चेयरमैन डा. जे.एस. राजकुमार, ट्राइक्लोसन के संपर्क से त्वचा रसायनों को अधिक सोंखती है जिसके कारण व्यक्ति कई बीमारियों का शिकार हो सकता है। यह गंदगी को तो दूर करता है लेकिन इससे त्वचा पर विपरीत प्रभाव पड़ता है और कैंसर का कारण बनता है।

घट जाती है इम्यूनिटी
वरिष्ठ चिकित्सक का कहना है कि साबुन के ज़्यादा इस्तेमाल से हमारी शरीर की इम्यूनिटी भी कम होती है। साबुन के उत्पादन के समय मिलाए जाने वाले कुछ केमिकल्स (रोसिन और ग्लिसरीन) स्किन एलर्जी का कारण बन सकते हैं। साथ ही इससे हमारी इम्यूनिटी पर भी बुरा असर पड़ता है।

बैक्टीरिया नहीं तो हम भी नहीं
आइआइटी मद्रास के जैव प्रौद्योगिकी विभाग के प्रोफेसर डा. रमाशंकर वर्मा का कहना है कि सूक्ष्म मात्रा में भी ट्राइक्लोसन न केवल जीन और एंजाइमों को प्रभावित कर सकता है बल्कि यह हार्माेन डिस्टर्बर (हार्मोन असंतुलन) होने के अलावा बैक्टीरिया को भी मारता है। बैक्टीरिया और वायरसों की कुल आबादी में से बहुसंख्या उनकी है, जो मनुष्यों के लिए रोगाणु नहीं हैं और हमारे इको सिस्टम में मददगार है। अगर अचानक सारे बैक्टीरिया- वायरस गायब हो गए तो हम सब भी खत्म हो जाएंगे। बैक्टीरिया दुनिया के लिए जितना सकारात्मक काम करते हैं, वो उनके नकारात्मक प्रभावों से बहुत ज्यादा है।

नैचुरल वस्तुओं का उपयोग करें
शरीर में ट्राइक्लोसन की अधिक मात्रा कैंसर का कारण बन सकती है। हमें ऐसे उत्पादों का उपयोग करना चाहिए कि जिनमें यह रसायन स्वीकृत मात्रा से कम हो अथवा नहीं हो। सबसे बेहतर विकल्प है कि नैचुरल चीजों को ही अपनी दिनचर्या में शामिल करें।
डा. रमाशंकर वर्मा, आइआइटी मद्रास के जैव प्रौद्योगिकी विभाग के प्रोफेसर


प्रतिबंध लगे ट्राइक्लोसन पर
ट्राइक्लोसन पर प्रतिबंध लगना चाहिए। एफडीए (खाद्य एवं औषधि प्रशासन) की इस पर नजर तो है लेकिन इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। शोध के बाद भी सरकार की उदासीनता कोई नई बात नहीं है। जबतक कोई बड़ा मामला प्रकाश में नहीं आता तब तक सरकार भी कुछ नहीं करेगी।
डा. राजकुमार, लाइफलाइन इंस्टीट्यूट ऑफ मिनिमल एक्सेस के चेयरमैन

PURUSHOTTAM REDDY
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