आत्मिक शक्ति से होता है कर्मों का क्षय

श्री एएमकेएम जैन मेमोरियल में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि ने कहा

By: Santosh Tiwari

Published: 15 Nov 2018, 06:17 PM IST

चेन्नई. पुरुषवाक्कम स्थित श्री एएमकेएम जैन मेमोरियल में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि ने कहा कि चैतन्य की शक्ति जब जागृत होती है तो उससे वीर्य और शरीर की शक्ति जागृत होती है जिसे बल कहते हैं। परमात्मा की आत्मीय वीर्य शक्ति इतनी परिपूर्ण थी कि देवताओं को भी उनके आभामंडल में आकर आनन्द की अनुभूति होती है। जिसकी आत्मिक शक्ति पंडित वीर्य की होती है उससे सपने में भी गलत काम नहीं होता। उन्होंने कहा साधना पंडित वीर्य शक्ति से होती है, ज्ञान से नहीं। यदि एक बार व्यक्ति में यह शक्ति जागृत हो जाए तो कोई कर्म उसके सामने टिकता नहीं है। परमात्मा की आत्मिक वीर्य शक्ति सुमेरु पर्वत के समान है। वे उत्तम पुरुष होते हैं जो किसी भी बाधाओं के कारण काम बीच में नहीं छोड़ते, वे ही मंजिल को प्राप्त होते हैं। शरीर में बल होना या नहीं होना कर्म के आधीन हो सकता है लेकिन खुशी होना या नहीं होना यह अपने हाथ में है। इसलिए देवता भी उनके चरणों में आकर अपने को सौभाग्यशाली बनाते हैं।

सुधर्मास्वामी कहते हैं कि परमात्मा की अक्षय प्रज्ञा सभी के साथ स्वयं के भी समृद्धि, सुरक्षा और कल्याण की है। वे उपद्रवों में भी उपकार छिपा हुआ देखते हैं। वे जहां भी गए सभी को समृद्ध करते चले गए। सभी मन में भावना लाएं कि अपने पास कोई आकर बैठे तो उसे खुशी की अनुभूति हो। परमात्मा की साधना से जुड़ेंगे तो स्वर्ण के समान और तीर्थंकर स्वरूप से जुड़ते हैं तो हीरे के समान बन जाएंगे।
यह संसार एक ऐसा सपना है जो दिखता है लेकिन मिलता नहीं और भगवान ऐसे सत्य हैं जो दिखते नहीं लेकिन मिलते अवश्य हैं। परमात्मा के समवशरण में जाना है तो दुनिया के सभी बंधनों को छोड़, निर्लेप होकर जाएं। अपने जीवन में परमात्मा के संघ और शासन में ऐसे रहें कि अपना अहंकार छोड़ दें।

Santosh Tiwari Desk
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