संस्कार से ही होती है मनुष्य की पहचान

संस्कार से ही होती है मनुष्य की पहचान

Ashok Singh Rajpurohit | Publish: Sep, 09 2018 06:55:48 PM (IST) Chennai, Tamil Nadu, India

जैसा घर का संस्कार होता है वैसा ही उनके अनुजों को संस्कार मिलते हैं : उपप्रवर्तक गौतममुनि

चेन्नई. साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने पर्यूषण पर्व के तीसरे दिन शनिवार को कहा कि पर्यूषण के समय में एक अद्भुत धर्म का नजारा देखने को मिलता है। त्यागी आत्माएं त्याग से और धर्म की आत्माएं धर्म को देखकर प्रसन्न होती है। जैसा घर का संस्कार होता है वैसा ही उनके अनुजों को संस्कार मिलते हैं। उचित लालन-पालन करने के बाद ही श्रवण कुमार ने भी अपने माता पिता की समर्पित भाव से सेवा की। जिनके बच्चे धार्मिक और नैतिक संस्कारों को अपनाते हैं वही व्यक्ति आगे चलकर श्रवण कुमार जैसे बनते हैं। मनुष्य को अपने कर्तव्यों को कभी नहीं भूलना चाहिए। जो अपने मां बाप के लिए हर प्रकार से समर्पित होकर सेवा करते हैं वे ही जीवन में आगे जा पाते हैं। जब माता पिता शरीर से लाचार हो तो पुत्र ही उनका आधार और सहारा होता है। उन्होंने कहा पर्यूषण पर्व के इस दिवस पर हमें आत्मा की निर्जरा करनी चाहिए। सागरमुनि ने कहा कि व्यक्ति अपने अच्छे आचरण से ही मंजिल को तय करता है। ऐसा प्रसंग आने पर मनुष्य को सोने के बजाय उठकर दौड़ लगानी चाहिए। क्योंकि यह प्रसंग मनुष्य को ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए आता है। पर्यूषण का मतलब होता है कि पूरी तरह से आत्मा के करीब जाना। जो आत्मा के करीब जाते है वे हमेशा आगे निकलते हैं।
इससे पहले उपप्रवर्तक विनयमुनि ने अंतगढ़ सूत्र पढ़ा और शास्त्र वाचन किया। इस मौके पर संघ के अध्यक्ष आंनदमल छल्लाणी सहित अन्य लोग उपस्थित थे। मंत्री मंगलचंद खारीवाल ने संचालन किया।

विश्व कल्याण की भावना से करें पर्व की आराधना
चेन्नई. एसएस जैन संघ एमकेबी नगर स्थानक में विराजित साध्वी धर्मप्रभा ने कहा कि यह पर्व साधना की उत्कृष्ट स्थिति का ज्ञान कराता है। यह उत्तम मांगलिक और आत्मशुद्धि की उपासना का संदेश देता है। आत्मा को राग से वीरागता, क्रोध से क्षमा, द्वेष से स्नेह, मान से विनय, माया से सरलता ,लोभ से संतोष और विषमता से समता की ओर अग्रसर करने वाला पर्व है। भावों की निर्मलता और विश्व कल्याण की भावना से पर्व की आराधना करें। सभी प्राणियों के सुख और कल्याण की कामना करें। उदारता, कोमलता और सहिष्णुता के भावों से हृदय को स्वच्छ करे तभी पर्व मनाना सार्थक होगा। यह पर्व हमें यह संदेश देता है कि दूसरों के गुण-दोष पर ध्यान न देकर खुद अपनी आलोचना करना, अपने गुण दोषों पर ध्यान देना ही लाभकारी है।
साध्वी स्नेह प्रभा ने कहा कि सच्ची मैत्री वो होती है जिसमें छोटा -बड़ा, ऊंच-नीच, गरीब-अमीर का कोई भेदभाव नहीं होता। विपदा की घड़ी में भी जो साथ न छोड़े वो सच्चा मित्र होता है। नहीं तो सुख समृद्धि के समय दुर्जन भी मित्र बन जाते हैं। सच्चा मित्र वह होता है जो अपने मित्र को पाप कर्म से हटाता है। हित की योजना बनाता है। छिपाने योग्य बातें छिपाता है और आपत्ति के समय अपने मित्र का साथ नहीं छोड़ता है। माया रूपी कषाय मित्रता की शत्रु है माया या कपट की भावना मन में आ जाती है तो वो सबसे प्रथम मित्रता पर घात करती है।

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