चुनाव के वक्त ही क्यों याद आते हैं प्रवासी?

एकाएक चुनाव के वक्त ही आखिर राजनीतिक दलों को प्रवासियों की याद क्यों आती है? अब लोकसभा चुनाव सिर पर है तो राजनीतिक दलों ने प्रवासियों...

By: मुकेश शर्मा

Published: 04 Apr 2019, 12:11 AM IST

चेन्नई।एकाएक चुनाव के वक्त ही आखिर राजनीतिक दलों को प्रवासियों की याद क्यों आती है? अब लोकसभा चुनाव सिर पर है तो राजनीतिक दलों ने प्रवासियों की नब्ज को टटोलना शुरू कर दिया है अन्यथा राजनीतिक दलों की ओर से प्रवासियों को तवज्जो कम ही दी जाती रही है। चाहे लोकसभा चुनाव हो या फिर विधानसभा या स्थानीय निकाय चुनाव। चुनावों के वक्त ही राजनीतिक पार्टियों की प्रवासियों की याद आती है। चुनाव के बाद सब भुला दिया जाता है। तमिलनाडु में 18 अप्रेल को मतदान है।

लोकसभा चुनाव की घोषणा के साथ ही तमिलनाडु की प्रमुख राजनीतिक पार्टियां सक्रिय हो चुकी है। प्रवासियों की इलाकों में भी राजनीतिक दलों की टोलियां पहुंचने लगी हैं। खास बात यह है कि प्रवासियों के प्रमुख कार्यक्रमों पर उनकी विशेष निगाह रहती है। पिछले दिनों होली के मौके पर आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों में भी राजनीतिक दलों की दस्तक देखी गई। हालात यह है कि ऐसे कार्यक्रमों में एक राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता पहुंचने के बाद दूसरों दलों के कार्यकर्ता भी आ धमकते हैं।

तमिलनाडु में होली का पर्व इतना प्रचलित नहीं है बावजूद इस बार होली के पर्व पर राजनीतिक दलों की सक्रियता देखी गई और वे होली के रंगों से सराबोर भी हुए। होली स्नेह मिलन के कर्ई कार्यक्रमों में राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं की उपस्थिति देखी गई। इसके साथ ही धार्मिक, सामाजिक कार्यक्रमों में भी राजनीतिक दलों के उम्मीदवार व समर्थकों ने पहुंचकर प्रवासियों से वोट व समर्थन की अपील करते देखे गए।


पिछले करीब दो दशक से प्रवासियों के इलाके में राजनीतिक दलों की चुनाव के समय अधिक दिलचस्पी दिखाई देने लगी है। वे हिन्दी में लिखे बैनर, पोस्टर, पेम्पलेट के जरिए भी इन इलाकों में प्रचार कर रहे हैं। प्रवासियों ने हालांकि अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं कि वे किस दल का समर्थन करेंगे। हर आने वाले पार्टी कार्यकर्ता की हां में हां मिलाते ही नजर आ रहे हैं। वे सीधे रूप से किसी दल से नहीं जुड़ रहे हैं। हालांकि पिछले एक दशक में काफी बदलाव भी देखने को मिला है। कई प्रवासी द्रविड़ दलों से जुड़ चुके हैं।

वे इन पार्टियों के साथ प्रचार में भी साथ दिख रहे हैं। द्रविड़ दलों में प्रवासियों के संबंध का असर भी दिखने लगा है। काउन्सर तक तो कई प्रवासियों की सीधी पहुंच भी रहती है और उन्हेें अब साफ-सफाई एवं अन्य छोटे कामों के लिए अधिक मशक्कत नहीं करनी पड़ती।

क्या कहते हैं प्रवासी:

द्रविड़ दलों से जुड़ रहे प्रवासी

अब प्रवासी भी द्रविड़ दलो ंसे जुडऩे लगे हैं। ऐसे में जनप्रतिनिधियों से भी उनके मधुर व आत्मीय संबंध बने हैं। प्रवासियों के सुख-दुख में जनप्रतिनिधि भागीदार भी बनते हैं। उनको प्रवासियों पर पूरा विश्वास भी रहता है। एल. शांतिलाल पुरोहित, प्रवासी राजस्थानी

समस्याओं का हो रहा समाधान

द्रविड़ दल अब प्रवासियों की समस्याओं पर गौर करने लगे हैं। यदि उन तक प्रवासियों की किसी समस्या को सामने लाया जाता है तो जरूर समाधान के प्रयास भी किए जाते हैं। लोग भी अब पहले की तुलना में अधिक जागरुक हुए हैं। निम्बाराम पटेल, प्रवासी राजस्थानी

नहीं मिल रही महत्ता

प्रवासियों को जनप्रतिनिधि एवं राजनीतिक पार्टियां कोर्ई विशेष महत्ता अब तक नहीं दे रही हैं। प्रवासी भी मतदान को लेकर इतने सजग नहीं रहते। यदि प्रवासियों के इलाके में मतदान प्रतिशत बढ़ जाए तो सभी राजनीतिक दल खुद-ब-खुद प्रवासियों के पास आने को मजबूर होंगे। राजेन्द्रकुमार जैन, प्रवासी राजस्थानी

मुकेश शर्मा Reporting
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