संसार एक समुद्र है, शरीर नौका व जीव नाविक

संसार एक समुद्र है, शरीर नौका व जीव नाविक

Ashok Singh Rajpurohit | Publish: Sep, 05 2018 11:48:48 AM (IST) Chennai, Tamil Nadu, India

यह संसार एक समुद्र है, शरीर नौका और जीव नाविक है। महर्षि लोग शरीर रूपी नौका के माध्यम से संसार रूपी समुद्र को पार कर जाते हैं। आदमी के जीवन में ज्ञान की गहराई और आचार की उच्चता हो तो आदमी इस संसार समुद्र को तर सकता है। आदमी को इस शरीर के माध्यम से धर्म और अध्यात्म की साधना करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को अपने शरीर का धर्म और साधना में लगाने का प्रयास करे और समय रहते धर्म कर ले तो संसार समुद्र को तरने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

 

 

चेन्नई. माधवरम में जैन तेरापंथ नगर स्थित महाश्रमण सभागार में आचार्य महाश्रमण ने ‘ठाणं’ आगमाधारित प्रवचन शृंखला के क्रम में कहा कि जैन वाङ्मय में भूगोल और खगोल की बात भी मिलती है। इसमें ढाई द्वीप को जम्बूद्वीप कहा जाता है, जिसमें मनुष्य रहते हैं।
यह संसार एक समुद्र है, शरीर नौका और जीव नाविक है। महर्षि लोग शरीर रूपी नौका के माध्यम से संसार रूपी समुद्र को पार कर जाते हैं। आदमी के जीवन में ज्ञान की गहराई और आचार की उच्चता हो तो आदमी इस संसार समुद्र को तर सकता है। आदमी को इस शरीर के माध्यम से धर्म और अध्यात्म की साधना करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को अपने शरीर का धर्म और साधना में लगाने का प्रयास करे और समय रहते धर्म कर ले तो संसार समुद्र को तरने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
प्रवचन के उपरान्त आचार्य ने मुनिपत के व्याख्यान के क्रम को भी आगे बढ़ाया। इसके बाद आचार्य के समक्ष तपस्वियों ने अपनी-अपनी धारणा के अनुसार तपस्याओं का प्रत्याख्यान किया।
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आत्म समर्पण से मिलता है परमात्मा
चेन्नई. कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा भले ही जुगनू के समान अल्प बुद्धि वाले हैं लेकिन हमारी आत्मा में सूर्य के समान दिव्य प्रकाश है। आत्मा पर कर्मों का आवरण है उस आवरण को हटाने के लिए बहुत बड़ा शास्त्र ज्ञानी बनना जरूरी नहीं, उसके लिए तो भरत जैसी भेद बुद्धि चाहिए और शबरी जैसा भक्त चाहिए और हनुमान जैसा समर्पण चाहिए। परमात्मा शक्ति और ज्ञान प्रदर्शन से नहीं मिलता आत्म समर्पण से मिलता है। फूल जैसी कोमलता से मिलता है। चार प्रकार के लोग होते हैं एक जो फूलों का गुलदस्ता लाकर घर की शोभा बढ़ाते हैं, दूसरे वे जो फूलों की माला पहनते हैं। तीसरे वे जो फूल बेचते हैं और चौथे वे जो फूलों का इत्र निकालते हैं। जो गुलदस्ता लाते हैं वे मूढ़ हैं, जो माला पहनते हैं वे अज्ञानी और जो फूल बेचते हैं वे अविवेकी हैं। जो इत्र निकाल रहे हैं वे ज्ञानी व विवेकवान और समझदार हैं। हमने अपने जीवन से सुगंध लेने की कोशिश नहीं की, इसका सदुपयोग नहीं किया। राजनीतिज्ञ बने तो षडय़ंत्र रचे। व्यापारी बने तो बेइमानी की। शिक्षित हुए तो ज्ञान का उपयोग आजीविका कमाने में किया। इसलिए संत बनो, जिंदगी के फूल से परमात्मा के परम ज्ञान की सुगंध निकालो। सम्यक ज्ञान का पुरस्कार प्राप्त करो।

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