भाई की लंबी उम्र की कामना के साथ मना दूज,नगडिय़ा और ढोलक की थाप पर नाचे मौनी

भाई की लंबी उम्र की कामना के साथ मना दूज,नगडिय़ा और ढोलक की थाप पर नाचे मौनी

Neeraj Soni | Publish: Nov, 10 2018 12:37:17 PM (IST) Chhatarpur, Madhya Pradesh, India

गायों के बिछडऩे से दुखी भगवान कृष्ण का मौन तोडऩे से शुरु हुआ मौनी नृत्य
यमराज ने यमुना को दिया था वरदान,दूज की पूजा से लंबी होती है भाई की आयु

छतरपुर। दीपावली के दूसरे दिन शुक्रवार को भाई दूज का उत्सव मनाया गया। भाई की लंबी उम्र के लिए बहनों ने प्रार्थना की। शहर की सड़कों पर सुबह से ही बहनें मिठाई खरीदती और भाइयों के घर जाते नजर आईं। ये नजारा दोपहर बाद तक देखने को मिला। भाई दूज का त्योहार हर वर्ष कार्तिक मास की द्वितीया को मनाया जाता है। भैया दूज को भ्रातृ द्वितीया भी कहते हैं। इस दिन बहनें भाइयों के स्वस्थ तथा दीर्घायु होने की मंगल कामना करके तिलक लगाती हैं। इस दिन गोधन कूटने की प्रथा भी है। गोबर की मानव मूर्ति बनाकर छाती पर ईंट रखकर स्त्रियां उसे मूसलों से तोड़ती हैं। इसके साथ ही जिले के प्रमुख धाॢमक स्थलों पर मौनिया नृत्य का आयोजन किया जा रहा है। मौनी नृत्य मौनी परमा और दीपावली के समय किया जाता है। प्राचीन नृत्य मौनिया, जिसे सेहरा और दीपावली नृत्य भी कहते हैं, बुंदेलखंड के गांव-गांव में पुरुषों द्वारा घेरा बनाकर, मोर के पंखों को लेकर, मोहक अंदाज में नृत्य किया जाता है।
ऐसे शुरु हुई भाई दूज की परंपरा :
साहित्याकार मालती श्रीवास्तव ने बताया कि, भगवान सूर्य की पत्नी का नाम छाया था। उनकी कोख से यमराज तथा यमुना का जन्म हुआ था। यमुना यमराज से बड़ा स्नेह करती थी। वह उससे हमेशा कहती कि, उनके घर आकर भोजन करें। यमराज ने सोचा कि मैं तो प्राणों को हरने वाला हूं। मुझे कोई भी अपने घर नहीं बुलाना चाहता। बहन स्नेह से मुझे बुला रही है, उसका पालन करना मेरा धर्म है। यमराज को अपने घर आया देखकर यमुना की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने स्नान कर पूजन करके व्यंजन परोसकर भोजन कराया। यमुना द्वारा किए गए आतिथ्य से यमराज ने प्रसन्न होकर बहन से वर मांगाने को कहा। यमुना ने कहा मेरी तरह जो बहन इस दिन अपने भाई को आदर सत्कार करके टीका करे, उसे तुम्हारा भय न रहे। इसी दिन से पर्व की परम्परा बनी। ऐसी मान्यता है कि जो आतिथ्य स्वीकार करते हैं, उन्हें यम का भय नहीं रहता। इसीलिए भैयादूज को यमराज तथा यमुना का पूजन किया जाता है।
ऐसे शुरु हुआ मौनी नृत्य :
बुंदेलखण्ड के ग्रामीण अंचलों के लोगों के मौन होकर मौन परमा के दिन इस नृत्य को करने से इस नृत्य का नाम मौनिया नृत्य रखा गया। साथ ही मौन रखकर व्रत करने वालों को मौनी बाबा भी कहा जाता है। मौन परमा के दिन के साथ-साथ इस नृत्य को बुंदेलखंड में दीपावली के समय करने की परंपरा है। साहित्याकार सुरेन्द्र शर्मा शिरीष ने बताया कि,प्राचीन मान्यता के अनुसार जब श्रीकृष्ण यमुना नदी के किनारे बैठे हुए थे, तब उनकी सारी गाय कहीं चली गयीं। प्राणों से भी अधिक प्रिय अपनी गायों को प्यार करने वाले भगवान कृष्ण दु:खी होकर मौन हो गए, जिसके बाद भगवान कृष्ण के सभी ग्वाल दोस्त परेशान होने लगे। जब ग्वालों ने सभी गायों को तलाश लिया और उन्हें लेकर लाये, तब कहीं जाकर कृष्ण ने अपना मौन तोड़ा। तभी से परम्परा के अनुसार श्रीकृष्ण के भक्त गांव-गांव से मौन व्रत रख कर दीपावली के एक दिन बाद मौन परमा के दिन इस नृत्य को करते हुए 12 गांवों की परिक्रमा लगाते हैं। मौनिया नृत्य की टोली में 11, 21 व 31 ग्रामीण या इससे अधिक लोग शामिल होते हैं। नृत्य में मोर के पंख, एक रंग की भेषभूषा, हाथों में डंडा रखा जाता है। नृतकों की टोली में एक जोकर, नृत्यांगना , दलदल घोड़ी, कृष्ण की भेषभूषा पहने युवक आदि सम्मिलित होते हैं। इस नृत्य में बुंदेली यंत्र नगडिय़ा, ढोलक, मजीरा, झेला, हरमोनिया आदि लिए नजर आते हैं।

 

 

 

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