भंयकर प्राकृतिक त्रासदी की ओर बढ़ रहा बुंदेलखंड

Neeraj soni

Publish: Jun, 14 2018 11:57:07 AM (IST)

Chhatarpur, Madhya Pradesh, India
भंयकर प्राकृतिक त्रासदी की ओर बढ़ रहा बुंदेलखंड

बुंदेलखंड के चार जिलों में हुए सर्वे में सामने आई गांवों की भयावह तस्वीर

छतरपुर। मप्र और उप्र के १३ जिलों को मिलाकर बने बुंदेलखंड के गांवों में सूखा, अवर्षा जैसी प्राकृतिक आपदाओं के बीच बढ़ते पलायन और शासन-प्रशासन के उपेक्षित रवैये से ग्राम्य जीवन संकट में आ गया है। प्राकृतिक त्रासदी की ओर बढ़ रहे गांवों का पूरा ढांचा ही चरमरा गया है। गांव में खेती का रकवा तेजी से घटा है। पेयजल के स्त्रोत कम हुए हैं। साल-दर साल बारिश कम होती चली जा रही है। किसान कर्ज के बोझ से दब रहा है। खाद्य सुरक्षा का संकट भी तेजी से बढ़ा है। पलायन के कारण गांव तेजी से उजडऩे लगे हैं। यह सब भयावह तस्वीर जल-जन जोड़ो अभियान की ओर से बुंदेलखंड के चार जिले छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना और दमोह के गांवों में कराए गए सर्वे में सामने आई है। इस सर्वे में हर जिले के एक-एक ब्लाक के चार-चार सबसे ज्यादा समस्याग्रस्त गांवों को लिया गया था। यह सर्वे रिपोर्ट प्रदेश मुख्यमंत्री को एक पत्र के साथ भेजी गई है।
मैग्सेसे पुरस्कार विजेता एवं वाटर मैन राजेंद्र सिंह राणा के निर्देशन में बुन्देलखण्ड में सूखे के प्रभाव को कम करने के उद्देश्य से जल-जन जोड़ो अभियान के अंतर्गत बुंदेलखंड वॉटर फोरम का गठन किया गया है। इस संगठन से जुड़ीे स्थानीय संस्थाओं के प्रतिनिधियों द्वारा ही यह सर्वेक्षण पूरा किया गया है। इस सर्वेक्षण में टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना एवं दमोह जिलों को मुख्य रूप से चयनित किया गया था। सर्वेक्षण के दौरान ऐसे गांवों का चयन किया गया था जो सर्वाधिक सूखे से प्रभावित थे। इस पूरी प्रक्रिया में ग्राम स्तरीय सहभागी आंकलन पद्धति का प्रयोग किया गया है। सर्वे में सामने आया है कि वर्ष 2003 के बाद से बुंदेलखंड प्रत्येक एक वर्ष के बाद भयानक सूखे की चपेट में रहा है। जिस कारण कृषि सिंचाई एवं पेयजल का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। आजीविका सुनिश्चितता के लिए यहां के लोगों को पलायन करना पड़ रहा है। अल्प वर्षा एवं बेमौसम बरसात ने खरीफ की फसल को गंभीर क्षति पहुंचाई है। कुंओं, तालाबों, हैंडपम्पों ने पानी देना बंद कर दिया है। भूगर्भ जल स्तर लगातार गिरता जा रहा है। महिलाओंं और बच्चों के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। गरीब एवं विपन्न तबके जिसमें प्रमुख रूप से अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति को गंभीर पेयजल का सामना करना पड़ रहा है।
गांवों में बदहाली की ओर पहुंच गया किसान और खेती :
वर्ष 2017 में मानसून की बेरुखी ने बुंदेलखंड के एक बड़े क्षेत्र को अपनी चपेट में लिया है। वैसे तो बुंदेलखंड में सूखे और अवर्षा को लेकर चर्चा का विषय रहा है लेकिन पिछले 3 सालों के अनवरत सूखे के कारण स्थिति भयावह है। रबी की फ सल में जो थोड़ी बहुत उत्पादन की अपेक्षा थी वह भी कीटों के प्रकोप से पूरी तरह नष्ट हो गई। किसानों में इस साल भी सूखे के प्रभाव को लेकर भय व्याप्त है। सतही जल संरचनाओं ने देख-रेख के अभाव में अपना अस्तित्व खो दिया है। यदि इस साल भी मानसून ने साथ नहीं दिया तो स्थिति बद से बदतर हो जाएगी। गांवों में तो पानी का संकट बढ़ता ही जा रहा है। शहरों में भी पेयजल आपूर्ति ठप हो जाएगी। इसके अलावा कर्ज के बोझ में दबे किसान व फ सल के नुकसान के कारण किसान आत्महत्या जैसा घातक कदम उठाने को विवश है। साहूकारों के दबाव के चलते किसान आजीविका के तलाश और कर्ज चुकाने के लिए धनराशि की व्यवस्था के लिए बड़े शहरों की ओर पलायन कर रहा है। जबकि वहां भी उसके साथ भेदभाव किया जा रहा है। दैनिक मजदूरी समय से नहीं मिल रही या फिर कम मिल रही है। उनकी बहू-बेटियों का यौन शोषण हो रहा है। यहां तक कि मजदूर बंधुआ भी बनाए जा रहे हैं।
पेयजल स्त्रोतों की स्थिति:
सर्वेक्षण के दौरान यह निकलकर आया कि 70-90 प्रतिशत कुएं तथा 75 प्रतिशत हैंडपंप सूख चुके हैं। जिसके परिणामस्वरुप यहां की आबादी को गंभीर पेयजल का सामना करना पड़ रहा है। जो हैंडपंप ठीक हालत में हैं वह भी कम पानी दे रहे हैं। इनके माध्यम से आवश्यकता के आधार पर पेयजल की आपूर्ति कर पाना बेहद कठिन है। यहां की महिलाएं पेयजल की व्यवस्था करने के लिए 8-10 किमी की दूरी तय करने को विवश हैं। शुद्ध पेयजल के अभाव में समुदाय को स्वास्थ्य संबन्धी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। कई ऐसे गांव हैं, जहां पेयजल को लेकर विवाद की स्थिति बनना सामान्य बात हो गई है।

आंकड़ों से समझे स्थिति :

जिला कुएं हैंडपंप
उपयोग/अनुपयोगी उपयोगी/अनुपयोगी
छतरपुर ८.७ / ९७.३ २४.२ / ७५.८
टीकमगढ़ ७.४ / ९२.६ २१.७ / ७८.३
पन्ना १२.७ / ८७.३ २७.१ / ७२.९
दमोह ८.४ / ९१.६ १९.७ / ८०.३
(सभी आंकड़े प्रतिशत में है)

गांवों में तालाबों की स्थिति:
सर्वे किए गए गांवों के लगभग 50-90 प्रतिशत तालाबों की स्थिति देखरेख के अभाव में लगभग अस्तित्वहीन होती जा रही है। परंपरागत चंदेल और बुंदेलकालीन तालाबों में भी गाद जमा होने के कारण जल भरण क्षमता क्षीण होती जा रही है। जिस कारण भू-गर्भ रिचार्ज को सहयोग करने में सहायक यह जल संंरचनाएं असहाय है।
जिला सूखे तालाबों का प्रतिशत
छतरपुर ९१.२
टीकमगढ़ ९३.७
पन्ना ८७.१
दमोह ९२.७

रबी फसल में कुल बुवाई का रकबा :
इस वर्ष मानसून की बेरुखी के कारण सतही जल संरचनाओं में, सिंचाई स्त्रोत मेंं सहायक डेम व नदियों में पानी का अभाव रहा। साथ ही साथ भू-गर्भ जल भंडारण में भी कमी आई जिसके परिणामस्वरुप रबी फसल चक्र में सिर्फ 52 प्रतिशत कृषि क्षेत्र में बुवाई हो सकी। लिहाजा किसानों को 55 प्रतिशत उत्पादन भी नहीं मिल पाया। छतरपुर में ५२.७ प्रतिशत, टीकमगढ़ में ५७.७, पन्ना में ६१.९२ और दमोह में ५६.४४ प्रतिशत उत्पादन ही मिल सका है।
खाद्य सुरक्षा का संकट भी खड़ा हो गया :
अल्प वर्षा और सिंंचाई सुविधा के अभाव में कृषि उत्पादन में लगातार कमी आई है। रबी और खरीफ में अपेक्षाकृत बेहद न्यूनतम उत्पादन मिलने के कारण किसान संंकट मेंं हैं और आने वाले महीनों में बेहद गंभीर खाद्यान्न संकट उत्पन्न होने वाला है। इसके अतिरिक्त खाद्य सुुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पीडीएस योजना संचालन में संबंधित विभागों द्वारा शिथिलता बरती जा रही है, जिस कारण अन्तिम व्यक्ति तक उसका लाभ नहीं पहुंच पा रहा है।
जिला खाद सुरक्षा का संकट
छतरपुर ३८.१ त्न
टीकमगढ़ ३७.२ त्न
पन्ना ३८.६ त्न
दमोह ३९.२ त्न
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जिला खरीब फसल को नुकसान
छतरपुर ७८ त्न
टीकमगढ़ ७६ त्न
पन्ना ७३ त्न
दमोह ८२ त्न
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जिला रवी फसल को नुकसान
छतरपुर ५८ त्न
टीकमगढ़ ६८ त्न
पन्ना ५९ त्न
दमोह ८२ त्न


किसानों पर लगातार बढ़ा कर्ज :
कम उत्पादन के कारण बुंदेलखंड का किसान बैंक से लिए गए कर्ज एवं साहूकारों के लिए गए कर्ज का भुगतान करने में असमर्थ हैं। सर्वे किए गए गांवोंं में 70-90 प्रतिशत लघु एवं सीमान्त किसान कर्ज में दबे हुए हैं। कर्ज से परेशान कई किसान आत्महत्या भी कर चुके हैं। अधिकांश किसान गांवों को छोड़कर काम की तलाश में बड़े शहरों की ओर चले गए हैं। सबसे ज्यादा छतरपुर और टीकमगढ़ के किसान कर्ज के बोझ से दबे हैं।

Chhatarpur

जिला किसानों पर कर्ज की स्थिति
छतरपुर ८७.४ त्न
टीकमगढ़ ८५.९ त्न
पन्ना ७२.५ त्न
दमोह ६५.७७ त्न
पलायन के कारण खाली हो रहे गांव :
सर्वे किए गए गांवों में विपन्न समुदाय के परिवार के सदस्यों के लिए मजदूरी ही एकमात्र आजीविका का साधन है। कृषि में कम उत्पादन एवं मनरेगा में रोजगार नहीं मिलने के कारण यहां का लगभग 65 प्रतिशत मजदूर वर्ग दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, गुजरात जैसे शहर में पलायन कर चुके हैं। और अपने पीछे महिलाओं, बुजुर्गों एवं बच्चों को छोड़कर गांव में ही चले जाते हैं जिनके स्वास्थ्य, शिक्षा एवं सामाजिक स्तर पर लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है।
जिला पलायन की स्थिति
छतरपुर ६७.८ त्न
टीकमगढ़ ६८.३ त्न
पन्ना ५९.२ त्न
दमोह ६७.४ त्न

पशुपालन पर भी संकट :
अल्प वर्षा के कारण चारा उत्पादन में भी गिरावट दर्ज की गई है। जिसके परिणामस्वरुप पालतू पशुओं के लिए चारे का संकट खड़ा हो गया है। चारे के अभाव में पशुओं के स्वास्थ्य एवं दुग्ध उत्पादन की क्षमता में कमी आई है। ऐसी स्थिति में किसान इन जानवरों को खुला छोड़ देते हैं जो भोजन की तलाश में खेत में पहुंचकर पूर्ण तरीके से खेत नष्ट कर देते हैं। साथ ही इन जानवरों के साथ वाहनों के साथ टकराने से मरने की भी संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी हुई है।

हम समाधान की ओर बढ़ रहे हैं :
बुंदेलखंड के गांवों का सर्वे कराने के बाद हम समाधान की ओर बढ़ रहे हैं। सबसे पहले गांवों में जलसंकट की स्थिति दूर करने और ज्यादा से ज्यादा वर्षा जल रोकने के लिए वॉटर वाडी को ठीक करने में लगे हैं। सरकारी स्तर से लेकर श्रमदान, जनसहयोग और ग्रामीणों को जागरुक करके इस दिशा में काम शुरू कर दिया गया है। प्रदेश के मुख्यमंत्री को भी पूरी सर्वे रिपोर्ट भेजी गई है। इसमें समाधान के तरीकों का भी जिक्र किया गया है। शासन अपना काम जब भी करे, इससे पहले हम अपने स्तर पर गांव में काम कर रहे हैं।
- संजय सिंह, राष्ट्रीय संयोजक जल-जन जोड़ो अभियान

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