मरीजों को मिले लाभ, इसीलिए मंत्री और सांसद ने अस्पताल को दिए थे एंबुलेंस, डेढ़ महीने से एक भी मरीज नहीं रेफर

रोजाना जिला अस्पताल से रेफर हो रहे 10 से अधिक मरीज

छतरपुर. जिला अस्पताल से रेफर हो रहे मरीजों को सस्ते दर पर एंबुलेंस उपलब्ध हो सके, इसके लिए मंत्री और सांसद ने अस्पताल प्रबंधन को दो सर्व सुविधायुक्त एंबुलेंस दिलाए थे, लेकिन प्रबंधन की लापरवाही के चलते इस समय एंबुलेंस शो-पीस बने हुए हैं। अब तो हद हो चली है, डेढ़ महीने से एक भी केस इन एंबुलेंस से रेफर नहीं किया गया, जबकि रोजाना एक दर्जन मरीज अस्पताल से रेफर हो रहे हैं।


जिला अस्पताल के गेट से प्रवेश लेते तीन एंबुलेंस खड़ी हुई देखी जा सकती हैं। ये एंबुलेंस पिछले डेढ़ महीने से यहां से हिली तक नहीं हैं। धूल चढ़ जाती हैं तो ड्राइवर साफ कर देते हैं। इनके ड्राइवर भी यहां-वहां घूमकर ही दिन निकाल देते हैं। जबकि इनके ही सामने अस्पताल के बाहर के निजी एंबुलेंस के चालक मरीजों से सौदा करते हुए रोजाना १० से अधिक मरीजों को ग्वालियर, झांसी, दिल्ली लेकर जा रहे हैं।
डेढ़ महीने से एक भी रेफर नहीं, रेट भी आधे
जनवरी और फरवरी में अब तक जिला अस्पताल से मेडिकल झांसी, ग्वालियर ४६० से अधिक मरीज रेफर हो चुके हैं, लेकिन जिला अस्पताल की तीनों एंबुलेंस को एक भी मरीज ले जाने नहीं मिल सका। इन एंबुलेंस को ले जाने के लिए १० रुपए प्रति किलोमीटर रेट तय हैं। जो बाहर से काफी कम हैं। बाहर यह एंबुलेंस को १६ से २० रुपए प्रति किलोमीटर तक मिलती हैं। इसके बाद भी एंबुलेंस नहीं चल पाना ड्राइवर और प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करते हैं। लगातार खड़े रहने से वाहन में खराबी भी जल्दी आ जाती हैं।
एंबुलेंस देने के बाद जनप्रतिनिधि भी भूले
दोनों सर्वसुविधायुक्त एंबुलेंस तत्कालीन राज्यमंत्री ललिता यादव और सांसद वीरेंद्र खटीक द्वारा यहां उपलब्ध कराई गई थीं, लेकिन एंबुलेंस का लाभ लोगों को मिल रहा हैं या नहीं जनप्रतिनिधि भी खैर खबर कभी लेने नहीं पहुंचे। भाजपा नेत्री ललिता यादव ने बताया कि यात्रियों की जरूरत के चलते अस्पताल को यह व्यवस्था कराई गई थी, लेकिन उसका लाभ मरीजों को नहीं मिल रहा तो आज ही फॉलोअप लेती हूं। कुछ महीनों पहले स्थानीय विधायक आलोक चतुर्वेदी ने जरूर अस्पताल से निजी एंबुलेंस वाहनों को बाहर करने कहा था, जिसके चलते वाहन तो बाहर हो गए, लेकिन सरकारी एंबुलेंस नहीं चल सकी।

कैसे मिले सरकारी एंबुलेंस, जब कोई पता ही नहीं
डेढ़ महीने से खड़ी एंबुलेंस के मामले में जब पत्रिका ने पड़ताल की तो सबसे बड़ा सवाल यह सामने आया कि सरकारी एंबुलेंस आम मरीज के परिजनों को मिले तो कैसे? जबकि इसके लिए को सूचना ही नहीं हैं। 5 मंजिल की पूरी बिल्डिंग, हर वार्ड, ओपीडी और अस्पताल के बाहर तक घूमने में 500 से अधिक सूचना बोर्ड दिखे, लेकिन एक भी जगह ऐसा कोई बोर्ड नहीं था, जहां लिखा हों कि सरकार एंबुलेंस प्राप्त करने के लिए यहां संपर्क करें। यहां तक कि एंबुलेंस के ड्राइवर तक पहुंचने के लिए हमें भी काफी भटकना पड़ा। प्रभारी मोहम्मद यूनिस उर्फ बब्बन ने बताया कि हमारे पास मरीज आते नहीं हैं। कहां आएं के सवाल पर सिविल सर्जन कार्यालय का पता दिया जाने लगा और खुद की सफाई।
यह भी जानना जरूरी
कुल एंबुलेंस- चार, दो बड़ी, एक जीप, एक खराब
ड्राइवर- प्रभारी मोहम्मद यूनिस, मससूद, छोटेलाल, मदनलाल
वर्जन
जिला अस्पताल की एंबुलेंस के रेट तो कम हैं, इसके बाद भी एंबुलेंस क्यों नहीं चल रहे इसका जवाब लिया जाएगा। जीप का रेट प्रति किलोमीटर कम करने का प्रस्ताव बनाया जा रहा हैं। साथ ही अस्पताल में भी एंबूलेंस की उपलब्धता के लिए भी नोटिस बोर्ड जगह-जगह चस्पा कराए जाएंगे।
डॉ. आरएस त्रिपाठी, सिविल सर्जन जिला अस्पताल

Samved Jain Desk/Reporting
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