खुले में पड़ाअस्पताल का कचरा,बढ़ा रहा संक्रमण का खतरा

अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों के बाहर खुले में फेंका जा रहा मेडिकल वेस्ट,

Samved Jain

September, 1311:57 AM

Chhatarpur, Madhya Pradesh, India

उन्नत पचौरी छतरपुर। शहर के साथ साथ जिले के सरकारी और प्राइवेट अस्पताल प्रबंधन द्वारा अस्पतालों से निकलने वाले मेडिकल वेस्ट को सड़क व मैदान पर ही फेंक दिया जाता है। जो कि आमजन और जानवरों की जान को खतरा पहुंचा रहा है। नियमानुसार अस्पतालों से निकलने वाले मेडिकल वेस्ट को नष्ट कराया जाना चाहिए। लेकिन अस्पतालों से निकलने वाला मेडिकल वेस्ट कई दिनों तक सड़कों पर ही सड़ता रहता है। इसके सेवन से कई जानवरों की मौत भी हो चुकी है। यह मेडिकल वेस्ट काफी खतरनाक होता है। सडकों पर पड़ा मेडिकल वेस्ट शहर के लिए गंभीर मामला है। इसके बावजूद स्वास्थ्य विभाग द्वारा इस मामले में किसी प्रकार की गंभीरता नहीं दिखाई जा रही है।


अस्पतालों में रोजाना ही इंजेक्शन, सीरिंज, ग्लूकोज की बोतल, दस्ताने सहित अन्य सामग्री मेडिकल वेस्ट के रूप में निकल रही है। इसे नष्ट करने के लिए इंसीनेटर मशीन तक भिजवाया जाना चाहिए। लेकिन सरकारी और गैर सरकारी अस्पताल प्रबंधन द्वारा मेडिकल वेस्ट को नष्ट नहीं किया जाता और उसे अस्पतालों के बाहर सडकों और आस पास खुले में ही डलवाया जा रहा है। जो कई दिनों तक सड़कों और आस पास के खुले स्थान पर पड़ा रहता है। ऐसे में कई बार दस्तानों और पट्टियों पर लगे खून को आवारा जानवर चाटते रहते हैं। यह खून काफी खतरनाक हो जाता है। जिसके चलते इसे चाटने और खराब दवाओं के कारण जानवरों की हालत बिगडऩे लगती है और कई बार तो यह जानवर की मौत का कारण भी बन जाता है।

 

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अस्पताल प्रबंधन पर नहीं की जाती कार्रवाई :
अस्पताल परिसर में खुले में पड़े मेडिकल वेस्ट के कारण आने वाली दुर्गंध और यहां पनपने वाले संक्रामक जीवों के संपर्क में आने से स्वस्थ व्यक्ति भी बीमारियों का शिकार हो जाता है। ऐसे में उसे तुरंत उपचार की जरूरत पड़ती है। सड़क पर पड़े मेडिकल वेस्ट से आने वाली दुर्गंध के कारण कई बार लोग उल्टीयां कर देते हैं। जो कि लोगों के लिए सबसे खतरनाक साबित होता है। इसके बावजूद भी स्वास्थ्य विभाग द्वारा खुले में फैके जा रहे मेडिकल वेस्ट को लेकर अस्पताल प्रबंधनों पर कोई कार्रवाई नहीं कर रहा है। जिसका ही फायदा अस्पतालों के स्टाफ द्वारा बखूबी उठाया जा रहा है और मनमानी की जा रही है।

पैसा बचाने के लिए नहीं पहुंचाते इंसीनेटर तक :
अस्पताल में स्थापित इंसीनेटर में पंजीकृत स्वास्थ्य संस्थाओं से हर रोज मेडिकल वेस्ट जलने के लिए पहुंचाना होता है। इसके एवज में पलंग संख्या के हिसाब से राशि ली जाती थी। इसमें प्रति पलंग से निकलने वाले वेस्ट के एवज में करीब पांच रुपए लिए जाते हैं। ऐसे में पैसा बचाने के लिए ही अस्पताल प्रबंधनों द्वारा मेडिकल वेस्ट को स्थापित इंसीनेटर तक नहीं पहुंचाया जा रहा है।

जान को रहता है खतरा :
खुले में पड़े मेडिकल वेस्ट काफी खतरनाक होता है। यह वेस्ट संक्रामक बीमारियां फैलाते हैं। जिसका असर लोगों के फैफड़ों पर पड़ता है। मेडिकल वेस्ट के संपर्क में आने से संक्रामक जीवाणु लोगों के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और स्वस्थ व्यक्ति भी गंभीर बीमारी का शिकार हो जाता है। ऐसे में मरीजों को लंबे समय तक उपचार कराना पड़ता है। खुले में पड़े मेडिकल वेस्ट से लोगों की जान को खतरा बना रहता है।

नहीं होती है सही जानकारी :
अस्पताल, नर्सिंग होम और पैथोलॉजी सेंटर से बायो मेडिकल वेस्ट ज्यादा निकलते हैं। लेकिन यहां का स्टाफ इसे लेकर गंभीर नहीं होता है। कई बार यह भी देखने में आता है कि इन स्टाफ को इस तरह का वेस्ट रखने के बारे में ठीक तरह से जानकारी भी नहीं होती है। इस वजह से वह उसे प्रॉपर जगह पर नहीं रखते हैं। हॉस्पिटल वेस्ट, अस्पताल से निकलने वाले अवशिष्ट (बेकार पदार्थ) का सही प्रकार से निवारण करना आवश्यक होता है। नहीं तो यह कई प्रकार के संक्रामक और असंक्रामक रोग फैला सकते हैं जिससे अस्पताल के कर्मचारियों, रोगियों व पूरे समाज को नुक्सान होता है।

निजी अस्पताल खुले में फैकते में मेडिकल वेस्ट :
शहर में करीब एक दर्जन निजी अस्पताल और नर्शिग होम हैं। जो खुलेआम एनजीटी के नियमों को दरकिनार कर खुले में मेडिकल वेस्ट फैक रहे हैं। जिससे गंभीर बीमारी का खतरा बना रहता है। शहर के आकाशवाणी के पास स्थित नर्शिग होम द्वारा एसपी कार्यालय के पीछे गड्ढों में भारी मात्रा में प्रतिदिन मेडिकल वेस्ट फिकवाया जा रहा है। वहीं लोकनाथ पुरम, चौबे कॉलोनी, सटई रोड, पन्ना रोड, नारायणपुरा रोड सहित शहर के कई स्थानों में संचालित अस्पातल, नर्शिंग होम, क्लीनिक, पैथॉलोजी लेब आदि से निकलने वाले मेडिकल वेस्ट को सडों और आस पास के खुले स्थानों में फिकवाया जा रहा है। इसकी जानकारी होने के बाद भी स्वास्थ्य विभाग द्वारा कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं।

जिला अस्पताल वेस्ट स्टोर में नहीं खुले में फिकवाया जा रहा मेडिकल वेस्ट
जिला अस्पताल में सिविल सर्जन कार्यालय के पास में बायो मेडिकल वेस्ट स्टोज बनाया गया था। जहां पर अस्पताल से निकलने वाले मेडिकल वेस्ट को सुरक्षित रूप से स्टोर किया जा सके और बाद में उसे वहां से निकालकर उसका निराकरण किया जा सके लेकिन अस्पताल प्रबंधन की लापरवाह कार्य प्रणाली के चलते बायो मेडिकल वेस्ट रूम को नल फिटिंग का स्टोर रूप बना दिया गया और मेडिकल वेस्ट को पीएम हाऊस के पास खुले में फिकवाया जा रहा है।

औषतन प्रति बेड १ किला निकलता है मेडिकल वेस्ट
जिले में अनुमानित एक दिन में प्रति बेड अस्पताल में एक किलो पांच सौ ग्राम और हर क्लीनिक पर पांच सौ ग्राम प्रतिदिन मेडिकल वेस्ट, मेडिकल कूड़ा पाया जाता है। इस तरह से अगर कोई ५० से सौ बेड का अस्पताल है तो हर दिन वहां से ७५ से डेढ़ सौ किलो मेडिकल वेस्ट, मेडिकल कचरा निकलता है। ऐसा अनुमानित है कि इनमें से काफी मेडिकल वेस्ट घातक और संक्रामक होता है।

 

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रजिस्ट्रेशन हो सकता है रद्द
भारत सरकार द्वारा बायोमेडिकल अपशिष्ट (प्रबंधन और हैंडलिंग) नियम 1998 पारित किया है। जो कि सभी लोगों पर लागू होता है। जो ऐसे बायो मेडिकल कचरे को एकत्र करने, उत्पन्न करने, प्राप्त करने में, ट्रांसपोर्ट, डिस्पोस करते हैं या उनसे सम्बंधित डील करते हैं। यह नियम अस्पताल, नर्सिंग होम, क्लीनिक, डिस्पेंसरी, पशु संस्थान, पैथोलोजिकल लैब और ब्लड बैंक पर लागू होता है। ऐसे संस्थानों के लिए बायो मेडिकल वेस्ट, मेडिकल कचरे को ट्रीट करने के लिए अपने संस्थानों में मशीनें व आधुनिक उपकरण में लगाने ही होंगे। उनके पास इसके निराकरण के लिए उचित व्यवस्था का सर्टिफिकेट होना भी आवश्यक है। अगर किसी के पास यह सर्टिफिकेट नहीं मिलता है तो हॉस्पिटल का रजिस्ट्रेशन रद्द किया जाएगा।


इस तरह किया जाता है मेडिकल वेस्ट के सुरक्षित निराकरण
१- सेग्रीगेशन
इस प्रक्रिया में अलग-अलग अवशिष्ट पदार्थों को अलग रंगों के थैलों में डाला जाता है। जिससे सबका अलग तरह से निस्तारण किया जाता है।

२- पीला
ऐसे थैलों में सर्जरी में कटे हुए शरीर के भाग, लैब के सैम्पल, खून से युक्त मेडिकल की सामग्री (रुई, पट्टी) एक्सपेरिमेंट में उपयोग किए गए जानवरों के अंग डाले जाते हैं। इन्हें जलाया जाता है या बहुत गहराई में दबा दिया जाता है।

३- लाल
इसमें दस्ताने, कैथेटर, आईवीसेट, कल्चर प्लेट को डाला जाता है। इनको पहले काटते हैं फिर ऑटो क्लैव से डिस इन्फेक्ट करते हैं। उसके बाद जला दिया जाता है।

४- नीला या सफेद बैग
इसमें गत्ते के डिब्बे, प्लास्टिक के बैग जिनमे सुई, कांच के टुकड़े या चाकू रखा गया हो उनको डाला जाता है, इनको भी काट कर केमिकल द्वारा ट्रीट करते हैं फिर या तो जलाते हैं या गहराई में दफनाते हैं।

५- काला
इनमें हानिकारक और बेकार दवाइयां, कीटनाशक पदार्थ और जली हुई राख डाली जाती है। इसको किसी गहरे वाले गड्डे में डालकर ऊपर से मिट्टी दाल देते हैं और बाद में इनको डिस इन्फेक्ट करके नालियों में बहा दिया जाता है।

६- डिस इन्फेक्शन
इस प्रक्रिया द्वारा हानिकारक कीटाणुओं को हटा दिया जाता है। इसके कुछ विशेष तरीके हैं जैसे- थर्मल ऑटोक्लैव इससे गर्मी द्वारा कीटाणु नष्ट करते हैं। केमिकल द्वारा इसमें फॉर्मएल्डीहाइड, ब्लीचिंग पावडर, एथिलीन ओक्साइड से कीटाणु नष्ट करते हैं। रैडीएशन अल्ट्रा वोइलेट किरणों द्वारा कीटाणुओं का नाश करते हैं।

७- स्टोरेज
जब तक थैले पूरी तरह भर न जाएं तब तक अवशिष्ट पदार्थों को निश्चित जगहों पर थैलों में भरकर रखा जाता है। इन थैलों पर नाम लिखते हैं और सिक्यूरिटी गार्ड रखा जाता है। ताकि कोई बाहरी व्यक्ति या कूड़ा उठाने वाला उसे गलती से न ले जाए। बाद में अस्पताल की निश्चित गाडिय़ों में रखकर इन्हें जलाने या दफनाने भेजा जाता है।

८- ट्रांसपोर्ट
अवशिष्ट पदार्थों को अस्पताल के अंदर और बाहर ले जाया जाता है। जो कर्मचारी यह काम करते हैं वह अपने हाथ में दस्ताने पहनते हैं और यह ध्यान रखा जाता है कि यह पदार्थ बंद ट्रॉली में रखा जाता है।

एजेंसियां करती है ट्रीटमेंट
बड़े शहरों में कुछ एजेंसियां हर माह अस्पतालों से बायो मेडिकल वेस्ट कलेक्ट करके ले जाती हैं और उसी हिसाब से उनसे पैसे लेती हैं। इन एजेंसियों ने इस तरह के वेस्ट को ट्रीट करने के लिए अलग से प्लांट लगा रखे हैं। इन सभी को वहीं पर एकत्र करने के बाद उसे ट्रीट किया जाता है।

बोले अधिकारी
ेजिला अस्पताल में एक एजेंसी द्वारा सभी प्रकार का मेडिकल वेस्ट वाहनों द्वारा ले जाती है और सभी निजी अस्पतालों, क्लीनिक आदि संचलकों को सख्त निदेश दिए थे कि खुले में मेडिकल वेस्ट नहीं फेंका जाए। अगर कहीं भी खुले में मेडिकल वेस्ट फिकवाया जा रहा है। तो इसकी जांच कराई जाएगी। जांच में गलती पाए जाने पर कडी कार्रवाई की जाएगी।
डॉ. वीएस वाजपेई मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी छतरपुर

 

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