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पंचायत चुनाव बाद फिर शुरु हुआ पलायन, ओवरलोड चल रही ट्रेन-बसें


गांव में काम-दाम और रोटी न मिलने से हर साल हो रहा जिले से पलायन
पलायन रोकने की मनरेगा योजना का भी नहीं मिल रहा सहारा

छतरपुर

Updated: July 12, 2022 04:55:36 pm


छतरपुर। पंचायत चुनाव संपन्न होते ही प्रवासी मजदूर महानगरों की ओर परिवार सहित वापसी करने लगे हैं। रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड पर प्रवासी मजदूर अपने परिवार व गृहस्थी के सामान के साथ बड़ी संख्या में नजर आने लगे हैं। गांव से बोरिया बिस्तर समेटकर काम-दाम और रोटी के लिए महानगरों की ओर पलायन का ये सिलसिला त्योहारों के बाद हर साल नजर आता है, लेकिन सात साल बाद हुए पंचायत चुनाव के बाद भारी भीड़ वापसी कर रही है, वापसी का ये सिलसिला अगले एक सप्ताह तक ऐसे ही जारी रहेगा। ग्रामीण कानपुर, दिल्ली, मुंबई, चंडीगढ़, हैदराबाद, गुजरात के शहरों सहित अन्य महानगरों में अपने काम पर वापस लौट रहे हैं।
 हो रहा जिले से पलायन
हो रहा जिले से पलायन
ट्रेनें, बसे चल रही फुल
दरअसल, बुंदलेखंड में बेरोजगारी एक बड़ा मुद्दा है। पानी की कमी के कारण खेती का भी सहारा नहीं है। ऐसे में ग्रामीण पेट पालने के लिए महानगरों के लिए पलायन करने को मजबूर है। पंचायत चुनाव में वोट डालने परिवार सहित आए प्रवासी मजदूरों की वापसी शुरु हो गई है। हरपालपुर स्टेशन, छतरपुर बस स्टैंड से मजदूर बड़ी संख्या में रोजाना वापसी कर रहे हैं। ट्रेन हो या बसें, सभी ओवरलोड चल रही हैं। दिल्ली बस संचालक जावेद खान ने बताया कि चुनाव के बाद प्रवासियों की वापसी शुरु हो गई है, जिससे भीड़ अचानक बढ़ गई है। उनका अनुमान है कि इस तरह की भीड़ अभी एक सप्ताह तक जारी रहेगी। वही, मोंटू का कहना है कि जुलाई माह में बसों के लिए सवारियों की हमेशा कमी रहती थी। लेकिन इस बार चुनाव के लिए आए ग्रामीण वापसी कर रहे हैं, जिससे ट्रैफिक बढ़ा है।
ये कहना है ग्रामीणों का
इमलिया गांव निवासी मजदूर प्रकाश बरार ने हरपालपुर स्टेशन पर अपने साथियों के साथ दिल्ली शहर के लिए ट्रेन पकड़ी। जाने से पहले उन्होंने बताया कि वोट डालने के लिए हमें अपने गांव के एक प्रत्याशी ने बुलाया गया था। उन्होंने दिल्ली से गांव तक यात्रा के लिए हमारी व्यवस्था की और भुगतान किया। अब, हम वापस जा रहे हैं। ईट भट्टो पर मजदूरी करते हैं। उन्होंने ये भी बताया कि जिले में पंचायतों में मनरेगा योजना से मजदूरी नही मिलने से गांव में मजदूरों को और भी दयनीय स्थिति हैं। जिले में अमृत सरोवर तालाबो के निर्माण में मनरेगा की जगह मिट्टी खुदाई मशीनों से लोगों को काम नहीं मिल रहा हैं। इसलिए कोई चाहकर भी गांव में रुक नहीं पा रहा है। धनीराम, दया, भगुंता का कहना है कि ऐसी योजना किस काम की जो न तो काम दे सके न समय पर मजदूरी। तोलाराम आदिवासी ने बताया कि खेत में सिंचाई न होने से इस बार खेती सही नहीं है। गांव में काम भी नहीं है ऐसे में घर में चुटकी भर अनाज नहीं है। गांव में जो काम होते हैं, वे मशीन से कराए जाते है। कभी-कभी पांच-छह दिन काम मिलता है, तो 25 दिन खाली बैठना पड़ता है। पैसा मिलने में देर होने से परिवार का पेट पालना मुश्किल हो गया, इसीलिए हमें पलायन करना पड़ता है।
मनरेगा नहीं रोक पा रही पलायन
सरकार ने आम गरीबों को गांव में ही रोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से वर्ष 2005 में पंचायतों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी यानि मनरेगा योजना लागू की है। दुनिया की सबसे बड़ी इस योजना का मूल उददेश्य आस्था व श्रम मूलक कार्य कराके लोगों को काम उपलब्ध कराके उनका पलायन रोकना था, मगर ऐसा हो नही सका। सही मायने में अधिकारियों से लेकर पंचायत प्रतिनिधियों तक सभी मनरेगा से मलाई खा रहे हैं, वहीं जरूरतमंद ग्रामीण परेशान हैं। सच्चाई ये है कि एक तो 90 प्रतिशत ग्राम पंचायतों में कार्य नहीं हो रहे हैं, जो कार्य होते भी हैं वे कागजों पर पूर्ण करके राशि आहरित कर ली जाती है। तालाब गहरीकरण, मिट्टीकरण, पौधरोपण, नाला सफाई के काम मनरेगा वाले अधिकांश काम मशीनों से कराए जा रहे हैं। वहीं कई काम कराए बिना ही मजदूरी तथा मटेरियल के नाम पर फर्जी मस्टर व फर्जी बिलों से राशि निकाल ली जाती है।
फैक्ट फाइल

जिले में गांव - १२१०
आबादी- 1762857
पलायन प्रभावित गांव- 800 करीब
प्रवासी मजदूर - 80 हजार
चुनाव बाद पलायन- 50 हजार

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