scriptHaven't asked for years, yet mother does not listen to the evil of son | वर्षो से नहीं पूछा हाल, फिर भी मां नहीं सुनती बेटों की बुराई | Patrika News

वर्षो से नहीं पूछा हाल, फिर भी मां नहीं सुनती बेटों की बुराई

जिस बेटे की परवरिश में अपनी खुशिओ का जीवन भर किया त्याग, उन्ही ने वृद्धा आश्रम में भेजा

ह्यूमन एंगल-

छतरपुर

Updated: June 06, 2022 06:37:39 pm


छतरपुर. शहर के वृद्धा आश्रम में रह रही 14 माताएं आधुनिक कहे जाने वाले समाज पर तंज है। इन्हें उनके उन बेटों ने बुढापे में वृद्धाआश्रम में छोड़ दिया, जिनकी परवरिश के लिए इन्होंने जीवन भर खुशियों का त्याग किया। बेटों ने मुंह मोड़ लिया, लेकिन अभी भी इन माओं के हद्य में उनके प्रति ममता छलकती है। आश्रम में छोडऩे के बाद भले ही बेटों ने कभी मुड़कर नहीं देखा लेकिन फिर भी मां तो मां होती है, वे आज भी अपने बेटों की बुराई नहीं सुनती हैं। वृद्धा आश्रम में रह रही 14 माओं को भले ही अपनों का सहारा न रहा हो, लेकिन जिंदगी के अंतिम पड़ाव में वे मिलजुलकर एक दूसरे का दुख-दर्द बांट रही हैं।
बेटों ने छोड़ा, फिर भी मां कह रही उनकी गलती नहीं
बेटों ने छोड़ा, फिर भी मां कह रही उनकी गलती नहीं
बच्चों ने परेशान किया तो आश्रम में लेनी पड़ी शरण
बड़ामलहरा की गिरजा देवी ७१ साल की हो चुकी हैं। उनकी खुद की कोई संतान नहीं हुई तो वंश चलाने के लिए उन्होंने पति की दूसरी शादी के लिए सहमति दे गी। दूसरी पत्नी से बच्चे हुए , लेकिन वर्ष 2017 में डिप्टी रेंजर रहे पति की मौत के बाद बच्चो ने परेशान करना शुरु कर दिया। इससे तंग आकर गिरजा खुद ही आश्रम में रहने आ गई। अब उन्हें आश्रम में 14 साल हो गए हैं। लेकिन अब भी वे कहती है बेटा कपूत हो सकता है। पर मां हमेशा उसका भला ही चाहती है।
परेशान होकर आए आश्रम
लवकुशनगर निवासी ८० बसंत पार कर चुकी कमालदेवी और उनके पति एक साल से आश्रम में रह रहे हैं। पति पटवारी रहे हैं। लेकिन दुर्भाग्य से बेटा अब इस दुनिया में नहीं है। पोता विवाद करता, इसलिए तंग आकर दोनों आश्रम में आ गए। अब यही उनकी जिंदगी गुजर रही है। पोता केवल पेंशन लेने के लिए उन्हें फोन करता है। फिर भी वे आश्रम में खुशी से रह रहे हैं। उन्हें अब भी दुख नहीं कि बेटे का बेटा क्या कर रहा है। उन्हें अब आश्रम ही घर और परिवार लगता है।
बेटों ने छोड़ा, फिर भी मां कह रही उनकी गलती नहीं
70 साल की लक्ष्मी चौहान के 2 बेटे व चार बेटियां हैं। लेकिन फिर भी उन्हें आश्रम में रहना पड़ रहा है। मां की ममता ऐसी है कि अब भी बेटों से मिलने की ललक है, लेकिन मजबूर हैं। बस राह देखती है कि शायद कभी कोई बेटा-बेटी उनसे मिलने आ जाए। इसी तरह दो बेटों की मां 72 वर्षीय शांति बाई भी आश्रम में रह रही हैं। एक बेटा दिव्यांग है, दूसरा सैलून चलाकर परिवार चलाता है। बुढ़ापे में जब उन्हें सहारे की जरूरत थी, तब उन्ही बेटों ने जिन्हें उन्होंने उंगली पकड़कर चलाना सिखाया, आश्रम में छोड़ दिया। शाङ्क्षत देवी कहती है बेटे क्या करते, बहू से नोक झोंक होने लगी थी। मुझे परेशान नहीं देख सकते थे, इसलिए आश्रम में छोड़ गए। दुख केवल इतना है कि आश्रम छोडऩे के बाद बेटों ने कभी हाल नहीं पूछा। लेकिन कोई बात नहीं बेटा भी मजबूर है।

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