नई पीढ़ी को संगीत की बारीकियां सिखाकर बना रहे संगीत के साधक

नई पीढ़ी को संगीत की बारीकियां सिखाकर बना रहे संगीत के साधक
New generation music seekers

Neeraj Soni | Updated: 25 Jun 2018, 01:52:10 PM (IST) Chhatarpur, Madhya Pradesh, India

पिता से मिली संगीत की विरासत के लिए डॉ. उमाशंकर ने कर दिया जीवन समर्पित

छतरपुर। शहर में एक ओर जहां संगीत के नाम पर केवल प्रोफेशनल एजुकेशन दी जा रही है, वहीं दूसरी ओर एक संगीत के साधक अपनी पीढिय़ों की विरासत को सहेजकर संगीत के क्षेत्र में हुनरमंद प्रतिभाओं को गढऩे में लगे हैं। लंबे समय तक शासकीय सेवा में रहते हुए लोगों को संगीत की साधना से जोड़कर और उन्हें सात स्वरों की शिक्षा देकर आदर्श संगीतज्ञ बनाने वाले डॉ. उमाशंकर स्वर्णकार बुंदेलखंड के संगीत शिक्षकों के बीच एक स्थापित नाम है। संगीत से एमए और गोल्ड मेडलिस्ट होने के साथ ही वे एक संगीत घराने का प्रतिनिधित्व भी कर रहे हैं। अपने पिता श्री स्वामीप्रसाद से बचपन में उन्होंने संगीत की शिक्षा लेकर एक संगीत साधक के रूप में खुद को गढ़ा और फिर पूरा जीवन संगीत साधना में लगा दिया। सरकारी सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर नई पीढ़ी के लोगों को संगीत से जोडऩे के लिए एक निजी संगीत महाविद्यालय खोलकर संगीत की साधना करने में लगे हैं।
शहर के सागर रोड स्थित डॉ. उमाशंकर विनोद संगीत एवं कला महाविद्यालय छतरपुर में करीब सौ से ज्यादा छात्र-छात्राएं संगीत की शिक्षा ले रहे हैं। गरीब और जरूरतमंद संगीत साधकों को निशुल्क शिक्षा मिल रही है। अभी भी इस संस्था में १८ छात्रों को संगीत की निशुल्क शिक्षा दी जा रही है। यहीं कारण है कि इस संस्था के विद्यार्थी पिछले दो सालों से विश्वविद्यालय स्तर पर भी टॉप कर रहे हैं। इस संस्था के संचालक डॉ. उमाशंकर कला के क्षेत्र की अनेक उपाधियों और पुरस्कार से सम्मानित होने के बाद भी अपनी संगीत साधना में लगे हैं। उनके द्वारा शिक्षित किए गए कई छात्र आज देश के कई प्रतिष्ठित मंचों और क्षेत्रों में सेवाएं दे रहे हैं। उनकी इस संगीत सेवा को देखकर पिछले दिनों जिले में संगीत कॉलेजों का निरीक्षण करने आए राजा मानसिंह संगीत एवं कला विश्वविद्यालय के दल ने भी इनका काम देखकर न सिर्फ संतोष जताया, बल्कि खुले दिल से उनकी तारीफ की। उन्होंने इस संस्था को संगीत के आदर्श संस्थान के रूप में भी पाया है और बीए से लेकर एमएम संगीत की निरंतरता-संबद्धता की अनुशंसा भी की है।
शिक्षा के प्रति समर्पित रहा पूरा जीवन :
डॉ. उमाशंकर स्वर्णकार का पूरा जीवन शिक्षा के प्रति समर्पित रहा। उन्होंने संगीत से एमए के अलावा हिंदी, संस्कृत और भाषा विज्ञान विषय में भी एमए किया है। १९९० में उन्होंने घुवारा के डिग्री कॉलेज से प्राध्यापक के रूप में सेवाएं दी। इसके बाद वे नौगांव के बापू डिग्री कॉलेज में भी सेवाएं देते रहे। छतरपुर में सन् १९७९ को आयोजित किए गए संभागीय बसंत उत्सव समारोह में प्रथम स्थान प्राप्त करने के लिए उन्हें सम्मानित किया गया। १९८६ में इलाहाबाद से संगीत प्रभाकर करने के बाद उन्हें गोल्ड मैडल से सम्मानित किया गया। हिंदी से पीएचडी करने के बाद डॉ. उमाशंकर को १० मई २०१५ को बुंदेलखंड विश्वविद्यालय झांसी द्वारा प्राचार्य पद पर नियुक्त किया गया। लेकिन संगीत में उनका मन ऐसा रमा कि उन्होंने एक साल बाद ही सरकारी सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर बाकी का जीवन संगीत के क्षेत्र को आगे बढ़ाने के लिए समर्पित कर दिया। डॉ. उमाशंकर बताते हैं कि उन्होंने अपने पिता की संगीत साधना को बेहद करीब से देखा है। उनसे प्रेरित होकर संगीत में ऐसा मन लगा कि पूरा जीवन इसी के लिए समर्पित हो गया।
पूरा परिवार संगीत के प्रति समर्पित है :
डॉ. उमाशंकर का पूरा परिवार संगीत के प्रति समर्पित है। उनकी पत्नी शासकीय शिक्षक होते हुए भी संगीतज्ञ हैं। वहीं उनके दोनों बेटे सत्यम और शिवम भी संगीत विद्या में पारंगत है। अच्छे अधिवक्ता होने के साथ ही वे कुशल संगीतज्ञ भी हैं। पूरा परिवार शहर सहित जिले के संगीत प्रेमी छात्रों को संगीत कला का हुनर सिखाने में लगा है।

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