scriptPolice negligence in missing cases, action being taken after 24 hours | गुमशुदगी के मामलों में पुलिस द्वारा बरती जा रही कोताही, २४ घंटे बाद की जा रही कायमी | Patrika News

गुमशुदगी के मामलों में पुलिस द्वारा बरती जा रही कोताही, २४ घंटे बाद की जा रही कायमी

कई सालों से गुम हुए लोगों को नहीं ढूंढ पा रही जिले के थानों की पुलिस, थानों के चक्कर लगा रहे पीडि़त

छतरपुर

Published: December 22, 2021 05:01:32 pm

उन्नत पचौरी
छतरपुर। जिले में क्राइम के साथ-साथ बच्चे, किशोरी, महिलाऐं व वृद्धों के गुम होने की सूचनाऐं आए दिन मिल रही हैं। लोगों के बच्चे या परिवार को कोई भी गुम होने पर वह खुद उसे खोजने की कोशिश करता है, साथ ही पुलिस को इसकी सूचना देता है। लेकिन ऐसे मामलों में पुलिस द्वारा २४ घंटों के बाद ही मामला दर्ज की जा रही है। जिससे गुम होने वाला बलक या व्यक्ति काफी दूर निकल जाता है और फिर सालों तक उसे डूढने के लिए परिजन पुलिस के चक्कर लगाते रहते हैं। ऐसे में ही जिले में बडी संख्या में मामले में पेंडिग में पडे हैं। लेकिन इसके बाद भी जिले में पुलिस द्वारा लगातार गुमसुदगी के मामलों में कौताही बरती जा रही है। सिटीजन एमपीपुलिस पोर्टल के अनुसार २१ दिसम्बर २०२० से लेकर २१ दिसम्बर २०२१ के बीच में जिले के सभी थानों में कुए ६४९ गुम इंसान की कायमी की गई हैं। जिसमें से अभी तक सभी लापता हैं। छतरपुर जिले में क्राइम को कंट्रोल करने के लिए ३४ थाना है और पुलिस चौकी सहित स्टाफ है। लेकिन इसके बाद भी बच्चों आदि के लापता होने या अपहरण के मामले की जांच पुलिस गंभीरता नहीं दिखा पा रही है। बच्चों के लापता होने या अपहरण के मामले की जांच पुलिस गंभीरता से करे तो उन्हें कुछ ही घंटों में खोजा जा सकता है। पुलिस की लचर कार्य प्रणाली के चलते शुरुआती २० से 30 घंटे तक इस तरह के मामले को गंभीरता से नहीं लिया जाता। यहीं कारण है कि इस दौरान क्राइम ऑफ सीन (घर छोडऩे का सही कारण या समय) के साथ बच्चा भी घर से दूर निकल जाता है। ऐसे में अगर पुलिस समय रहते कार्रवाई करें तो बच्चे के लापता होने के कुछ घंटों में ही उसे बरामद किया जा सकता है। हालाकि छतरपुर एएसपी विक्रम सिंह के बताए अनुसार पुलिस द्वारा १ जनवरी २०२१ से लेकर ३० नवम्बर तक कुल ३१४ गुमइंसानों को खोजा है, जिसमें ४६ बालक हैं और २६८ बालिकाएं हैं। इस वर्ष कुल २२५ गुम इंसान की कायमी हुई है और पुरानी पेंडेंसी २१७ है। जिसे हम जल्द ही कवर करने की कोशिश कर रहे हैं।
गुमशुदगी के मामलों में पुलिस द्वारा बरती जा रही कोताही, २४ घंटे बाद की जा रही कायमी
गुमशुदगी के मामलों में पुलिस द्वारा बरती जा रही कोताही, २४ घंटे बाद की जा रही कायमी
शुरुआती घंटों में पुलिस नहीं देती ध्यान
थाना के रजिस्टर में संबंधित बच्चे की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज होने के बाद पुलिस अपनी ड्यूटी पूरा होना मान लेती है। गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज होने के करीब 10 से 15 घंटे के बाद बच्चे की रिपोर्ट और फोटो को डीसीआरबी (डिस्ट्रिक्ट क्राइम रिपोर्ट ब्यूरो) में भेज कर इसे संबंधित साइट पर अपलोड किया जाता है। इस दौरान पुलिस या थाने से आसपास की चौकी या जनपद के अन्य थानों को वायरलेस पर कोई सूचना नहीं दी जाती है। जानकारों की मानें तो पुलिस को किसी भी बच्चे के लापता या अपहरण होने की स्थिति में तुरंत वायरलेस सेट पर उसकी सूचना जनपद की पुलिस के साथ आसपास के जिले, बस स्टैड और रेलवे स्टेशन पर करनी चाहिए। इतना ही नहीं लापता होने के कुछ घंटों के भीतर सार्वजनिक स्थानों पर पुलिस को लापता बच्चे के पोस्टर या फोटो चस्पा भी कराने चाहिए, लेकिन कागजों में तो पुलिस यह सभी कार्रवाई पूरी कर लेती है। लेकिन कुछ ही परिजन इतने जागरूक होते है जो अपने स्तर से सार्वजनिक स्थान पर लापता बच्चे का पोस्टर या फोटो चस्पा करते हैं।
कई बार मौके पर नहीं पहुंचती पुलिस
किसी भी थाना क्षेत्र से बच्चे के लापता या किडनैप होने की स्थिति में पीडि़त स्थानीय पुलिस या कंट्रोल रूम को फोन कर घटना की जानकारी देता है। अधिकांश मामलों में पुलिस मौके पर नहीं पहुंचती। पीडि़त खुद स्वयं ही थाना या चौकी पहुंचते हैं और शिकायत देते हंै। इस दौरान पहले २४ घंटे बाद थाना आने के लिए कहते और २४ घंटे बाद पुलिस शिकायतकर्ता से बच्चे के अगल-अलग साइज के फोटो लेती है। अगर पीडि़त आलाधिकारियों के आदेश पर थाने पहुंचा है तो उसकी रिपोर्ट तुरंत दर्ज कर लेती है। अगर पीडि़त खुद ही सीधे थाने पहुंचता है तो गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराने के नाम पर उसे पुलिस को हजारों रुपए पोस्टर और पंपलेट छपवाने के नाम के देने होते हैं।
परिवानों पर बनाया जाता है दबाव
ज्यादातर केस में पुलिस बच्चे के मोबाइल की लोकेशन निकला लेती है, लापता होने के बाद लोकेशन तक पुलिस स्वयं अपने संसाधनों से नहीं पहुंचती है। इसके लिए वह पीडि़त परिजनों से आर्थिक मदद के साथ संसाधनों तक की मदद मांगती है। कई मामलों में पीडि़त परिजन मदद करने की स्थिति में नहीं होते। ऐसे में पुलिस बच्चे को खोजने की कार्रवाई बीच में ही छोड़ देती है।
प्रेम-प्रसंग का केस मान की जा रही लापरवाही
आम तौर पर पुलिस नाबालिक लड़की या लड़कों के लापता होने की स्थिति में 90 फीसदी मामलों को प्रेस-प्रसंग का मान कर स्वयं घर छोडऩा मानती है। ऐसे में पुलिस बच्चों की तलाश में कोई कार्रवाई नहीं करती है। ऐसे में परिजन परेशान होते रहते हैं और उच्चाधिकारियों के पास शिकायतें करने के बाद रिपोर्ट दर्ज करते हैं और अधिक दबाव होने पर कई महीनों बाद उन्हें तलाश करती है।
इनका कहना है
नाबालिग होने की स्थिति में पुलिस को तत्काल ही अपहरण का मामला दर्ज करने के निर्देश हैं और बडे लोगों के गुम होने पर पुलिस द्वारा पहले परिजनों से अपने स्तर पर पता लगाने की बात कह दी जाती है। हालाकि परिजन चाहें तो तत्काल ही गुम इंसान दज्र करा सकते हैं।
विक्रम सिंह, एएसपी, छतरपुर

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