ट्यूशन पढ़ाने से की शुरुआत, मेहनत और संघर्ष की दम पर शुरु किया जिले का पहला निजी विश्वविद्यालय

पहला कॉलेज खोलने की मान्यता के लिए तीन दिन तक ढूंढा एनसीटीई का दफ्तर, नहीं मानी हार
मुश्किलें आईं लेकिन नहीं छोड़ा हिम्मत का साथ, लगातार मेहनत कर पाई सफलता
युवा दिवस विशेष

By: Dharmendra Singh

Published: 11 Jan 2021, 08:33 PM IST

छतरपुर। मेहनत, लग्न से कोई भी काम किया जाए तो मुश्किलें भी रास्ता नहीं रोक पाती हैं। किसी काम की शुरुआत में मुश्कि लें आने पर कदम पीछे हटा लेने वाले कभी सफल नहीं होते हैं और जो मुश्किलों से हौसले के साथ जूझ जाते हैं, उन्हें एक न एक दिन सफलता मिल ही जाती है। छतरपुर के युवा व श्रीकृष्णा विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ. बृजेन्द्र सिंह गौतम की कहानी युवाओं के लिए प्रेरणा बन गई है। जिन्होंने एक सामान्य शिक्षक की तरह अपने करियर की शुरुआत की और मेहनत, लग्न, ईमानदारी और संघर्ष की दम पर एक मुकाम बनाया है। कैमिस्ट्री की कोचिंग से शुरुआत करने वाले गौतम जिले की पहले व बुंदेलखंड के दूसरे निजी विश्वविद्यालय के संस्थापक हैं। सामान्य परिवार में जन्में गौतम ने शिक्षा के क्षेत्र में जिले के लिए सराहनीय कार्य करते हुए युवाओं के लिए एक उदाहरण पेश किया है।

केमिस्ट्री के शिक्षक से शुरु किया करियर
हमीरपुर जिले के मुड़ेला गांव में जन्में, नवोदय विद्यालय और छतरपुर के महाराजा कॉलेज, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय से एमएड और अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय से पीएचड़ी करने वाले डॉ. बृजेन्द्र सिंह गौतम ने वर्ष 200 में केमिस्ट्री के शिक्ष क के रुप में अपने करियर की शुरुआत की। उस समय जिले से मेडिकल व आइआइटी में छात्रों का कम सिलेक्शन हो पाता था, इसलिए डॉ. गौतम ने कैमिस्ट्री पर फोकस किया ताकि जिले के छात्रों को बड़े एग्जाम निकालने में मदद मिले। ट्यूशन पढ़ाने के दौरान ही उन्होंने 2005 में बीएड कॉलेज खोलने का विचार बनाया और यहीं से उच्च शिक्षा के क्षेत्र में काम शुरु किया। एक के बाद एक कई कॉलेज मध्यप्रदेश व उत्तर प्रदेश में खोलने के बाद डॉ. गौतम ने वर्ष 2018 में जिले के पहले निजी विश्वविद्यालय की स्थापना की। भगवान श्रीकृष्ण व विवेकानंद को अपना आर्दश मानने वाले सरल स्वभाव के डॉ. गौतम शिक्षा जिले के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बन गए हैं।

शुरुआत में आई बहुत मुश्किलें
डॉ. बृजेन्द्र सिंह गौतम ने पत्रिका से बातचीत में बताया कि जब उन्होंने बीएड कॉलेज खोलने का विचार बनाया तो वे मान्यता के संबंध में जानकारी लेने एनसीटीई(राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद) के क्षेत्रीय कार्यालय भोपाल पहुंचे। जब वे एनसीटीइ कार्यालय पहुंचे तो वहां भवन पर मानस भवन लिखा हुआ था और अंदर शादी समारोह चल रहा था। तो वे बाहर निकल आए और आसपास के लोगों से एनसीटीई का ऑफिस का पता पूछकर बार-बार मानस भवन पहुंच जा रहे थे। लेकिन कहीं भी एनसीटीई का बोर्ड नहीं दिखता, इस तरह दिन निकल गया और वे वापस लौट गए। लेकिन अगले दिन फिर ऑफिस खोजने आए। तो मानस भवन के पास देखा कि कई राज्यों के नंबर प्लेट के वाहन से लोग आ रहे हैं और अंदर जा रहे हैं। डॉ. गौतम जब उन लोगों के पीछे मानस भवन में अंदर गए तो एक छोटे से बोर्ड में एनसीटीई लिखा नजर आया। लेकिन उस समय सात राज्यों के बीएड कॉलेज की मान्यता देने वाली सरकारी संस्था के कार्यालय को देखकर उनके मन में प्रश्न आया कि कहीं गलत जगह तो नहीं आ गए। फिर भी वे ऑफिस के क्लर्क से मिले और बताया कि उन्हें बीएड कॉलेज खोलना है। तो बाबू ने सभी पक्रिया बताते हुए कहा कि एफडीआर भी जमा करनी होगी। डॉ. गौतम को लगा कि ऐसा तो नहीं कोई फर्जी संस्थान ठगी कर रहा है, तो उन्होंने क्षेत्रीय प्रबंधक से उनकी मान्यता पूछ ली। जिस पर उन्होंने कहा कि कॉलेज खोलने आए हो या मजाक करने। इसके बाद गौतम वापस लौट आए। लेकिन अगले दिन फिर वहां पहुंचे और पूरे दिन कार्यालय की गतिविधियों पर नजर रखी और लौट गए। उसके अगले दिन क्षेत्रीय मैनेजर के घर पहुंच गए और उन्हें ईमानदारी से अपनी शंका के बारे में बताया। क्षेत्रीय प्रबंधन ने उनकी बात समझी और उन्हें कॉलेज खोलने की पूरी प्रक्रिया बताने के साथ ही उनकी बेबाकी की तारीफ करते हुए कॉलेज खोलने में मदद की। इस तरह से चार दिन परेशान होने के बाद भी डॉ. गौतम ने हिम्मत नहीं हारी और अंतत: बीएड कॉलेज खोल लिया। इसके बाद ही उनका करियर उच्च शिक्षा की दिशा में बढ़ गया और आज वे श्रीकृष्णा विश्वविद्यालय के कुलाधिपति हैं।

Dharmendra Singh
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