scriptThe sweetness of Bundeli is visible in the cinema: Arif Shahdoli | बुंदेली की जो मिठास है, वो सिनेमा में दिखाई दे रही है: आरिफ शहडोली | Patrika News

बुंदेली की जो मिठास है, वो सिनेमा में दिखाई दे रही है: आरिफ शहडोली

locationछतरपुरPublished: Dec 19, 2023 11:18:32 am

Submitted by:

Dharmendra Singh

साक्षात्कार
झांसी निवासी फिल्म कलाकार आरिफ शहडोली से खास बातचीत, बुंदेली बोली का बॉलीवुड में बढ़ा क्रेज

आरिफ शहडोली, फिल्म कलाकार व लेखक
आरिफ शहडोली, फिल्म कलाकार व लेखक
छतरपुर. फिल्म गुठली लड्डू से चर्चा में आए झांसी निवासी कलाकार आरिफ शहडोली ने खजुराहो फिल्म फेस्टिवल में पत्रिका से खास बातचीत में बॉलीवुड में बुंदेली बोली के बढ़ते क्रेज, फिल्म फेस्टिवल से खजुराहो व ग्रामीण अंचल के युवाओं को मिलने वाले मंच, फिल्मी करियर के बारे में बेबाकी से बात रखी।
आरिफ शहडोली, फिल्म कलाकार व लेखकप्रश्न- बॉलीवुड फिल्म व धारावाहिक में बुंदेली बोली को आप कहां पाते हैं? क्या बुंदेली बोली लोकप्रियता पा रही है?
उत्तर-बुंदेली लोकप्रियता पा रही है। बुंदेली की जो मिठास है, वो सिनेमा में दिखाई दे रही है। श्याम बैनेगल ने जब समर फिल्म बनाई, तो उन्होंने सागर में शूटिंग की। बुंदेली बोली,बुंदेली आल्हा, बुंदेली राई का प्रयोग हुआ। राजा बुंदेला ने प्रथा फिल्म बनाई तो उसमें बुंदेली का प्रयोग किया। राम बुंदेला ने किसने भरमाया लखन फिल्म बनाई तो बुंदेली का इस्तेमाल हुआ। शेखर कपूर ने बेंडिट क्वीन बनाई, उसमें भी बुंदेली को जगह मिली। एलिक्स हिन्दुस्तानी फिल्म बनी, उसमें भी बुंदेली बोली का प्रयोग हुआ। अभी मैने गुठली लड्डू फिल्म में काम किया। कोलकाता फिल्म फेस्टिवल में इस फिल्म को रीजनल स्लाट में बेस्ट डायरेक्टर का अवॉर्ड मिला। ये फिल्म कांस, बर्लिन समेत 51 जगह गई, कई अवॉर्ड़ जीते। बूंद फिल्म बनी है, उसमें बुंदेली है। गुडिय़ा सीरियल में बुंदेली, हप्पू सिंह भी बुंदेली का प्रयोग कर रहे हैं।
आरिफ शहडोली, फिल्म कलाकार व लेखकप्रश्न- कांस और कोलकाता फिल्म फेस्टिवल में बुंदेली बोली को खूब सराहा गया, क्या हम अपनी मातृभाषा में भी पर्दे पर अपनी पहचान बना सकते हैं?
उत्तर- निश्चित तौर पर बुंदेली बोली को सिने जगत, सोशल मीडिया पर लोग पसंद कर रहे हैं। टपरा टॉकीज में बुंदेली कलाकार की लाड़ली बहू फिल्म दिखाई गई। पिंटू यादव के 2 लाख फॉलोवर है, वर्षा सिंह के डेढ लाख फॉलोअर है। पिछले दिनों भोपाल में 25 बुंदेली कलाकार मिले। उन्होंने अपनी जड़ को पकड़ रखा है। जैसे साउथ की फिल्मों ने उन्होंने अपनी जड़ को पकड़ रखा है। हमारे बुंदेलखंड के जो यूथ है, वे बुंदेली में ही फिल्म बना रहे हैं। जैसे हमारे सुनील जी है, उन्होंने बुंदेली में आओ जीजा फिल्म बनाई, जो सर्वाधिक चर्चित रही। बुंदेली बोली को लेकर हो रहे प्रयास अब बड़ा आकार ले रहे हैं। खजुराहो फिल्म फेस्टिवल के जरिए भी मंच मिल रहा है। तकनीक सीखने को मिल रही है।
आरिफ शहडोली, फिल्म कलाकार व लेखकप्रश्न- बुंदेलखंड से मायानगरी में अपनी पहचान बनाने के लिए युवा आगे आने लगे है, इसमें खजुराहो फिल्म महोत्सव की भूमिका को आप कैसे देखते हैं।
उत्तर- मायानगरी में कहानी लेकर कौन जाएगा। हमारे जैसे लोग ही जाएंगे। खजुराहो फिल्म फेस्टिवल के जरिए मायानगरी में फेस वेल्यू मिलती है। आपको वहां कौन पहचानेगा। जो खजुराहो फिल्म फेस्टिवल में मायानगरी के कलाकारों से मिलते है, तो उन्हें सुना जाता है। फेस्टिवल के जरिए नए युवाओं को मायानगरी में बात करने व मंच मिलने का अवसर मिलता है। सबसे बड़ी बात है, यहां से जो प्रतिभा वहां जाएगी, वो अपनी संस्कृति लेकर जाएगी। ऐसे ही बुंदेली बढ़ेगी। मणिरत्नम की फिल्म रावण में बुंदेली बैकड्राप इस्तेमाल किया गया है। खजुराहो फिल्म फेस्टिवल के जरिए ही युवाओं को इस तरह अवसर मिल रहा है।
आरिफ शहडोली, फिल्म कलाकार व लेखकप्रश्न- ओटीटी, सिनेफ्लैक्स के जमाने में टपरा टॉकीज से छोटे-छोटे व नए निर्देशकों को कैसे मंच मिल रहा है?
उत्तर- तकनीकि कुछ भी हो पानी पीने, चलने का का तरीका तो वही रहेगा न। खजुराहो फिल्म फेस्टिवल में हम किसी की फिल्म को रिजेक्ट नहीं करते। ताकि वे सीख सके। तकनीक के प्रभाव को सीखे। अभिनय व फिल्म बनाने की कला की बारीकियों को सीखें। तकनीकि सीखना जरूरी है। तकनीकि सीखने से आप धीरे-धीरे कैमरा के सामने पहुंच जाएंगे। फिल्म फेस्टिवल के जरिए माहौल मिलता है। हमने कोई एंट्री फीस भी नहीं रखी है, ताकि हर तरह की प्रतिभा को आसानी से मंच मिल सके।
प्रश्न- फिल्मों में करियर बनाने के इक्छुक बुंदेली युवाओं को आप क्या सलाह और मार्गदर्शन देंगे?
उत्तर- बुंदेलखंड की लोकेशन सबको भा रही है। यहां की खूबसूरती इसलिए अब फिल्मों में नजर आने लगी हैं। एक कहावत रही है। जितनी भी प्रतिभाएं रहीं है, उनके लिए गुरु चलकर आए हैं। यहां की प्रतिभाओं के गुरु खजुराहो फिल्म फेस्टिवल में चलकर आ रहे हैं। आपको जहां जाना है, आपको राह मिलेगी। असरानी जी 83 वर्ष के है। वे जब पुणे पहुंचे थे, तब से रोज योग कर रहे हैं। आपने इस उम्र में उनकी एनर्जी देखी। इससे ही युवा सीखेंगे। एकलव्य बनकर ही सीख रहे हैं, पर सीख रहे हैं। खजुराहो फिल्म फेस्टिवल को एक तरह से गुरु ही मान लीजिए।
आरिफ शहडोली, फिल्म कलाकार व लेखक

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