अश्रुधारा से निपटा पति-पत्नी का 15 साल पुराना विवाद

दहेज प्रतिषेध अधिनियम के तहत लम्बित था मामला - सुप्रीमकोर्ट, हाईकोर्ट में भी नहीं हो सका था समझौता

By: prashant sahare

Published: 11 Sep 2017, 05:45 PM IST

जिला जज की समझाइश से सुलह
छिंदवाड़ा ञ्च पत्रिका. शनिवार को आयोजित लोक अदालत में यूं तो दो हजार से अधिक मामलों का निपटारा हुआ, लेकिन न्यायालय में लम्बित १५ वर्ष पुराने एक विवाद का निराकरण अश्रुधारा के साथ हुआ। इसके गवाह कोर्ट में मौजूद न्यायाधीश, अधिवक्ता बने।
वैवाहिक विवाद के तहत कोर्ट में लंबित प्रकरणों में २९२ को शामिल किया गया, जिसमें ३७ का निपटारा हुआ। इन ३७ प्रकरण में से एक केस एेसा था जिसने ९ सितंबर की इस लोक अदालक को एेतिहासिक बना दिया।


२२ मई २००२ को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय में एक महिला ने पति, सास, ससुर, देवर, ननद के विरुद्ध विवाह के दौरान उपहार स्वरूप दिए गए स्त्रीधन एवं दहेज प्रताडऩा के सम्बंध में परिवाद दायर किया था। मामला इतना बढ़ा कि सालों तक चलता रहा पर कोई पक्ष झुकने को तैयार नहीं था। दोनों ही पक्ष उच्च पदों पर पदस्थ थे। समझौते की जगह आरोपी पक्ष ने बचाव के लिए सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट की शरण ली। पर उन्हें वहां भी राहत न मिली।

 

इस केस को जब ९ सितम्बर की लोक अदालत में शामिल किया जा रहा था, तब किसी को भी उम्मीद नहीं थी कि यह लोक अदालत के लिए यादगार बन जाएगा। जब दोनों पक्ष अदालत में अपनी बात रख रहे थे, उसी समय वहां से गुजर रहे जिला एवं सत्र न्यायाधीश एलडी बौरासी ने उनकी बातें सुनीं। जिला जज ने जीवन के कुछ एेसे सिद्धांतों के साथ समझाइश दी कि दोनों ही ने उनके समक्ष खुलकर न केवल भारी मन से अविरल अश्रुधारा के साथ अपने दुखों को अभिव्यक्त किया, अपितु विवाद के निराकरण की खुशी को भी उन्हीं आंसुओं के साथ स्वीकार किया। इस संबंध में न्यायाधीश संदीप पाटिल ने बताया कि दोनों पक्षकारों के मध्य विवाद चरम पर था। उनके निजी जीवन में भी विवाद के कारण कई बडे़ उतार-चढ़ाव आए और उन्हें लगने लगा कि मानव जीवन, विशेषकर वैवाहिक जीवन बड़ा दुष्कर है। परंतु लोक अदालत में कई प्रश्नों पर समझाइश से उन्हें समझ आया कि एेसे विवाद से उनके परिजन कैसे जूझ रहे हैं। अंतत: उन्होंने अपनी जिद और अहम की जैसे ही तिलांजलि दी, इस विवाद का सुखद अंत हो गया।

prashant sahare
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