यहां बीते तीन दशक से मुख्य दलों की प्रत्याशी तक नहीं बनीं महिलाएं

यहां बीते तीन दशक से मुख्य दलों की प्रत्याशी तक नहीं बनीं महिलाएं

Rajendra Sharma | Publish: Nov, 11 2018 05:30:04 AM (IST) Chhindwara, Madhya Pradesh, India

आधी आबादी की उपेक्षा: 1990 में कमला वाडिवा थीं जिले की आखिरी विधायक

छिंदवाड़ा. राजनीति में महिलाओं को भी प्रतिनिधित्व देने के लिए राजनीतिक दल अपने यहां महिला नेत्रियों को मौका देने की बात तो करते हैं, लेकिन स्थानीय राजनीति परिदृश्य को देखें तो पार्टियां महिलाओं पर चुनावी दांव लगाने में हमेशा से हिचकिचाती रहीं हैं। जिले में विधानसभा क्षेत्रों की बात करें तो मुख्य दल भाजपा और कांग्रेस दोनों महिलाओं को टिकट देने के पक्ष में कभी नहीं रहे। ध्यान देने लायक बात तो यह है कि जब से महिलाओं को राजनीति में समान मौके देने की पैरवी हो रही थी और अब जब दलों में उनके लिए कुछ जगह रिजर्व भी रखी गई है महिलाओं का प्रतिनिधित्व न के बराबर है। 1990 के बाद पिछले 28 सालों में पांच विधानसभा चुनाव हुए हैं, लेकिन भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों ने किसी महिला को विधायक बनने लायक नहीं समझा। 1990 में भाजपा की कमला वाडिवा विधायक थीं। उसके बाद से दोनों दलों ने चुनाव में महिला प्रत्याशी खड़ा नहीं किया है। कांग्रेस से तो कुछ महिलाओं ने प्रतिधित्व किया भी, लेकिन इस मामले में भाजपा का रिकॉर्ड खराब रहा।
दमुआ को छोड़ दें तो बाकी सीटों पर विधानसभा चुनाव के अब तक के इतिहास में भारतीय जनता पार्टी ने एक महिला प्रत्याशी को खड़ा नहीं कर सकी है। दमुआ में 90 में कमला वाडिवा और 98 में अनुसुइया उइके पार्टी ने टिकट दिए। 2008 में यह विधानसभा जामई में मर्ज हो गया। जामई, चौरई, पांढुर्ना और परासिया चार विधानसभा क्षेत्र एेसे हैं जहां भाजपा और कांग्रेस की तरफ से एक भी महिला को अब तक टिकट नहीं मिला। जिला मुख्यालय की सीट पर भी यही हाल रहा है। यहां 57 से 85 तक महिला उम्मीदवार को पार्टी ने तवज्जो दी और विद्यावती और कमलेश्वरी शुक्ला विधायक भी बनीं। इसके बाद कांग्रेस ने भी महिला प्रतिनिधित्व की उपेक्षा ही की। भाजपा को तो एक भी महिला यहां से नहीं मिली है अब तक।

इस बार भी प्रयास रहे विफल

मौजूदा चल रही चुनावी प्रक्रिया में इस बार भी कई जगहों से महिला उम्मीदवारों के नाम सामने आए लेकिन हश्र पहले जैसा ही हुआ। कांग्रेस में अमरवाड़ा से कामिनी शाह का नाम चर्चा में रहा तो सौंसर में विजय चौरे की पत्नी का नाम भी उछला। भाजपा में जामई से कांता ठाकुर तो सीएम तक से मुलाकात कर आईं लेकिन उन्हें मायूसी हाथ लगी। परासिया में भी ज्योति डेहरिया के उम्मीदवार बनने के चर्चे थे, लेकिन बाद में वे फ्रेम से बाहर ही हो गईं।

फैक्ट फाइल

- चौरई में 1962 से अब तक सिर्फ एक महिला लड़ी है चुनाव
- सपा और बसपा ने तीन-तीन महिलाओं को दिया है प्रतिनिधत्व
- छिंदवाड़ा में भाजपा ने एक भी महिला को नहीं दिया है टिकट
- 1990 के बाद कहीं भी दोनों दलों की महिला उम्मीदवार नहीं
- जामई में 1977 से अब तक दो महिला प्रत्याशी लड़ी चुनाव
- 1972 के चुनाव में सिर्फ दमुआ से थी एक महिला प्रत्याशी

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