बंद होती कोयला खदानों ने छीन ली रौनक

परासिया विधानसभा क्षेत्र की स्थिति

By: prabha shankar

Published: 15 Nov 2018, 09:00 AM IST

विपिन श्रीवास्तव
छिंदवाड़ा/ परासिया. लगभग सौ किलोमीटर के दायरे में किसी समय फैले कोयला खदानों के क्षेत्र में रौनक नजर आती थी। शानदार कॉलोनियां, खदानों के आसपास खुले बाजार, दुकानों में लोगों की आवाजाही इस क्षेत्र को जिले का सबसे सम्पन्न क्षेत्र बनाती थी। जिले की तीन विधानसभाओं परासिया, जुन्नारदेव और दमुआ इलाके का यह दृश्य अलग ही था। दमुआ विधानसभा खत्म होने के बाद कोयलांचल में जुन्नारदेव और परासिया शेष रह गए। जिला मुख्यालय से करीब होने के कारण परासिया का ज्यादा नाम रहा। पिछले दो दशकों में कोयला खदानों के बंद होने का सिलसिला जो शुरू हुआ तो यहां की रौनक ही खत्म होती चली गई। कभी कोयला खदानों में 12 हजार से अधिक लोग काम करते थे। आज यह संख्या घटकर चार हजार के आसपास रह गई है। हर साल करीब तीन सौ कामगार सेवानिवृत्त हो रहे हैं। नई भर्तियां कई वर्षों से बंद है। घटते मेनपावर का प्रभाव कोयलांचल की अर्थव्यवस्था पर दिखाई देने लगा है। बाजारों में अब पहले जैसी रौनक नहीं है। तेजी से बंद होती खदानें और नई कोयला परियोजनाओं के शुरू न होने से हालात और अधिक गम्भीर हो गए हैं। खदानें सुदूर आदिवासी अंचल में हैं। इनके बंद होने से रोजगार की समस्या विकराल बनती जा रही है। परासिया से झुर्रे और शिवपुरी से छिंदवाडा तक सडक़ खस्ताहाल है नागरिकों को कई बार आंदोलन के बाद भी केवल आश्वासन मिला है।
पलायन बढ़ा
स्थानीय स्तर पर काम न मिलने के कारण प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में लोग रोजगार के लिए अन्य जिलों में पलायन कर रहे हैं। इस इलाके के दर्जनों गांव फसल कटाई के समय सूने हो जाते हैं। घरों में केवल बीमार, बुजुर्ग और गर्भवती महिलाएं ही रह जाती हंै। मनरेगा का बजट और कार्य सीमित कर दिए जाने से गांव में भी पर्याप्त रूप रोजगार नहीं मिल पाता है।

दो तिहाई आबादी झेल रही जलसंकट
विधानसभा क्षेत्र की लगभग दो तिहाई आबादी पानी का संकट झेल रही है। कोल बेल्ट के 14 गांव और कारीडोंगरी, जामुनझिरिया के ऊपर पहाड़ी पर स्थित दर्जनों ग्रामों में पीने के पानी की भारी परेशानी है। पीएचइ द्वारा ग्रीष्मकाल में महीने में मात्र दो बार पानी सप्लाई किया जाता है। कई बार यह अंतराल बढक़र बीस से 22 दिन तक हो जाता है। नगरीय इलाकों की अपनी जल आर्वधन योजना है, लेकिन बदइंतजामी और पूरी तरह काम नहीं करने से परासिया तथा बडक़ुही में जलसंकट बना रहता है।

किसानों के लिए सुविधाएं नहींं
किसानों को अपनी उपज बेचना एक बड़ी समस्या है। उन्हें तीस से चालीस किमी दूर छिंदवाड़ा मंडी जाकर दो से तीन दिन तक इंतजार करना पड़ता है। परासिया में मंडी का शुभारम्भ जोर-शोर से किया गया था, लेकिन हकीकत यह है कि केवल भांवातर योजना में ही खरीदी होती है। इसके अलावा पूरे वर्ष मंडी में कोई कामकाज नहीं होता।
किसानों के खेत की मिट्टी परीक्षण के लिए करीब 35 लाख रुपए व्यय कर मृदा प्रयोगशाला भवन का निर्माण किया गया है, लेकिन स्टाफ तथा आवश्यक उपकरण न होने के कारण पिछले एक वर्ष से प्रयोगशाला भवन बंद पडा हुआ है।

स्वास्थ्य सुविधाएं बदतर
स्वास्थ्य सुविधाएं बदतर स्थिति में हैं। अस्पताल में डॉक्टर नहीं हैं। सिविल अस्पताल चांदामेटा और तीस बिस्तर वाले सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र परासिया रैफरल सेंटर बनकर रह गया है। चार प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पगारा, बागबर्धिया, उमरेठ, मोरडोंगरी में हैं, लेकिन बिना चिकित्सकों के। आठ वर्ष पूर्व 100 बिस्तर वाले अस्पताल की घोषणा होने के बाद लोगों में उम्मीद जागी थी, लेकिन आज तक अस्पताल के नाम पर एक ईंट नहीं रखी गई है। वेकोलि के बडक़ुही चिकित्सालय की स्थिति भी खराब होती जा रही है। हर वर्ष करीब दो करोड़ रुपए कागमारों के इलाज के लिए जिले के बाहर निजी अस्पतालों को दिए जा रहे हैं, लेकिन अस्पताल का उन्नयन नहीं किया जा रहा है।

क्षेत्र की प्रमुख समस्याएं
बंद होती कोयला खदानें सबसे मुख्य और गम्भीर मुद्दा है। इससे बेरोजगारी का संकट आ खड़ा हुआ है। खदान बंद होने से स्थानीय रोजगार के मौके कम हुए हैं। क्षेत्र में असामाजिक गतिविधियां और गैंगवार भी बढ़े हैं। पेयजल का गम्भीर संकट वर्षों से यह क्षेत्र झेल रहा है। इसके साथ उच्च शिक्षा की व्यवस्था न होना और लचर स्वास्थ्य सेवाएं समस्याओं को और बढ़ा रहीं हैं।

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