Corona effect: पेड़ों पर टंगती थी अस्थियां, अब लॉकर में बंद होकर कर रही इंतजार

जिंदा के साथ मरने वाले लोग भी प्रभावित हो रहे हैं।

By: ashish mishra

Updated: 05 May 2020, 02:03 PM IST


छिंदवाड़ा. वैश्विक महामारी कोरोना वायरस के चलते जिंदा के साथ मरने वाले लोग भी प्रभावित हो रहे हैं। लॉकडाउन की वजह से सैकड़ों लोगों की अस्थियां मोक्ष के इंतजार में मोक्षधाम के लॉकर में बंद पड़ी हुई हैं। परिजन लाख कोशिशों के बाद भी अपनों की अस्थियों का विसर्जन पवित्र नदियों में नहीं कर पा रहे हैं। सनातन धर्म में मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार का बड़ा महत्व होता है। इसके बाद अस्थियों को पवित्र नदियों में विसर्जित किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि अस्थियों का विसर्जन मृतक की आत्मा को मोक्ष दिलाने के लिए होती है, लेकिन लॉकडाउन के दौरान पवित्र नदियों तक मरने वालों के परिजन नहीं पहुंच पा रहे हैं। ऐसे में उन्हें मजबूरी में मोक्षधाम के लॉकर में अपनों की अस्थियां रखनी पड़ रही हैं।

पेड़ों पर टंगती थी अस्थियां
ऐसा पहली बार हुआ है जब मोक्षधाम में अस्थियों को रखने के लिए बनाए गए लॉकर भी लगभग फूल हो गए हैं। मोक्षधाम में लगभग 10 वर्षों से व्यवस्था दे रखे दौलतराव ने बताया कि हमारा पैतृक काम यही है। मुझसे पहले मेरे बड़े भाई, पिता और दादा यह काम देखते थे। दौलतराव की उम्र 57 साल हो चुकी है। उन्होंने बताया कि जन्म से लेकर अब तक मैंने ऐसी स्थिति नहीं देखी थी कि जब इतनी सारी अस्थियां लॉकर में बंद हों। दौलतराव ने बताया कि आठ साल पहले तक अस्थियां पेड़ों पर टांगी जाती थी, लेकिन इसके बाद लोगों ने अस्थियों को रखने के लिए लॉकर दान किया। इस समय 72 लॉकर मोक्षधाम में अस्थियों को रखने के लिए उपलब्ध हैं। जिसमें से 58 लॉकर अभी भरे हुए हैं।

अनुमति के लिए पहुंच रहे कलेक्ट्रेट
मरने वालों के परिजन अस्थियों के विसर्जन के लिए कलेक्ट्रेट भी पहुंच रहे हैं। परिजनों का कहना है कि कोरोना वायरस की वजह से यह स्थिति पहली बार देख रहे हैं कि मरने वालों की अस्थियों के विजर्सन के लिए भी अनुमति लेनी पड़ रही है। हालांकि अधिकतर परिजनों को उनके इच्छा अनुसारअनुमति न मिलने से निराश हाथ लग रही है।

लॉकडाउन से हो रही दिक्कत
गणेश चौक निवासी विजय पोफली की मृत्यु 21 अप्रैल को हो गई थी। मृतक के परिजन राहुल ने बताया कि बड़े भैया की लंबी बीमारी के निधन के बाद तीसरे दिन कालीरात धाम में खारी विसर्जन किया गया। हमारे यहां अस्थियों के शुद्धिकरण के बाद जल्द से जल्द विसर्जन की मान्यता है। हमलोग अस्थियों को इलाहाबाद में या फिर जबलपुर में नर्मदा नदी में करते हैं, लेकिन लॉकडाउन की वजह से अस्थी विसर्जन करना अभी मुश्किल लग रहा है।

मंडला में करना पड़ा विसर्जन
24 अप्रैल को लालबाग निवासी महेश पटेल के पिता ईश्वर भाई पटेल का देहांत हो गया। महेश पटेल ने बताया कि हमारे यहां मान्यता के अनुसार दसवें दिन अस्थि विसर्जन नरसिंहपुर बरमान में नर्मदा नदी में किया जाता है। लेकिन प्रशासन ने हमें वहां अस्थि विसर्जन की अनुमति नहीं दी। सोमवार को मंडला में अस्थि का विसर्जन करना पड़ा।

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ashish mishra Desk
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