महासंकट: देशभर में फसलों पर खतरे की घंटी

महासंकट: देशभर में फसलों पर खतरे की घंटी
Half the country's crop will be wasted

Prabha Shankar Giri | Updated: 30 May 2019, 08:00:00 AM (IST) Chhindwara, Chhindwara, Madhya Pradesh, India

आर्मी वर्म से फसल को बचाने के लिए जुटे वैज्ञानिक

छिंदवाड़ा. मक्का के लिए विश्वभर में चिंता का कारण बन चुके फाल आर्मी वर्म कीट के प्रकोप से फसलों को बचाने के लिए अब मैदानी कार्यक्रम तय किए जा रहे हैं। आंचलिक कृषि अनुसंधान केंद्र ने देशभर के वैज्ञानिकों से चर्चा और कीट के रिसर्च के बाद इस पर नियंत्रण के लिए उचित प्रबंधन तैयार किया है।
बुधवार को चंदनगांव स्थित केंद्र में एक मीडिया कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस दौरान प्रेजेंटेशन के जरिए इस कीट के जीवन चक्र, इसकी पहचान, मक्का पर इसके आक्रमण, कीटग्रस्त फसल को पहचानने आदि के बारे में विस्तृत रूप से बताया गया।
वैज्ञानिकों का कहना है कि किसानों को इस बार बेहद सावधानी बरतना है और जागरूक रहकर बोनी के दस बारह दिनों के बाद से ही फसल की निगरानी करनी है। प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. वीके पराडकर ने बताया कि यह कीट छह इंच तक के पौधे में अपना आक्रमण शुरू कर देता है। शुरू में जब इसका प्रकोप होता है तब यह इतना छोटा होता है कि दिन में भी दिखाई नहीं देता।
पत्तियों पर इसके मलमूत्र से ही इसे पहचाना जा सकता है। उन्होंने बताया कि शुरू में ही यदि इसे नियंत्रित कर लिया तो ठीक वरना कीट जब तक इल्ली के रूप में बड़ा होकर दिखेगा तब तक तो फसल बर्बाद हो जाएगी।
कार्यशाला में वैज्ञानिक डॉ. डीएन नांदेकर, डॉ. अशोक राय, आरके शर्मा के साथ अन्य तकनीकी अधिकारी कर्मचारी मौजूद थे।

पिछले साल दक्षिण में मक्का में दिखे इस कीट ने एक ही साल में देश के आधे हिस्से में तबाही मचा दी है। इस बार तो यह देश के लगभग पूरे मक्का उत्पादक क्षेत्र को बर्बाद करने पर उतारू है। जानकारों का कहना है कि कर्नाटक, तेलंगाना सहित उससे लगे राज्यों में सबसे ज्यादा मक्का होता है। वहां इसके बीज भी बनाए जाते हैं। वहां बड़े-बड़े वैज्ञानिक हैं और जागरूक किसान हैं। वे भी इस कीट से मक्का को नहीं बचा पाए। एेसे में जहां किसान जागरूक नहीं हैं वहां क्या स्थिति हो सकता है समझा जा सकता है।

जिले में ज्यादा जागरुकता की जरूरत
गौरतलब है जिले में मक्का का रकबा लगातार बढ़ रहा है। पिछले साल दो लाख ७९ हजार हैक्टेयर में मक्का किसानों ने लगाई थी। इस बार इसका क्षेत्र तीन लाख हैक्टेयर तक जा सकता है। वैज्ञानिकों की चिंता है कि जिले के किसान दाना बोने के बाद महीने भर तक तो निश्चित रहते हैं। डॉ. पराडकर ने बताया कि इस बार एेसा किया तो उन्हें भारी नुकसान चुकाना पड़ सकता है। शुरू से ही फसल पर नजर रखना है। इसके लिए किसानों को जागरूक होने की जरूरत है। केंद्र कृषि विभाग के साथ पूरे जिले में गांव-गांव तक बैठक, चर्चा करने के साथ कीट के संबंध में पर्चे और जरूरी जानकारी के लिए तैयार किए गए विशेष ब्रोशर भी बंटवाने की तैयारी कर रहा है।

MP/CG लाइव टीवी

खबरें और लेख पढ़ने का आपका अनुभव बेहतर हो और आप तक आपकी पसंद का कंटेंट पहुंचे , यह सुनिश्चित करने के लिए हम अपनी वेबसाइट में कूकीज (Cookies) का इस्तेमाल करते हैं। हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति (Privacy Policy ) और कूकीज नीति (Cookies Policy ) से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned