Heritage: दक्षिण भारत के कारीगरों ने किया था इस मंदिर का निर्माण, 51 फीट ऊंचा है गुंबज

सहेजने का काम पीढ़ी दर पीढ़ी की जा रही है।

By: ashish mishra

Published: 09 Jun 2021, 09:16 PM IST


छिंदवाड़ा. मंदिरों के शहर छिंदवाड़ा में पूरे वर्ष हर तरफ आस्था एवं श्रद्धा की गंगा बहती है। बड़ी बात यह है कि पूरे जिले में एक से बढकऱ एक मंदिर है जिन्हें सहेजने का काम पीढ़ी दर पीढ़ी की जा रही है। अपनी बरसों पुरानी सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक धरोहर को सहेजने एवं विकसित करने वाले लोग भी विशिष्ट होते हैं। इस मामले में अपना शहर भी मिसाल बन रहा है। हर एक मंदिर की भव्यता लोगों को आकर्षित करती है। नगर देवी सिद्धपीठ श्री संतोषी माता मंदिर भी उन्हीं में से एक है। इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत इसका बाहरी निर्माण है जो हमें दक्षिण भारत की तरफ के मंदिरों की याद दिलाता है। मंदिर से जुड़े अंशुल शुक्ला ने बताया कि नगर देवी सिद्धपीठ श्री संतोषी माता मंदिर का निर्माण कार्य वर्ष 1960 के आसपास प्रारंभ हुआ था। तब स्वरूप छोटा था। फिर धीरे-धीरे स्वरूप बदलता गया। उन्होंने बताया कि उस समय अपने शहर की सीमा काफी छोटी थी। चार फाटक के इस पार शहर का आउटर कहा जाता था। श्री संतोषी माता मंदिर परिसर में 1960 के पूर्व से ही पीपल के वृक्ष के नीचे श्री खेड़ापति माई विराजमान हैं। उस समय हर व्यक्ति नगर में प्रवेश से पहले खेड़ापति माई की पूजा कर उनका आशीर्वाद लकर ही आगे बढ़ता था। इसके बाद पंडित स्व. रामदुलारे शुक्ला मन्ना महाराज एवं पंडित स्व. सुखदयाल शुक्ला परिवार द्वारा नगर पालिका को जमीन श्री संतोषी माता मंदिर बनाने हेतु समर्पित की गई। पूर्व में नगर पालिका कमिश्नर छिंदवाड़ा द्वारा एक समिति बनाई गई। समिति सदस्य जैना बाई, सुखराम मिस्त्री एवं अन्य क्षेत्र के निवासियों ने श्रमदान कर मंदिर का सर्वप्रथम निर्माण किया एवं धर्मशाला बनाई। वर्ष 1990 में क्षेत्र के युवाओं द्वारा मंदिर की जवाबदारी अपने हाथ में ली गई और स्व. अनूप शुक्ला ने अध्यक्ष बनकर क्षेत्रीय लोगों को मंदिर से जोडऩे का कार्य किया और स्व. जगदीश्वर दास के मार्गदर्शन में मंदिर के निर्माण कार्य को आगे बढ़ाते हुए एक बड़े हॉल का निर्माण कराया गया।

दक्षिण शैली में हुआ मंदिर का निर्माण
1991 से वर्तमान तक मंदिर समिति में राजेन्द्र मिश्रा अध्यक्ष एवं शिव मालवी सचिव ने मंदिर के निर्माण कार्य को आगे बढ़ाते हुए मंदिर को भव्यता प्रदान की। पूर्व में मंदिर के गर्भगृह में कांच का सुंदर कार्य था, देवी जी की मूर्ति के चारो तरफ कांच से सूंदर डिजाइन बनी हुई थी। समिति सदस्यों ने मंदिर को और भव्य एवं आकर्षक बनाने के लिए दक्षिण शैली में मंदिर को बनवाया। इसके लिए दक्षिण भारत से दक्ष कारीगर बुलाए गए। मंदिर समिति के अंशुल शुक्ला ने बताया कि बैतूल में बालाजी मंदिर का निर्माण चल रहा था। समिति के सदस्य वहां घूमने गए हुए थे। बालाजी मंदिर को देखकर सदस्यों ने श्री संतोषी माता मंदिर का निर्माण भी कुछ उसी तरह करने का निर्णय लिया। इसके बाद बैतूल के बालाजी मंदिर निर्माण करने वाले कारीगरों ने ही श्री संतोषी माता मंदिर का निर्माण दक्षिण शैली में वर्ष 2008 में किया।


यज्ञ के बाद स्वर्ण कलश हुआ स्थापित
मंदिर निर्माण के बाद श्रद्धालुओं के सहयोग से समिति द्वारा यज्ञ करवाकर मंदिर के ऊपर स्वर्ण कलश स्थापित किया गया। मंदिर का गुंबज कलश सहित 51 फीट का है। इस मंदिर में मुख्य देवी श्री दुर्गा माता, अन्नपूर्णा माता, शीतला माता, संतोषी माता, गणेश जी, हनुमान जी, कालभैरव, शिव जी आदि विराजमान है। आज भी लोग अपनी मन्नत पूरी करने देवी के दरबार में आते हैं । मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित दयाराम शास्त्री हैं । मंदिर के सामने ब्रिज के नीचे अंशुल द्वारा एक सुंदर उद्यान बनाया गया है । नवरात्रि के अवसर पर मंदिर में भक्तों का तांता लगा रहता है।

ashish mishra Desk
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