Lockdown: उत्पादन भरपूर, फिर क्यों आर्थिक संकट से जूझ रहे किसान

Lockdown: खेतों में चहल-पहल गायब, न बाजार मिल रहा न हो रही आय

By: prabha shankar

Published: 23 Apr 2020, 05:27 PM IST

छिंदवाड़ा/ क्या दिन क्या रात, चिलचिलाती धूप हो या फिर मूसलाधार पानी किसान ही है जो अपने खेतों का ध्यान रखने के लिए कभी भी दौड़ पड़ता है। अब गांवों की तस्वीर बदली सी है। खेतों में सब्जी तोडऩे और फसलों को काटने किसान परिवारों के साथ मजदूरों का समूह इस समय दिखाई देता था। खेतों की मेढ़ पर चहल-पहल दिखती थी, लेकिन इस वर्ष यह सब गायब है। इक्का-दुक्का लोग ही दिख रहे हैं। ऐसा लग रहा है मानों गांव और खेतों में जिंदगी की रफ्तार सुस्त पड़ गई है। ऐसे वे किसान जो छोटे रकबे में खेती-बाड़ी करते हैं, उनकी दिनचर्या भी बदल गई है। लॉकडाउन में हुए बदलाव के बारे में हमने कुछ किसानों से चर्चा की तो उन्होंने एक महीने के अपने अनुभव हमसे साझा किए।

सुस्त हो गई है जिंदगी
लॉकडाउन ने हमारी दिनचर्या ही बदल दी है। हालांकि किसान का काम चलता रहता है। एक सीजन गया तो अगले सीजन की तैयारी शुरू हो जाती है। सामान्य दिनों में आठ से दस घंटे खेत में देते थे। अब खेत जाने की इजाजत आसानी से नहीं मिलती। अभी दो-चार दिनों से ही कुछ छूट मिली है। हालात ये हंै कि दिन में एक-दो घंटे के लिए जाते हैं फिर जल्द लौट आते हैं। घर पर बच्चों के साथ ज्यादा समय बीत रहा है। कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे जिंदगी सुस्त पड़ गई है।
जयकुमार टेखरे, किसान , मेघासिवनी

चिंता और बढ़ गई
खेती किसानी से जुड़े लोगों और उनके परिवार की चिंताएं बढ़ गईं हैं। किसानों की फसलें आ गई हैं, लेकिन उसे बेचने की मुश्किल है। सरकार ने खरीदी शुरू की है अच्छी बात है, लेकिन खुले बाजार में प्रतिस्पर्धा से जो दाम किसानों को मिलते थे, इस बार उसका नुकसान होगा। क्योंकि मंडी में भी व्यापारी कम आ रहे हैं। खेत में चल रहा टै्रक्टर बिगड़ रहा है तो सुधर नहीं रहा, क्योंकि ऑटो पाट्र्स की दुकानें बंद हैं। पाबंदी के कारण आने-जाने में परेशानी है।
चंद्रशेखर अल्डक, चंदनगांव, किसान

किसान नहीं रुकता
किसान के लिए खेत में चौबीसों घंटे और 365 दिन काम है। फसल लगाने के बाद उसे निकालने और फिर अगली बोवनी की तैयारी, सुस्ताने और बैठने के लिए उसके पास वक्त है कहां। हां इस बार नुकसान किसानों को ज्यादा हो रहा है। खेत से हर दूसरे दिन सब्जियां निकलती हैं तो मंडी दो दिन बंद रहती है और दो दिन खुलती है। ऐसे में सब्जियां बर्बाद हो रहीं हैं। गेहूं का दाम भी इस बार खुले बाजार में कम मिलने वाला है। इन सबसे जूझते हुए भी किसान जुटा है, पसीना बहा रहा है।
गोविंद ओकटे, जामुनझिरी, किसान

उलझन में हैं किसान
क्या करें और क्या न करें, इसी उलझन में हैं। गोभी के खेत में रोटावेटर चलाना पड़ा। खेत खाली पड़ा था तो अभी पालक और धनिया के बीज डाले हैं, ताकि कुछ तो लग जाए। खरीफ की मक्का को लेकर अब सोच विचार करना पड़ रहा है। लॉकडाउन कब तक रहेगा यह तय नहीं है। पैसा लगा दो और पता चले कि फिर दिक्कत आ जाए तो दोनों तरफ से गया किसान। अभी बीज के लिए भटकना पड़़ा। सप्ताह में दो दिन दुकानें अब खोली जा रहीं हैं।
जितेंद्र चौबीतकर, चंदनगांव, किसान

पांढुर्ना. लॉकडाउन के दौरान किसान जिद के साथ खेती कर अपने हौसले का परिचय दे रहे हंै। ग्राम पंचायत हिवरासेनडवार में खेतों में चहल-पहल बनी हुई है। जहां गोभी की खेती होती थी वहां कुछ युवाओं की मेहनत रंग लाई और इस साल तरबूज की खेती कर व्यवस्था में बदलाव लाया है। गुड्डू पराडकऱ ने बताया कि वे लॉकडाउन की विषम परिस्थिति में भी फल-सब्जियों का व्यापार हिम्मत के साथ कर रहे है। किसान नेता हरनाम सिंह सेंगर ने बताया कि उन्होंने लॉकडाउन में भी किसानों का हौसला टूटने नहीं दिया है।

मोहखेड. सारोठ के किसान किसान केशवराव देशमुख ने बताया कि मेरे पास डेढ़ एकड़ जमीन है। आधे एकड़ मेंं गेंहू की फसल लगाई थी। 25 कट्टा गेंहू हुआ। शेष एक एकड़ जमीन में फर्राश और धनिया लगा है। दोनों खेत में खराब हो रहीं। इनकी बिक्री कहां करें। छिंदवाड़ा सब्जी मंडी भी नियमित नहीं खुलती तो कभी कीमत सही नहीं मिलती। लागत भी निकलना मुश्किल हो गया है। हालांकि किसान ने बताया कि नुकसान सहन कर सकते हैं। देश सुरक्षित रहेगा तो आने वाले समय में फसल लगाकर कमाई कर लेंगे।

हनोतिया. छोटे किसान आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। खेती से आय बंद है तो रोजगार के विकल्प भी नहीं हैं। मनरेगा योजना के प्रारम्भ होने के बाद भी किसानों की आर्थिक पूर्ति कैसे होगी, इस पर प्रश्न चिह्न लगा हुआ है। फिलहाल छोटे किसानों की दिनचर्या में अपने खेतों की ओर लगातार अपने मवेशियों को चराने के अलावा कोई काम नहीं बचा हुआ है। वहीं कुछ छोटे किसान इस लॉकडाउन में दूध का व्यवसाय कर अपनी अजीविका चला रहे तो कुछ शासन-प्रशासन से उम्मीद लगाए बैठे हैं।

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