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Majdoor diwas: मजदूरों का यहां लगता है बाजार, हर दिन होता है मोलभाव

रोटी की खातिर मजदूर पहुंचते हैं।

छिंदवाड़ा

Published: May 01, 2022 08:35:21 pm



छिंदवाड़ा. कंधे पर गमछा, माथे पर शिकन और उम्मीदों से भरी निगाहें। ऐसा नजारा हर दिन सुबह शहर के नरसिंहपुर रोड पर दिखाई देता है। यहां मजदूरों का बाजार लगता है। शहर के विभिन्न क्षेत्रों से यहां रोटी की खातिर मजदूर पहुंचते हैं। इसके बाद शुरु होता है सिलसिला मोलभाव का। देश-दुनिया से बेखबर इन मजदूरों को इंतजार रहता है तो सिर्फ अपने बिकने का। किशोर से लेकर बुजुर्ग मजदूर तक यहां पर कुशलता के आधार पर दिहाड़ी पर मजदूरी के लिए ले जाए जाते है। मजबूरी में मजदूर ठेकेदार एवं अमीरों से अपनी बोली लगवाते हैं। बात पटी और भाव तय हुआ तो अपनी घर से लाई हुई रोटी-सब्जी उठाकर उनके साथ मजदूरी के लिए रवाना हो जाते हैं। दिन भर हाड़तोड़ मेहनत के बाद हाथ में मिलते हैं तो चंद पैसे। हजारों परिवार के घरों का चूल्हा इसी राशि से हर दिन जलता है। जिस दिन इस बाजार में खड़ा होने वाला मजदूर बिकता नहीं है यानी उसे काम नहीं मिलता है उस दिन उसके घर का चूल्हा नहीं जलता है। काम न मिला तो वह उनके परिवार के लिए भूख का दिवस हो जाता है। मजदूरों का कहना है कि महंगाई दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। ऐसे में मजदूर रेट भी हर वर्ष उसी हिसाब से बढऩा चाहिए। आज एक मई को पूरे विश्व में अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस मनाया जाता है। विभिन्न संस्था, संगठन मजदूरों के हित में बात करते हैं और दूसरे दिन भूल जाते है। इन मजदूरों की हालत आज भी वैसी ही है जैसे पहले थी। शहर में रोज आसपास के गांवों से 15 वर्ष से लेकर 60 वर्ष के बुजुर्ग तक मजदूरी के लिए आते है। चौराहे पर ठेकेदारों का इंतजार करते है। अधिकतर मजदूर साप्ताहिक मजदूरी के लिए ठेकेदार से अनुबंध कर लेते है। वहीं कुछ मजदूर दिहाड़ी पर अलग-अलग ठेकेदारों एवं मालिकों के साथ मजदूरी के लिए जाते है।
Majdoor diwas: मजदूरों का यहां लगता है बाजार, हर दिन होता है मोलभाव
Majdoor diwas: मजदूरों का यहां लगता है बाजार, हर दिन होता है मोलभाव
कलेक्टर रेट से नहीं मिलती मजदूरी
शासन ने मजदूरों के लिए कलेक्टर रेट से मजदूरी तय कर रखी है। रोजनदारी पर जाने वाले मजदूरों को आज तक कलेक्टर रेट से मजदूरी नहीं मिली। मजदूरों की मंडी में हर वर्ग के मजदूर का अलग-अलग रेट तय है। महिला, पुरुष, किशोरवय के मजदूरों को उनके काम के हिसाब से मजदूरी दी जाती है। ये वो मजदूर है जो निर्माण श्रमिक कहलाते है और भवन आदि निर्माण में काम करते है। होटलों, दुकानों, संस्थानों, निजी तौर पर काम करने वाले मजदूरों को उनके काम के हिसाब से मासिक मजदूरी दी जाती है।
नहीं है जानकारी
सरकार समय-समय पर मजदूरों के लिए कई योजनाएं लाती है। हालांकि अधिकतर मजदूर श्रम विभाग की योजनाओं और अपने अधिकारों की जानकारी भी नहीं रखते।


पीढ़ी दर पीढ़ी कर रहे मजदूरी
जिले में ऐसे कई परिवार हैं जिनके सदस्य हर दिन जाकर मजदूरों के बाजार में काम की तलाश में घंटो खड़े रहते हैं। एक ठेकेदार ने बताया कि लगभग 20 वर्ष से नरसिंहपुर रोड पर हर दिन मजदूरों का जमघट लगता है। कई मजदूरों का पेशा ही यही है। पीढ़ी दर पीढ़ी वे मजदूरी करते आ रहे हैं।
मजदूर राकेश ने बताया कि अब तो यह उनके जिंदगी का एक हिस्सा बन गया है। पहले जब कम मजदूर रहा करते थे तब उन्हें अच्छी मजदूरी मिल जाती थी। अब तो काम पर ले जाने वाले उनसे पहले सौदा तय करते हैं। सुरेशन कहते हैं की अब तो उनके साथ उनका बेटा भी दो साल से काम के लिये मजदूरों के लगने वाले इस मेले में आकर खड़ा होता है और खरीददार उन्हें खरीदकर ले जाते हैं। मजदूरी की कोई दर निर्धारित नहीं है।

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