बजट का रोना या कंजूसी: जिला अस्पताल के भरोसे चल रहा मेडिकल कॉलेज, छह माह नहीं खर्च किया एक भी रुपया

बजट का रोना या कंजूसी: जिला अस्पताल के भरोसे चल रहा मेडिकल कॉलेज, छह माह नहीं खर्च किया एक भी रुपया
Medical College depend on District Hospital

Prabha Shankar Giri | Updated: 01 Jul 2019, 08:00:00 AM (IST) Chhindwara, Chhindwara, Madhya Pradesh, India

नहीं की गई चिकित्सा सामग्रियों की खरीदी, जिला अस्पताल पर पड़ रहा अतिरिक्त भार

छिंदवाड़ा. छिंदवाड़ा मेडिकल कॉलेज (छिंदवाड़ा इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस ) जिला अस्पताल के बजट के भरोसे संचालित हो रहा है। मेडिकल कॉलेज में ऑपरेशन, ब्लड-यूरिन जांच, एक्स-रे, सोनोग्राफी समेत अन्य विभिन्न कार्यों के उपयोग में लाई जाने वाली सामग्रियां जिला अस्पताल के बजट से पूरी की जा रहीं हैं, जबकि सिम्स के बजट से बीते करीब छह महीनों से कोई भ सामग्री खरीदी नहीं गई। जिला अस्पताल प्रबंधन द्वारा कई बार सिम्स प्रशासन से इंडेन किया, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों ने ध्यान नहीं दिया। इसकी वजह से आए दिन पैथालॉजी, सोनोग्राफी, सर्जिकल आदि परीक्षण और उपचार में परेशानी सामने आ रही है।
उल्लेखनीय है कि मेडिकल कॉलेज से सम्बद्ध होने के बाद जिला अस्पताल की ओपीडी तथा आइपीडी की संख्या दोगुनी हो गई है। इसका भार सीधा जिला अस्पताल प्रबंधन पर पड़ता है। मामले में डीन डॉ. जी.बी. रामटेके से उनके मोबाइल नम्बर पर चर्चा का प्रयास किया गया, लेकिन कोई जवाब नहीं दिया।

जिला अस्पताल के स्टोर से मिली जानकारी के अनुसार
1. तीन बार ऑनलाइन डिमांड की गई , जिसमें मेडिसिन, ऑपरेशन सामग्री, डे्रसिंग मटेरियल आदि शामिल हंै।
2. पैथालॉजी के लिए आवश्यक केमिकल,
साफ-सफाई मटेरियल की खरीदी के आर्डर छह माह से नहीं किए गए।
3. पहले तीन माह में ऑपरेशन मटेरियल के लिए पचास हजार खर्च होते थे। अब यह खर्च लाखों में पहुंच गया है।
4. दवाइयों पर भी पूर्व में करीब 75 हजार खर्च होते थे, जो अब बढकऱ 2 लाख से अधिक हो गया है।
5. डे्रसिंग मटेरियल की खपत तीन गुना बढ़ गई है।

चिकित्सा सेवाओं में बढ़ोतरी
छिंदवाड़ा इंस्टीट्यूट से सम्बद्धता मिलने के चलते जिला अस्पताल में सुविधाओं और सेवाओं में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। मिली जानकारी के अनुसार जिला अस्पताल में बिस्तरों की संख्या 400 से बढकऱ 650 हो गई तथा विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों का भी लाभ मिलने लगा। पहले की अपेक्षा डिलेवरी तथा सर्जिकल ऑपरेशनों की संख्या भी औसत 15 प्रतिदिन हो गई है।

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