विवादित बोल ही नहीं, इस वजह से भी चर्चित है भाऊ

विवादित बोल ही नहीं, इस वजह से भी चर्चित है भाऊ
chhindwara

manohar soni | Updated: 19 Jun 2017, 11:58:00 AM (IST) Chhindwara, Madhya Pradesh, India

अपने 'भाऊ' चाहे कितने भी विवादित बयान दे दें या फिर मंच पर झगड़ लें लेकिन फलों के राजा आम के बड़े शौकीन हैं।



छिंदवाड़ा. अपने 'भाऊ' चाहे कितने भी विवादित बयान दे दें या फिर मंच पर झगड़ लें लेकिन फलों के राजा आम के बड़े शौकीन हैं। अपने गृह जिले में इतनी किस्म लगवा ली हैं कि अपने मेहमान और अफसरों पर मेहरबां होकर इसके खूब गिफ्ट पहुंचाते हैं। पड़ोसी जिले से एक अफसर आया तो पूरे कलेक्ट्रेट में मुंहजुबानी यह गुणगान सुना दिया। बस, तब से सबके मन में वहीं के आम की चखने की चाहत है। कुछ हंसी ठिठोली में यह भी बोल पड़े कि ये आम कहीं यहां आ गए और खाते-खाते उनकी जुबां (भाऊ की तरह) भी फिसल गई तो उन्हें नौकरी से हाथ गंवाना पड़ेगा।

उगलत निगलत पीर घनेरी
नगर निगम में सत्तारूढ़ दल के पार्षदों की अंर्तपीड़ा ही कुछ एेसी है, जिसे न सार्वजनिक किया जा सकता और न ही अपने मुखिया नेताजी से कुछ कहा जा सकता है। बस, पान ठेलों और चौपाटी पर पुराने दोस्तों ने हाल-चाल पूछ लिया तो उन्हें सुना दिया। निगम ऑफिस के सामने चाय की दुकान पर चर्चा करते-करते एेसे कुछ पार्षद फूट पड़े। उनका रोना यही था कि ढाई साल बाद एमआईसी में परिवर्तन कर सभापति बनाने का वायदा किया था, जिसे पूरा नहीं किया गया। इसके अलावा सत्ता की खीर खा रहे पदाधिकारियों ने एक अंश भी नहीं दिया। इससे अच्छे तो विपक्षी हंै, जिन्हें कम से कम चुप रहने की फीस तो मिल रही है।

नेताजी का कद
निगम की बात हो और नेताजी की चर्चा न हो तो बेमानी होगी। निगम में उनके रंग-ढंग, चाल-चलन से ही उनकी पहचान है। उनकी उपस्थिति और दखल से उनके कद का अंदाजा लगाया जाता है। निगम में इन दिनों नेताओं की पूछ-परख की तस्वीर भी तय कर ली गई है। पूछ-परख में 20 वही हैं, जिन्होंने अपने तेवर से पहचान की अलग लकीर खींची है। बाकी तो 19 की कतार लम्बी है। इसका असर विकास की हिस्सेदारी में भी दिख रहा है। जिसकी चर्चा आमने-सामने तो कोई नहीं कर रहा है, लेकिन पुराने मित्र और पीडि़त साथियों के मिलने पर अपने को रोक नहीं पाते। बरबस ही उनके मुख से निकल जाता है कि यार अपना हिस्सा भी देने में सम्बंधित आनाकानी कर रहा है। इसके इतर निगम के छोटे से बड़े अफसर कलम के दम पर बाजी मारने में सबसे आगे हैं।

कार्यकर्ता बदल न दें दल
शहर के एकमात्र गल्र्स कॉलेज में इन दिनों दो पक्षों के पदाधिकारियों के हाल बेहाल हैं। मजे हैं तो सिर्फ कार्यकर्ताओं के। नेताजी के बिना उन्हें कोई काम करना रास नहीं आता। नेताजी की मजबूरी यह है कि कहीं उनके कार्यकर्ता दल बदल न दें। इसलिए उनका काम करना जरूरी है। कार्यकर्ता हटे और नेताजी की साख गिरी। सत्ता और विपक्ष के दोनों नेता कॉलेज में इस समय ऐसी सक्रियता दिखा रहे हैं मानो कोई बड़ी कुर्सी मिलने वाली हो। खैर अभी यहां जल्द ही काफी संख्या में नए कार्यकर्ताओं की एंट्री होने वाली है, जिसके बाद यहां का माहौल किसी रण क्षेत्र से कम न होगा।

- मनोहर सोनी, आशीष मिश्र, अखिलेश ठाकुर

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