Paddy Cultivation: विपरीत आबोहवा के बावजूद जिले के किसानों ने स्वीकारी चुनौती

जिले के किसानों में निजी उपयोग से व्यावसायिक तौर पर उत्पादन लेने का बढ़ा रुझान

By: prabha shankar

Published: 13 Oct 2021, 10:22 AM IST

छिंदवाड़ा। महाकौशल क्षेत्र में अब तक बालाघाट और सिवनी जिले को ही धान की खेती के लिए जाना जाता रहा है, लेकिन छिंदवाड़ा के किसानों ने भी इस ओर दस्तक दे दी है। पहले सोयाबीन और फिर मक्का से मात खा चुके किसान अब धान से धनवान होने की राह पर चल पड़े हैं।
कभी अपने निजी उपयोग के लिए धान की खेती करने वाले किसान अब व्यावसायिक रूप से इसे अपना रहे हैं। वे उन्नत किस्म की धान की बजाय हाइब्रिड धान की किस्मों पर दांव लगा रहे हैं। इस वर्ष तामिया, चावलपानी, जुन्नारदेव, चौरई, अमरवाड़ा, मोहखेड़ और छिंदवाड़ा के कई गांवों के किसानों ने इसकी शुरुआत कर दी है।
हालांकि किसानों के लिए धान की खेती में काफी चुनौती हैं, फिर भी उन्होंने इसे स्वीकार किया है। दरअसल, छिंदवाड़ा जिले में सिवनी और बालाघाट की अपेक्षा धान की खेती का तरीका थोड़ा अलग है। सिवनी और बालाघाट जिले में जहां धान के पौधे नर्सरी में तैयार किए जाते हैं वहीं छिंदवाड़ा जिले में सीधी बुवाई का चलन है।
इसके अलावा जिले की आबोहवा इतनी अनुकूल नहीं है कि किसान लम्बे समय तक धान का उत्पादन आसानी से ले सकें। वहीं धान की खेती को बढ़ावा देने के लिए फिलहाल शासन की ओर से न तो कोई योजना है न ही अनुदान। इन सबके बावजूद छिंदवाड़ा के किसानों ने हाइब्रिड किस्मों के सहारे धान उत्पादन की चुनौती स्वीकारी है।

भू-संरचना और बारिश भी प्रतिकूल
जिले की भू-संरचना और बारिश भी धान की खेती के लिए अनुकूल नहीं कही जा सकती। जिले में मैदानी रकबा ज्यादा है। ऐसे में यदि खेतों का स्वरूप बदलकर यानी बंधी बनाकर भी धान का उत्पाद किया जाए तो इतने लम्बे समय तक पानी का संचय कर पाना काफी मुश्किल भरा है। दरअसल जिले में कुछ ही जगह पानी का ठहराव हो पाता है। इसी वजह से सतपुड़ा की श्रेणियों में शामिल क्षेत्रों में वर्षों से धान का उत्पान किया जा रहा है। जबकि अन्य क्षेत्रों का रुझान हालही के वर्षों में इस ओर बढ़ा है।

कम अवधि का धान अपनाना होगा
कृषि वैज्ञानिक वीके पराडकर के अनुसार जिले में कम अवधि वाला यानी 90 से 100 दिनों में पककर तैयार हो जाने वाली धान कारगर साबित होगा। जबकि इसके विपरीत बालाघाट व सिवनी जिले में लम्बी अवधि (करीब 150 दिन) में तैयार होने वाले धान की किस्में ज्यादा लगाई जाती हैं। छिंदवाड़ा जिले में धान के लिए उपयुक्त सिंचित रकबा काफी कम है। जिले में धान की खेती वहीं सफल है जहां पानी रोका जा सकता है।

धान के लिए क्यों खास है बालाघाट
बालाघाट जिले की जलवायु धान की खेती के लिए प्रदेशभर में सबसे अनुकूल मानी जाती है। यहां लम्बे समय से धान का व्यावसायिक तौर पर उत्पादन होता है। यहां पैदा होने वाली किस्मों की देशभर में मांग बनी रहती है। साथ ही यहां धान की पैदावार बढ़ाने के लिए अनुसंधान जारी रहता है। वर्तमान में यहां का नर-नारी धान पैदा करने का तरीका चर्चा में है। इस तरीके में नर और मादा पौधों के बीच परागण द्वारा कई गुना उत्पादन लिया जा सकता है।

इनका कहना है
मेल-फीमेल हाइब्रिड किस्म की धान पर पिछले करीब चार वर्षों से प्रयोग चल रहा है। फिलहाल बालाघाट जिले के करीब सौ गांवों में इसकी फसल भी ली जा रही है। इसका उत्पादन सामान्य धान की अपेक्षा कहीं ज्यादा होता है। बालाघाट के अलावा छत्तीसगढ़ और आंध्रप्रदेश के भी कुछ जिलों में इसकी खेती की जा रही है। मध्यप्रदेश के अन्य जिलों की परिस्थिति इस किस्म की खेती के लिए अनुकूल नहीं है।
डॉ. आरएल राउत, कृषि वैज्ञानिक, बालाघाट

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