जंगल से महुआ के विदा होते ही तेंदुपत्ता और अचार में दिखी रोजी-रोटी

सुबह से शाम तक बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक संग्रहण में जुटे, चार माह की बारिश के राशन का होगा इंतजाम

By: Rajendra Sharma

Published: 16 May 2020, 05:12 PM IST

छिंदवाड़ा/ कोरोना संक्रमणकाल में लॉकडाउन से शहरी जनजीवन भले ही कैद हो, लेकिन जंगलों में वनोपज की महक वनवासियों में नया उत्साह और उमंग भर रही है। महुआ के फूल का सीजन विदा हो चुका है। अब तेंदुपत्ता और अचार में उन्हें अपनी रोजी-रोटी नजर आने लगी है। सुबह से शाम तक चिलचिलाती धूप या बादलों से बरसती बूंद में बच्चे, महिला और बुजुर्ग तक इस लघु वनोपज को एकत्र करने में जुटे हैं। इस जीविकोपार्जन से उनके चार माह की बारिश के सीजन के लिए राशन का इंतजाम होगा।
जिले के 11.80 लाख हैक्टेयर के कुल क्षेत्रफल में वन क्षेत्र की हिस्सेदारी 29 फीसदी यानी 3.51 लाख हैक्टेयर है। ये जंगल न केवल पर्यावरण के जरूरी, बल्कि बड़ी आबादी की आय का जरिया है। इस समय मई की चिलचिलाती धूप में गांवों का कोई भी परिवार घरों में नहीं बल्कि जंगलों में किसी न किसी पेड़ के नीचे बैठा नजर आ रहा है। किसी को तेंदुपत्ता की तुड़ाई की फ्रिक है तो कोई अचार गुठली में अपने पेट की आग बुझाने के इंतजाम का भविष्य देख रहा है। तेंदुपत्ता तो पूरे जिले की उपज है, लेकिन अचार गुठली बटकाखापा, छिंदी, हर्रई और देलाखारी क्षेत्र की है। ऐसे में इन इलाकों में लोग कोरोना संक्रमण की बात नहीं कर रहे हैं बल्कि उनकी जुबां से लघु वनोपज को बेचकर बारिश के राशन का इंतजाम करने की चिंता ज्यादा सुनाई दे रही है।

एक सप्ताह बाद हर्रा भी आएगा

रेंजर एसोसिएशन के अध्यक्ष और बटकाखापा पश्चिम के ऑफिसर मनेंद्र सिंह बताते हैं कि वनवासी इलाकों में कहीं-कहीं बेमौसम बारिश के माध्यम से प्रकृति नाराज जरूर है, लेकिन जंगलों में तेंदुपत्ता और आचार गुठली का उत्साह कम नहीं हुआ है। महुुआ का सीजन विदा होने के बाद हर व्यक्ति तेंदुपत्ता और आचार गुठली में अपनी रोजी-रोटी तलाशने में जुटा है। एक सप्ताह बाद हर्रा भी आ जाएगा।

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Rajendra Sharma Desk
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