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Tiger Day: आखिर पेंच-सतपुड़ा के बीच क्यों अटका हैं टाइगर कॉरीडोर

बिछुआ से लेकर आलमोद तक था 20 करोड़ रुपए का प्रोजेक्ट, भोपाल में दो साल से सुधि नहीं ले रही सरकार

छिंदवाड़ा

Published: July 29, 2021 10:45:20 am

छिंदवाड़ा.पेंच नेशनल पार्क और सतपुड़ा टाइगर रिजर्व के बीच गुजरती छिंदवाड़ा जिले की सीमा में अगर टाइगर कॉरीडोर बन जाता तो न केवल इस वन्य प्राणी का आवागमन सुलभ हो जाता बल्कि कोल माइंस का बड़ा इलाका भी पूरी तरह हरियाली से आच्छादित हो सकता था लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। करीब 20 करोड़ रुपए के इस ग्रीन इंडिया मिशन प्रोजेक्ट को अभी तक राज्य सरकार की मंजूरी नहीं मिली है। अंतराष्ट्रीय टाइगर डे 29 जुलाई को जब पूरा टाइगर स्टेट मप्र अपने इस गौरव को याद कर रहा होगा तो छिंदवाड़ा में यह मलाल बना रहेगा।
यूं देखा जाए तो ग्रीन इंडिया प्रोजेक्ट पहली बार वर्ष 2011-12 में पश्चिम वन मण्डल के अधिकारियों ने तैयार किया था। प्रोजेक्ट में यह था कि पेंच पार्क के बफर जोन बिछुआ से लगती जंगल की सीमा कन्हान, छिंदवाड़ा, लावाघोघरी, सांवरी, दमुआ, जुन्नारदेव होते हुए सांगाखेड़ा से सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में मिल जाती है। इस मार्ग में टाइगर का आवागमन होता है। इस पूरे मार्ग में कहीं विरले वन है तो दमुआ-जुन्नारदेव से लगती कोल माइंस है। जिसे सघन वन में परिवर्तित करने के लिए प्लांटेशन करना था तो वहीं ग्रामीणों की वैकल्पिक आजीविका का इंतजाम भी होना था। वर्ष 2018 में कमलनाथ सरकार आई तो फिर दोबारा इस प्रोजेक्ट को संशोधित करते हुए 20 करोड़ रुपए की लागत का प्रस्ताव भेजा गया। सरकार के गिरने से यह प्रोजेक्ट लटक गया। अब पुन: टाइगर की बढ़ती संख्या, मानव जीवन के खतरे और उनके निर्धारित मार्ग के लिए पुन: शिवराज सरकार का ध्यान आकर्षित कराया गया है। ये प्रोजेक्ट मंजूर हुआ तो निश्चित ही अगले एक दशक में इस वन्य प्राणी को सुरक्षित मार्ग मिलेगा बल्कि ग्रामीणों को रोजगार के नए साधन मुहैया कराए जा सकेंगे।
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तीन साल पहले गणना में छिंदवाड़ा में मिले थे 46 साक्ष्य
तीन साल पहले वर्ष 2018 में जब वन्य प्राणी गणना हुई थी, तब पूरे छिंदवाड़ा वन वृत्त में टाइगर के 46 साक्ष्य मिले थे और उसे देहरादून भेजा गया था। इनमें पूर्व वनमण्डल में 12, पश्चिम 31 और दक्षिण वनमण्डल में 3 साक्ष्य शामिल थे। वन अधिकारी बताते हैं कि पेंच पार्क के बफर जोन में शामिल कुम्भपानी और बिछुआ रेंज के एक हिस्से में टाइगर का मूवमेंट है तो वहीं चोरई के हलाल से जुड़े जंगल मे बाघ की दहाड़ सुनाई देती है। इसके अलावा परासिया,तामिया और झिरपा से जुड़े सतपुड़ा टाइगर रिजर्व के बफरजोन में भी यह वन्य प्राणी दखल रखता है। दक्षिण में सिल्लेवानी और सौसर का जंगल टाइगर के लिए महफूज है।
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पेंच पार्क का तीसरा गेट जमतरा, जहां भी नजर आते हैं बाघ
सिवनी और छिन्दवाड़ा का गौरव भारत का एक प्रमुख राष्ट्रीय उद्यान पेंच राष्ट्रीय उद्यान टाइगर के दीदार के लिए पर्यटकों का पसंदीदा है। इसका तीसरा गेट जमतरा छिंदवाड़ा में हैं,जहां से भी बाघ को देखा जा सकता है। पेंच राष्ट्रीय उद्यान को 1993 में टाइगर रिजर्व घोषित किया गया। पार्क में इस समय 65 बाघ के अलावा हिमालयी प्रदेशों के ढाई सौ से अधिक प्रजातियों के पक्षी आते हैं। इस स्थान के मशहूर होने के पीछे रुडयार्ड किपलिंग की किताब द जंगल बुक की कहानी इसी पार्क के आसपास बनायी गई थी। इसलिए यह मोगली लैंड के नाम से भी जाना जाता है।
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ये हैं बाघ की खूबी..वर्चस्व के लिए हर समय जंग
बाघ की खूबी ही उसे जंगल में खास बनाती है। बाघ अपने साथी या शावक को भी मार देता है। इनमें वर्चस्व के लिए आपसी फाइटिंग लगातार होती है। यह एक दिन में अधिकतम 25 किमी तक चल सकता है। इसका अधिकतम वजन 250 किलो होता है। बाघ के चार दांत लोहे की तरह होते है। एक मादा अधिकतम 5 शावकों को जन्म देती है। यह भी है कि टाइगर अपने परिश्रम से उतना ही शिकार करता है जितने की उसे जरूरत होती है।
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छिंदवाड़ा, चौरई और बिछुआ के लिए बनवाएंगे वाइल्ड लाइफ प्रोजेक्ट
पूर्व एवं दक्षिण वनमण्डल के डीएफओ अखिल बंसल मानते हैं कि पेंच और सतपुड़ा पार्क के बाहर क्षेत्रीय रेंज में टाइगर की संख्या में वृद्धि खुशी की बात है लेकिन यह मानव के लिए चुनौती भी है। अब टाइगर उमरानाला समेत आसपास पूर्व और दक्षिण वनमण्डल में देखे जा रहे हैं। इस पर छिंदवाड़ा, चौरई और बिछुआ रेंज के लिए अलग वाइल्ड लाइफ प्रोजेक्ट बनाया जाएगा, जिसे कैम्पा मद से स्वीकृत कराने के प्रयास होंगे। यह टाइगर कारीडोर से अलग प्रोजेक्ट होगा।
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इनका कहना है..
पेंच पार्क से सतपुड़ा टाइगर रिजर्व के बीच छिन्दवाड़ा से गुजरते कॉरिडोर से बाघ की आवाजाही बनी रहती है। इन्हें छिंदवाड़ा जिले में सुरक्षित माहौल मिला है।
-केके भारद्वाज,सीसीएफ छिन्दवाड़ा
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छिन्दवाड़ा से लगते दो पार्क के संरक्षित वातावरण और बेहतर परिवेश से टाइगर की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है। इनके सुरक्षित आवागमन के लिए ग्रीन इंडिया मिशन का प्रोजेक्ट बनाकर भेजा गया है। इसकी स्वीकृति का इंतजार है।
-आलोक पाठक,डीएफओ पश्चिम वनमंडल

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