काम नहीं तो वोट नहीं, ग्रामीणों ने किया मतदान का बहिष्कार

भगवान राम की तपोभूमि चित्रकूट और इस जनपद को पिछड़ेपन की दौड़ में आगे करने का काम यहां के सफेदपोशों ने किया है।

चित्रकूट. एक तरफ जहां निर्वाचन आयोग जनता में मतदान को लेकर जागरूकता फैलाने के लिए सजग है तो वहीं नेताओं की कारगुजारियों से आजिज मतदाता (जनता) लोकतंत्र के इस महापर्व (चुनाव) में राजनीतिक दलों को आइना दिखाते हुए मतदान का बहिष्कार करने की चेतावनी दे रहे हैं। ऐसा हो भी क्यों न, जीतने के बाद विधायक और सांसद महोदय इसी जनता जनार्दन को भूल जाते हैं और पांच सालों तक झांकते नहीं उनकी चौखट पर कि जिस जनता ने उन्हें मखमली कुर्सी पर बैठाया है उस जनता का हाल क्या है। कहीं न कहीं ये स्थिति सभी के लिए सोचने वाली बात है।


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बुंदेलखंड की अति पिछड़े जनपदों में गिनती होती है। भगवान राम की तपोभूमि चित्रकूट और इस जनपद को पिछड़ेपन की दौड़ में आगे करने का काम यहां के सफेदपोशों ने किया है। नेता वादों की बैसाखी पर विधायक सांसद तो बने लेकिन जनता से कोसों दूर रहे। अब जबकि विधानसभा चुनाव अपनी बुलंदियों पर है और लोगों में ज्यादा से ज्यादा मतदान को लेकर पूरी प्रशासनिक मशीनरी सक्रिय है।


मतदान न करने की दी चेतावनी

ऐसे में जनपद के एक गांव के बाशिंदों ने मतदान न करने की चेतावनी दी है। जनपद के पहाड़ी ब्लाक अंतर्गत आने वाले गांव अहिरन पुरवा (यादवों का पुरवा) के ग्रामीणों ने आगामी 23 फरवरी को होने वाले मतदान में नेताओं का भाग्य न बदलने यानी वोट न देने का फैसला किया है। ग्रामीणों का कहना है कि आजादी के बाद से अब तक उनके गांव में मूलभूत सुविधाओं (बिजली, पानी, सड़क) का घोर अभाव है। यहां तक कि गांव में आज तक लाइट नहीं है। ग्रामीणों का कहना है कि हर बार वे नेताओं के वादों पर छले जाते हैं और वोट देते हैं लेकिन चुनाव जीतने के बाद कोई नेता उनके गांव में नहीं झांकता।


प्रशासनिक अधिकारी परेशान

माननीयों की बेरुखी से त्रस्त इस गांव के मतदाताओं ने वोट न देने की चेतावनी दी है। ग्रामीणों द्वारा मतदान का बहिष्कार करने की सूचना पर उन्हें समझाने पहुंचे प्रशासनिक अधिकारी भी थक हारकर वापस लौट आए। अधिकारीयों का कहना है कि बुनियादी सुविधाओं के न होने की वजह से ग्रामीणों ने मतदान का बहिष्कार किया है, जिन्हें समझाने की कोशिश जारी है। उधर ग्रामीणों ने प्रशासन से कहा है कि यदि तीन दिन के अंदर उनकी समस्याओं के समाधान का आश्वासन व निराकरण नहीं किया गया तो वे वोट नहीं देंगे। गांव में करीब तीन सौ मतदाता हैं और ये सब जानते हैं कि लोकतंत्र में एक-एक वोट की कीमत होती है।


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नितिन श्रीवास्तव
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