जीवंत हो उठीं विलुप्त होती बुंदेली लोककलाएं

आधुनिकता की चकाचौंध में अपनी मिट्टी की खुशबु से दूर होते भारत के विभिन्न राज्यों की लोककलाएं आज भी उतनी ही प्रासांगिक हैं जितनी ये कभी हुआ करती थीं।

By: Abhishek Gupta

Published: 19 Mar 2017, 11:35 PM IST

चित्रकूट. आधुनिकता की चकाचौंध में अपनी मिट्टी की खुशबु से दूर होते भारत के विभिन्न राज्यों की लोककलाएं आज भी उतनी ही प्रासांगिक हैं जितनी ये कभी हुआ करती थीं। आधुनिकता के नाम पर कानफोड़ू संगीत व् अश्लील चित्रण से इतर देश की लोककलाएं वे सशक्त माध्यम हैं जो पूरे भारत को एक दूसरे से जोड़ने में अपना अहम योगदान रखती हैं। पारम्परिक वाद्ययंत्रों की धुन पर जब थिरकते पैर हर किसी को थिरकने पर मजबूर कर देते हैं, चाहे वे राजस्थानी लोककलाएं हों या गुजराती या बुन्देली या फिर हरियाणवी। सभी लोककलाओं में भारत की गौरवशाली परंपरा का प्रत्यक्ष दर्शन होता है। परन्तु व्यवस्था की अनदेखी की मार झेल रही लोककलाएं आज विलुप्त होने की कगार पर हैं। 

इन कलाओं को या तो इनसे प्रेम करने वालों ने ज़िंदा कर रखा है या तो इन्हें अपनी पुश्तैनी निशानी मानने वाले कलाकारों ने। फिर भी तन मन को प्रफुल्लित कर देती हैं ये लोककलाएं। लोककलाओं का ऐसा ही संगम हुआ चित्रकूट में जहाँ जीवंत हो उठीं बुन्देली लोककलाएं और संजीव हो उठा गौरवशाली इतिहास।

ढोल, मजीरा, तबेला जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप पर घूँघट की ओट से इशारे करती महिला कलाकर व् थिरकते पैर हर किसी को मदमस्त करने के लिए काफी हैं। ख़ास बात यह है कि इस कला में अश्लीलता कोसों दूर है, तो मर्यादा श्रृंगार के रूप में विद्यमान रहती हैं, क्योंकि ये है बुन्देली लोककलाएं। बुन्देलखण्ड के विषय में कहा जाता है कि पानीदार यहाँ का पानी मतलब बुंदेलखंड के कण कण में वीरता व् मर्यादा का दर्शन होता है और इसीलिए इस धरती को वीर आल्हा ऊदल की धरती कहा जाता है। 


जनपद के मुख्यालय स्थित भारत जननी परिसर में आयोजित लोक लय समारोह में बुंदेलखंड की लोककलाओं का संगम हुआ। बुन्देली लोककलाओं में प्रमुख रूप से शामिल फाग गायन, अचरी, दीवारी नृत्य, कछियाई, सैरो ढिमरई, कबीरी भजन गायन,लोकगीत ,बधाई चंगोली ,कोलहाई राई ,बलमा नौटंकी ,सोहर गायन ,आल्हा गायन जैसी लोक विधाए कलाकारों द्वारा प्रदर्शित की गईं। बुन्देलखण्ड के चित्रकूट ,बांदा,महोबा ,ललितपुर ,झांसी ,जालौन ,हमीरपुर ,से आए कलाकारों ने बुन्देली लोककलाओं का प्रदर्शन किया। बुन्देली धरती पर बहुसंख्यक रूप से मौजजूद आदिवासी समुदाय ने भी अपनी लोकपरंपरा को जीवित रखते हुए लोककलाओं को जनमानस से अवगत कराया जिन्हें देखकर गौरव की अनुभूति होती है की भारत कितनी विविधताओं का देश है और ये लोककलाएं कितना सशक्त माध्यम है हम सबको एक करने का। जरूरत इस बात की है कि इन कलाओं को आधुनिता की मार से बचाया जाए व् इन्हें संरक्षित करते हुए इनका विकास किया जाए।
Abhishek Gupta
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