भीषण गर्मी में भी नहीं सूखते ये जंगल, आज भी दस्यु गैंगों के साए में ले रहे सांसें

मिनी चम्बल के नाम से मशहूर चित्रकूट का पाठा क्षेत्र दस्यु गैंगों के लिए मुफीद स्थान है।

चित्रकूट. मिनी चम्बल के नाम से मशहूर चित्रकूट का पाठा क्षेत्र आज भी दस्यु गैंगों के साए में सांसे ले रहा है। चम्बल का बीहड़ तो डकैतों की गर्जना से लगभग मुक्त हो चुका है, लेकिन चित्रकूट के बीहड़ में आज भी बेरहम डकैतों की फेहरिस्त बनी हुई है। ददुआ, ठोकिया, रागिया, बलखड़िया ये बीहड़ की दुनिया के ऐसे नाम हैं जिनकी आहट पाते ही कभी पत्ते भी हिलना बन्द कर देते थे। यूं तो पूरा बुंदेलखंड पानी की कमी व किल्लत से न जाने कब से जूझ रहा है और कब तक जूझेगा। परन्तु बीहड़ में कुछ ऐसे जंगल व स्थान हैं जो हमेशा से इन दस्यु गैंगों के लिए मुफीद माने जाते रहे हैं। शायद इसीलिए जब पूरे बुंदेलखंड में मार्च का महीना शुरू होते ही पानी की दुश्वारियां शुरू हो जाती हैं और बीहड़ के लगभग सारे जंगल सूख जाते हैं। आम ग्रामीण जनता दूर-दूर से पानी लाकर प्यास बुझाती है। ऐसे में मई जून तक के महीने में चित्रकूट के पाठा क्षेत्र में वो स्थान हैं, जहां प्यास बुझाने के लिए पानी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होता है और गैंग इन्हीं स्थानों पर बारिश का मौसम आने तक अपना ठिकाना बनाए रखता है। इसी वजह से पुलिस भी मार्च से लेकर जून तक इन बीहड़ों में अपनी गश्त तेज कर देती है, कि न जाने कब पानी की तलाश में आए गैंग से मुठभेड़ हो जाए।


चित्रकूट का पाठा (मानिकपुर) क्षेत्र बीहड़ को समेटे हुए दस्यु गैंगों की चहलकदमी से पिछले तीन दशकों से खौफ के साए में सांसे ले रहा है। क्योंकि चित्रकूट में डकैतों की तुलना रक्तबीज नाम के उस राक्षस की तरह की जाती है जो अपनी रक्त के बूंद से पुनः जीवित हो जाता था। ठीक उसी तरह ये दस्यु गैंग भी हैं जो एक गैंग के खात्मे के बाद बीहड़ में दूसरे गैंग के रूप में दस्तक दे देते हैं। बीहड़ में रहने वाले गैंग के लिए सबसे जरूरी है पानी, अगर पानी की दिक्कत हुई तो गैंग को बस्तियों की तरफ आना पडेगा। लेकिन चित्रकूट के बीहड़ में स्थित झलमल, बेधक, हनुमान चौक, बरदहाई नदी, टिकरिया के जंगल वो स्थान हैं, जहां पानी की किल्लत शायद ही कभी होती हो। पहाड़ों और घाटियों से निकलते जल श्रोत गैंग की प्यास बुझाने के लिए काफी होते हैं।


पांच लाख के इनामी रहे खूंखार डकैत बलखड़िया (पुलिस इनकाउंटर में ढेर) की जब फोटो पुलिस के हाथ लगी थी तो उसमें भी वो दस्यु सरगना किसी ऐसे ही जलश्रोत के पास बैठा नजर आ रहा था। पुलिस भी मार्च से लेकर जून तक इन इलाकों में अपनी दस्तक गाहे बगाहे देती रहती है। ये सोचकर की गैंग पानी की तलाश में इन इलाकों में आ सकता है और होता भी यही है। लेकिन सटीक मुखबिर तंत्र की बदौलत दस्यु गैंग पुलिस के पहुंचने से पहले ही बीहड़ में विलीन हो जाता है और शायद इसीलिए आज तक जितनी भी मुठभेड़ पुलिस व डकैतों के बीच हुई, वो इन्हीं इलाकों के आसपास हुईं। ददुआ भी उस समय मारा गया था जब उसका गैंग झलमल जंगल में भोजन के लिये रुका और एसटीएफ ने गैंग को घेर लिया था।
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नितिन श्रीवास्तव
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