...तो सुरक्षित नहीं रह गया रेल का सफर, हादसे तो यही बयां करते हैं

पिछले वर्ष 2017 में ही कई जिंदगियां इसी प्रकार की रेल दुर्घटनाओं में मौत की आगोश में समा गईं।

 

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Published: 04 Jan 2018, 08:12 PM IST

चित्रकूट. बुधवार को एक बार फिर हजारों यात्री भीषण रेल हादसे का शिकार होने से बच गए। ऊपर वाले के रहम से समय रहते टूटी हुई पटरी पर एक कर्मचारी की नजर पड़ गई और उसने चालक को आगाह कर दिया। यहां थोड़ा धन्यवाद कोहरे को भी देना पड़ेगा, जिसकी वजह से ट्रेन अपनी निर्धारित गति में ट्रैक पर नहीं थी अन्यथा इमरजेंसी ब्रेक लगाने पर भी ट्रेन लडख़ड़ाते हुए पटरी से उतर सकती थी। बहरहाल पुन: भारतीय रेलवे के अफसरों ने थोड़ी राहत की सांस जरूर ली होगी।

खैर इन सबके बीच यह बात अब बिल्कुल स्पष्ट हो गई है कि रेल का सफर अब तनिक भी सुरक्षित नहीं रह गया है, जी हां होने वाले हादसे और टलने वाले हादसे तो यही बयां करते हैं। आदमी से कमजोर हो गया है रेलवे का लोहा। इतनी कमजोरी तो इंसानों में भी नहीं होती जितनी कमजोरियां भारतीय रेलवे के लोहे के रेल ट्रैकों में आ गई है। आए दिन कहीं न कहीं रेल पटरी के चटकने या टूटने की घटना सामने आती रहती है और इन पटरियों से गुजरने वाली वो ट्रेनें भाग्यशाली होती हैं जो हादसे से बच जाती हैं अन्यथा टूटी पटरियों पर किस कदर भयानक हादसे हुए हैं इसकी तस्वीर अभी ज़्यादा धुंधली नहीं हुई है। पिछले वर्ष 2017 में ही कई जिंदगियां इसी प्रकार की रेल दुर्घटनाओं में मौत की आगोश में समा गईं। इन सबके इतर जांच के नाम पर सिर्फ कार्यवाही की आंच दिखाकर सब कुछ ठण्डा कर दिया जाता है। अगर यही हालात रहे तो आने वाले दिनों में लोग सौ बार सोचेंगे ट्रेन से यात्रा करने के लिए।

एक समय था जब आवागमन के सबसे सुगम और सुरक्षित साधनों में रेल यात्रा का स्थान पहले पायदान पर होता था, लेकिन अब यह बीते जमाने की बात हो गई है। वर्तमान में सबसे खतरनाक और असुरक्षित यात्रा बन गई है ट्रेन से यात्रा करना। जी हां बहुत ज्यादा फ्लैशबैक में जाने की ज़हमत न उठाइए अलबत्ता यदि पिछले वर्ष पर ही नजर डालें तो कई भीषण ट्रेन दुर्घटनाओं की तस्वीरें ज़ेहन में ताजा हो जाएंगी। चाहे मुरी एक्सप्रेस का हादसा हो कानपुर फतेहपुर के अथसराय स्टेशन के पास चाहे मुजफ्फरनगर के पास खतौली में हुआ हादसा हो और फिर चाहे चित्रकूट में पटना वास्कोडिगामा का हादसा हो, इन सभी दुर्घटनाओं में कई रेल यात्रियों को अपनी जान गंवानी पड़ी है।

कटघरे में रेल यात्रा व सुरक्षा

लूट, मारपीट, छिनैती, छेडख़ानी, दुष्कर्म जैसी घटनाओं से सुशोभित होने वाली भारतीय रेलवे इन घटनाओं पर लगाम लगा पाने में तो कामयाब नहीं हो पाई और अब रेल ट्रैक पर होने वाले हादसों ने रेल यात्रा को पूरी तरह से कटघरे में खड़ा कर दिया है इसमें भी कोई संशय नहीं। जिस तरह से कभी भी कहीं भी यात्रियों के साथ कोई अप्रिय घटना हो सकती है ट्रेन के अंदर वैसे ही कभी भी कहीं भी अपनी रौ में दौड़ती ट्रेन बेपटरी हो सकती है और शायद यह वह सच्चाई है जिसे स्वीकार्य करने में भारतीय रेल का कोई भी जिम्मेदार सामने नहीं आएगा।

जांच की आंच फिर खानापूर्ति

हर दुर्घटना के बाद दिल्ली से लेकर सम्बंधित रेल मण्डल तक जांच की आंच दिखाई जाती है, लेकिन कुछ दिनों बाद जांच की आंच ठण्डी पड़ जाती है। शायद ही किसी को याद हो कि पिछली बड़ी ट्रेन दुर्घटनाओं में कौन दोषी पाया गया और कौन पिछले दरवाजे से निकल गया। एक स्याह सच यह भी है कि हर बार छोटी मछलियों को कार्यवाही के नाम पर निगल लिया जाता है और बड़ी मछलियां आराम से गोता लगाती रहती हैं। उदाहरण के तौर पर पिछले वर्ष 2017 में 24 नवम्बर को चित्रकूट में हुई पटना वास्कोडिगामा एक्सप्रेस दुर्घटना को ही लें, इस ट्रेन के दर्जन भर डिब्बे प्लेटफार्म तोड़ते हुए पटरी से उतर गए थे, हादसे में चार यात्रियों की मौत और दर्जन भर से ज़्यादा घायल हुए थे। इस दुर्घटना के बाद भी दिल्ली से लेकर मण्डल मुख्यालय इलाहाबाद तक जांच का हाथी दौड़ाया गया, लेकिन कुछ दूर जाने के बाद वह हाथी बैठ गया। खानापूर्ति के नाम पर पिडब्ल्यूआई सहित दो कर्मचारियों को निलंबित किया गया था, लेकिन जांच के दौरान बहाल भी कर दिया गया। इस मामले में डीआरएम एनसीआर एसके पंकज का कहना है कि जांच पूरी हो गई है और रिपोर्ट उच्चाधिकारियों को सौंप दी गई है।

खतरनाक है मुंबई-हावड़ा रेलमार्ग का इलाहाबाद मानिकपुर रेलखण्ड

देश के प्रमुख रेलमार्गों में एक मुंबई हावड़ा रेलमार्ग का इलाहाबाद मानिकपुर रेलखण्ड खतरनाक स्थिति में आ गया है। पिछले वर्ष ही इस रेलखण्ड पर पटरी टूटने की आधा दर्जन घटनाएं हुई बस गनीमत रही कि कोई भीषण हादसा नहीं हुआ। रेलखण्ड के ट्रैक अक्सर टूटते चटकते रहते हैं। मरम्मत करके इन ट्रैकों से ट्रेन गुजारी जाती हैं जबकि इन ट्रैकों को बदलकर नए रेल ट्रैक बिछाने की आवश्यकता साफ दिखाई पड़ रही है।

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