मज़हबी सौहार्द का पैगाम देती है 'वली शाह दाता' की मज़ार, मकर संक्रांति पर उमड़ता है आस्था का सैलाब

-मज़हबी सौहार्द का पैगाम देती है 'वली शाह दाता' की मज़ार

-मकर संक्रांति पर उमड़ता है आस्था का सैलाब

 

चित्रकूट. शायद इसलिए कहा गया है 'मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना' क्योंकि आज भी कई ऐसे स्थान हैं जो मज़हबी सौहार्द का पैगाम देते हैं। हर किसी का सज़दा उस दर पर पूरी श्रद्धा व आस्था के साथ होता है। ऐसा ही एक स्थान है भगवान श्री राम की तपोभूमि में जहां आपसी भाईचारा व अक़ीदत का एक अनोखा मेला हर साल मकर संक्रांति पर लगता है। यहां हिन्दू भी उतनी ही आस्था के साथ मत्था टेकते हैं जितनी श्रद्धा के साथ मुस्लिम समुदाय। साम्प्रदायिक सौहार्द का संदेश देते इस स्थान की कहानी भी दिलचस्प व अद्भुत है।

गंगा जमुनी तहज़ीब की मिसाल है ये मज़ार


जनपद मुख्यालय से करीब 60 किलोमीटर दूर स्थित साईपुर गांव है। ये गांव सैकड़ों सालों से अपनी एक अनोखी पहचान के लिए जाना जाता है। गांव में स्थित पहाड़ पर वली शाह दाता का मजार है। पवित्र बागे नदी के तट पर स्थित इस मज़ार पर हर साल मकर संक्रांति पर एक विशाल मेला लगता है। इस मेले में जो सबसे खास दृश्य देखने को मिलता है वो है गंगा जमुनी तहज़ीब की मिसाल। हिन्दू व मुसलमान दोनों समुदाय के लोग भारी संख्या में मकर संक्रांति के दिन यहां सज़दा करने मन्नत मांगने आते हैं।


कुछ ऐसी है कहानी


इस स्थान की कहानी भी बड़ी दिलचस्प व अद्भुत है। कहा जाता है कि ये मज़ार लगभग 400 साल से अधिक पुरानी है। किवदंती के मुताबिक साईपुर गांव में सैकड़ों साल पहले वली शाह नाम के एक संत गांव में ही एक बगिया में रहकर ख़ुदा की अक़ीदत में मग्न रहते थे। गांव के लोगों का दुख दर्द भी वे दूर करते थे, जिससे इलाके के सभी वर्गों के लोगों की आस्था व विश्वास का वे केंद्र बन गए। इलाके के बुजुर्गों व मान्यता के मुताबिक उसी दौरान महाराजा छत्रसाल अपने बेटे की बारात लेकर वली शाह दाता की कुटिया के पास से गुजर रहे थे। कहा जाता है कि महाराजा छत्रसाल जब अपने बेटे की बारात लेकर गुजर रहे थे तो विश्राम करने के उद्देश्य से वे कुछ देर बारात सहित वली शाह दाता की कुटिया के पास रुक गए। इसी दौरान महाराजा के कुछ सैनिक वली शाह के आश्रम में चले गए और उनके शिष्यों से कुछ फल फूल आदि मांगने लगे। शिष्यों ने सैनिकों को वली शाह के आने के बाद फूल देने को कहा जिसपर सैनिकों ने इसे नजरअंदाज करते हुए आश्रम में प्रवेश कर आश्रम को नुकसान पहुंचा दिया। इस बात की जानकारी जब वली शाह के शिष्यों ने उनको दी तो वली शाह रुष्ट हो गए और महाराजा छत्रसाल के सैनिकों को शाप दे दिया। सैनिक वहीं पास में बह रही बागे नदी में बह गए।

जब वली शाह के पास गए महाराजा छत्रसाल

घटना के बाद महाराजा छत्रसाल साईपुर गांव में स्थित पहाड़ पर मौजूद वली शाह दाता के पास गए और अपने सैनिकों के कृत्य के लिए क्षमा मांगी। जिसपर उन्होंने(वली शाह दाता) राजा जो माफ़ कर दिया और जिसके बाद नदी में बहे सैनिक बाहर निकल आए।


जिंदा समाधि ले ली वली शाह दाता ने

कहा जाता है कि इस घटना के बाद वली शाह दाता ने उसी पहाड़ पर जिंदा समाधि ले ली। महाराजा छत्रसाल ने उनकी इच्छानुसार पहाड़ तक पहुंचने के लिए सीढ़ियों का निर्माण कराया व उस स्थान पर मत्था टेका।


मकर संक्रांति पर उमड़ता है आस्था का सैलाब

तब से इस स्थान पर मकर संक्रांति के अवसर पर विशाल मेला लगता है। जिसमें हिन्दू मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग बड़ी संख्या में वली शाह दाता की मज़ार पर अक़ीदत के लिए उमड़ते हैं। मकर संक्रांति पर इस मज़ार पर हिन्दू खिचड़ी तो मुस्लिम चादर चढ़ाते हैं। हर कोई अपनी मुरादें लेकर यहां आता है और वली शाह उसकी मुरादें जरूर पूरी करते हैं।

Ruchi Sharma Desk/Reporting
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