क्या इंसान और क्या बेजुबान, पानी के लिए त्राहिमाम...त्राहिमाम!

चित्रकूट जनपद का पाठा क्षेत्र, जहां कण्ठ की प्यास बुझाने के लिए इंसानों से लेकर बेजुबानों तक को जद्दोजहद करनी पड़ रही है।

चित्रकूट. आसमान से बरसती आग में सूखे कण्ठ को दो बूंद पानी अमृत के समान लगता है। सूर्य देव की निर्दयता ने अप्रैल के शुरूआती दिनों में ही इंसानों और बेजुबानों को बेहाल कर दिया है। भरी दोपहरिया में शायद ही कोई निकलना चाहता हो, अलबत्ता मजबूरी और जरुरी होने पर चिलचिलाती धूप में निकलने से कोई खुद को रोक भी नहीं सकता। बुंदेलखण्ड में आसमान से बरसती आग की तपन में सबसे ज्यादा पानी का संकट खड़ा हुआ है। पूरे बुंदेलखण्ड में पानी की विकराल समस्या जगजाहिर है। इनमें से ही एक है चित्रकूट जनपद का पाठा क्षेत्र, जहां कण्ठ की प्यास बुझाने के लिए इंसानों से लेकर बेजुबानों तक को जद्दोजहद करनी पड़ रही है। पूरे पाठा क्षेत्र में कस्बों से लेकर दूरदराज और बीहड़ में बसे इलाकों में पानी की विकराल समस्या मुंह बाए खड़ी है। तो वहीं सूखे तालाब नदियां बेजुबानों को प्यासा भटका रही हैं। शहरी क्षेत्र में तो प्यासे गले को तर करने के लिए विभिन्न साधन मौजूद हैं, लेकिन ग्रामीण, बीहड़ और जंगली इलाकों में एक बूंद पानी ही अमृत के समान नजर आता है। पानी के लिए पाठा हर पल संघर्ष कर रहा है।




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जनपद के बीहड़ में बसा पाठा क्षेत्र (मानिकपुर मारकुंडी) इस आग बरसती तपन में पानी के लिए संघर्षरत है। इंसान ही नहीं बेजुबान भी एक बूंद पानी के लिए भटक रहे हैं। जंगल में लगी आग ने इस समस्या में कोढ़ में खाज का काम किया है। जंगलों में मौजूद छोटे-छोटे जलश्रोत आमतौर पर तो गर्मी का मौसम शुरू होते ही सूखने लग जाते हैं। लेकिन कई जल माध्यम थोड़ा बहुत पानी की मात्रा से गुलजार रहते हैं और अप्रैल-मई के शुरआती दिनों तक ये जलश्रोत जानवरों और इंसानों के लिए प्यास बुझाने की भूमिका अदा करते हैं। लेकिन जंगल की आग ने इनपर भी पहरा लगा दिया है। आग की वजह से सबकुछ खत्म हो गया है और बेजुबान बेचारे पानी की तलाश में जंगल से बाहर इधर-उधर भटकने को मजबूर हैं। इंसानी बस्तियों में भी पेयजल समस्या का साम्राज्य कायम है। प्रशासन की उदासीनता के चलते कई हैण्डपम्प शोपीस बने हैं तो वहीं जिन हैण्डपम्पों से पानी रूपी अमृत प्रकट हो रहा है। वहां सूर्योदय के साथ ही पानी भरने की होड़ मच जाती है। शहरी क्षेत्र का बाशिंदा जहां अपना गला तर करने के लिए शिकंजी, बेल का शर्बत, कोल्ड ड्रिंक आदि का सहारा ले रहा है तो वहीं ग्रामीण इलाकों में सादा पानी ही दो बूंद जिंदगी के रूप में नजर आ रहा है। पाठा क्षेत्र में पानी की यह विकराल समस्या व्यवस्था की उस खामी की ओर इशारा करती है जहां आश्वासन के सिवा कुछ और नहीं हैं। सुदूर इलाकों में पेयजल समस्या दूर करने के लिए अथक प्रयास करने पड़ेंगे, परंतु करेगा कौन यह यक्ष प्रश्न है।
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नितिन श्रीवास्तव
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