सिस्टम की लाचारी से मरणासन्न अवस्था में पहुंचा काष्ठ कला उद्योग

प्रश्न यह नहीं कि क्या है बुन्देलखण्ड में, बल्कि बुन्देलखण्ड खुद पूछता है कि क्या नहीं है मेरी आगोश में...

चित्रकूट. प्राकृतिक संसाधनों से सुसज्जित बुन्देलखण्ड में पलायन संस्कृति जन्म न लेती, अगर दिल्ली और लखनऊ में बैठे नीति निर्धारक मखमली कुर्सियों पर सोते न होते। जी हां यह बिल्कुल उतना सत्य है जितना कि बुंदेलखण्ड को आज तक सिर्फ छला गया है इस देश और प्रदेश के हुक्मरानों द्वारा। सूखा बेरोजगारी भुखमरी पलायन जैसे शर्मशार करने वाले मुद्दों को ढाल बनाकर बुन्देलखण्ड की सहानुभूति लूटने वाले नीति नियंता यदि अपने वादों पर 10 प्रतिशत भी कायम रहते तो आज जो तस्वीर इस क्षेत्र की है वो शायद न होती। प्रश्न यह नहीं कि क्या है बुन्देलखण्ड में, बल्कि बुन्देलखण्ड खुद पूछता है कि क्या नहीं है मेरी आगोश में। चाहे प्राकृतिक संसाधनों की सुविधा हो या कुटीर और लघु उद्योगों की संभावना सभी बुन्देलखण्ड के आंगन में मौजूद थे और हैं लेकिन सिस्टम की लाचारी ने इन्हें मरणासन्न अवस्था में पहुंचा दिया है। बुन्देलखण्ड का ऐसा ही एक परम्परागत उद्योग है काष्ठ कला उद्योग जो अवयवस्थाओं और आधुनिकता की भट्टी में सुलगने को मजबूर है। इस उद्योग के लिए जिस जनपद की पहचान की जाती है वो है भगवान राम की तपोस्थली चित्रकूट। चित्रकूट में इस उद्योग ने दम तोड़ दिया है। कारोबार से जुड़े परिवार वयापारी अपना रास्ता बदल चुके हैं हां थोडा बहुत पुश्तैनी निशानी के तौर पर इस इससे रिश्ता बनाए हुए हैं। जब जब भी निजाम बदलता है तब तब इस परम्परागत उद्योग को उम्मीदों की किरण नजर आती है लेकिन हर बार ये उम्मीदें दगा कर जाती हैं।


प्रभु श्री राम की तपोभूमि चित्रकूट, एक समय था जब इस जनपद की पहचान अपने काष्ठ कला उद्योग के रूप में होती थी। तपोभूमि घूमने आने वाले पर्यटक अपने हांथो में यहां के लकड़ी के खिलौने उनसे बने सजावटी और घरेलू सामान जरूर लेकर जाते थे। परन्तु अफ़सोस कि अब यह इतिहास के पन्नों में दर्ज होने को बेताब है। गुजरे जमाने की बात हो गई चित्रकूट के लकड़ी के खिलौने। ज़िम्मेदारों ने ऐसा खेल खेला वादों का कि यह उद्योग वेंटिलेटर पर पहुंच गया है।

 

कभी घर-घर खुले थे कारखाने

जनपद में अच्छे किस्म की लकड़ियां जिनसे अच्छी क्वालिटी के खिलौने व मजबूत सामान बनाए जा सकते हैं आज भी प्रचुर मात्रा में जंगलों में मौजूद हैं। कभी घर घर इन लकड़ियों से खिलौने व घरेलू सामान बनाने के कारखाने खुले हुए थे जो जीवकोपार्जन का प्रमुख साधन थे लेकिन बदलते परिवेश, ज़िम्मेदारों की अनदेखी सरकारों की उदासीनता और बाजार पर आधुनिकता की चादर ने इस उद्योग को धुंधला कर दिया।

 

एक नहीं कई कारण हैं उद्योग के खत्म होने के

कई वर्षों तक इस उद्योग से जुड़े रहे अरुण गुप्ता बताते हैं कि बिजली की अनियमित आपूर्ति, बढ़ी हुई कीमत, खिलौनों पर लगने वाले रंग और महंगी होती लकड़ी ये ऐसे प्रमुख कारण हैं जो इस उद्योग को लुप्त होने की कगार पर खड़ा कर चुके हैं। इन सबके बीच हर बार सत्ता पर काबिज होने की लालसा में माननीयों द्वारा वादे तो किए गए और किए जाते हैं लेकिन कुर्सी पाने के बाद सब कुछ बेवफ़ा हो जाते हैं माननीय। सरकारें जहां गरीब मजदूर और बेसहारा लोगों को तरह तरह के अभियान चलाकर आधुनिक भारत के निर्माण का सपना दिखाती आ रही हैं वहीं जीवकोपार्जन के मजबूत और परम्परागत साधनों को आईसीयू में छोड़ती जा रही है।


चीनी खिलौनों ने की सेंधमारी

एक तो गरीबी ऊपर से आटा गीला, जी हां यह बात एकदम सटीक बैठती है इस उद्योग से जुड़े लोगों पर। हर तरह की अवयवस्थाओं के चलते मरणासन्न अवस्था में पहुंचे इस कारोबार को और पलीता लगाया चाइनीज़ खिलौनों ने। कारोबार से जुड़े रहे संजय सिंह का कहना है कि चीनी खिलौनों की उपस्थिति ने बाज़ार पर एकतरफा कब्जा कर लिया है। सरकारों की उदासीनता है सो अलग। लकड़ी के मुकाबले चीनी खिलौने सस्ते होते हैं जो एक प्रमुख कारण है घाटे का दूसरी तरफ नई पीढ़ी को लकड़ी के खिलौनों की बजाए प्लास्टिक व चाइनीज़ खिलौने ज़्यादा भाते हैं। ऐसा नहीं कि आज भी लकड़ी के खिलौनों की डिमांड नहीं है या उनकी बिक्री ज़्यादा नहीं हो सकती परन्तु संसाधनों के अभाव में जब अच्छे खिलौने तैयार ही नहीं होंगे तो खरीदेगा कौन।

 

वन विभाग की लापरवाही

काष्ठ कला उद्योग को हाशिए पर ले जाने में वन विभाग का भी सराहनीय योगदान रहा है। कारीगरों का कहना है कि वन विभाग की लापरवाही के चलते स्थानीय कारीगरों वयापारियों को अच्छी गुणवत्ता की लकड़ियां नहीं मिल पाती जबकि दूसरे जनपद के वयापारी बड़े पैमाने पर पहले ही लकड़ियां खरीद ले जाते हैं। बची कुची निम्न क्वालिटी की लकड़ी जनपद के कारीगरों को दे दी जाती है।

नितिन श्रीवास्तव
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