...और बयालीस घंटे में खत्म हो गई ममत्व की कहानी

दुनिया भर के शास्त्र साक्षी है कि संसार में मां के ममत्व से बड़ा कोई नहीं हो सकता, लेकिन चित्तौडग़ढ़ में जन्म के सिर्फ छह घंटे बाद ही नवजात का त्याग करने व अस्पताल में बयालीस घंटे तक मौत और जिन्दगी की जंग लड़ते हुए टूटी जीवन की डोर ने मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख दिया है।

By: jitender saran

Published: 21 Aug 2021, 12:32 PM IST

चित्तौडग़ढ़
दुनिया भर के शास्त्र साक्षी है कि संसार में मां के ममत्व से बड़ा कोई नहीं हो सकता, लेकिन चित्तौडग़ढ़ में जन्म के सिर्फ छह घंटे बाद ही नवजात का त्याग करने व अस्पताल में बयालीस घंटे तक मौत और जिन्दगी की जंग लड़ते हुए टूटी जीवन की डोर ने मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख दिया है।
मामला चित्तौडग़ढ़ के महिला एवं बाल चिकित्सालय के पालना घर से जुड़ा हुआ है। जन्म के महज छह घंटे बाद दूध पिलाना तो दूर, आठ माह तक कोख में सहेजने वाली उस जननी ने अपने लाल को जी भरकर देखा भी नहीं होगा कि नवजात को किसी के क्रूर स्वभाव की नजर लग गई। क्रूर हाथों ने मां से बिसराकर इस नवजात को बुधवार की आधी रात को महिला एवं बाल चिकित्सालय के पालना गृह में डालकर परायों के हाथों सौंप दिया। मां की ममता से भी ज्यादा इंसानियत वाले निकले अस्पताल के नर्सिंग कर्मचारी, जिन्होंने पालना घर का अलार्म बजते ही नवजात की सुध ली। अस्पताल की एनआईसीयू युनिट के प्रभारी डॉ. जयसिंह मीणा घंटों तक नवजात की सांसें बचाने में जुटे रहे, लेकिन हुआ वही, जो विधाता को मंजूर था। शुक्रवार दोपहर करीब सवा बारह बजे आखिर यह नवजात जिन्दगी की जंग हार गया। डॉ. मीणा ने बताया कि नवजात को 'रेस्पेरेटरी डिस्ट्रेस सिण्ड्रोमÓ की तकलीफ थी। यह एक ऐसी स्थिति है, जिसमें फेंफड़ों की हवा की थैलियों में तरल जमा हो जाता है, जिससे अंगों को ऑक्सीजन नहीं मिल पाता है। नवजात का शव बाल कल्याण समिति को सौंपा गया। समिति नेे उसका अंतिम संस्कार कर दिया।

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