कभी परकोटे में सिमटा था चित्तौड़ शहर, रात दस बजे उदयपुर से आने वाली ट्रेन के बाद बंद हो जाते थे दुर्ग के द्वार

dinesh saini

Publish: May, 17 2018 06:29:33 PM (IST)

Chittorgarh, Rajasthan, India
कभी परकोटे में सिमटा था चित्तौड़ शहर, रात दस बजे उदयपुर से आने वाली ट्रेन के बाद बंद हो जाते थे दुर्ग के द्वार

अब दूर तक फैल गए Chittorgarh के उपनगर...

चित्तौडगढ़़। सालों पूर्व Chittorgarh Fort के साथ शहर भी परकोटे में समाया था। आज दुर्ग का परकोटा दूर से नजर आता है, लेकिन बीते करीब पचास साल पूर्व शहर का परकोटा समाप्त हो गया। कभी जहां परकोटा था, वहां आज आबादी क्षेत्र और बाजार हो गए हैं। बुजुर्ग बताते हैं कि आज का Chittor उपनगरों तक पहुंच कर काफी विस्तृत्व हो गया है। करीब पचास, साठ साल पूर्व तक यह शहर पाडनपोल से गोल प्याऊ तथा ओछड़ी दरवाजे से दिल्ली दरवाजे तक ही था। चारों ओर क्रमश: गोल प्याऊ पर पुल दरवाजा, वर्तमान गांधीनगर क्षेत्र की ओर ओछड़ी दरवाजा, बूंदी रोड पर दिल्ली दरवाजा तथा दुर्ग की ओर पाडनपोल दरवाजा था। शहर इन्ही दरवाजों के भीतर ही था। करीब 50 वर्ष पूर्व नगरपालिका के गठन के बाद धीरे-धीरे शहर बढ़ता गया। इससे परकोटा टूटता चला गया।

 

गोल प्याऊ का पुल दरवाजा भी इतने ही सालों पूर्व टूट गया। शेष दरवाजे तो आज भी यथावत है। पहले गोल प्याऊ से आगे वन क्षेत्र था। दूर रेलवे स्टेशन था, जहां से रात में अकेले आने जाने में लोग डरते थे। रात करीब दस बजे उदयपुर से आने वाली ट्रेन के बाद दुर्ग के दरवाजों के द्वार बंद कर दिए जाते थे। दुर्ग पर कच्ची सडक़ थी।

 

1955 में बनीं पक्की सडक़
बुजुर्ग बताते हैं कि वर्ष 1955 में देश के प्रथम प्रधानमंत्री 6 अपे्रल को दुर्ग पर आए। इससे कुछ दिन पूर्व पहली बार पाडनपोल से चौगानियां स्थल तक पक्की सडक़ बनी थी। दुर्ग के कुण्ड, बावडिय़ों से लोग पानी पीते थे। आज इन कुण्डों में कांई पसर रही है। घर-घर में नल लग गए हैं। टयूबवेल भी हैं।

 

दुर्ग से गायब हुए बैलगाड़ी और तांगे
चित्तौड़ दुर्ग पर करीब 40-45 साल पूर्व आवागमन के साधनों में बैलगाड़ी और तांगे प्रमुख थे। इनकी संख्या दर्जनों में थीं। लोग घरेलू सामान बैलगाड़ी में तथा सवारी के लिए तांगों का उपयोग करते थे। दुर्ग पर एक आना व दो आना में तांगें की सवारी होती थी। करीब 30 से 35 वर्ष पूर्व टेम्पो (ऑटो रिक्शा) का चलन शुरू होने के बाद तांगे बंद से हो गए। सालों से दुर्ग पर तांगे नजर नहीं आते।

 

पाडनपोल में थी कलक्ट्री
जब चित्तौड़ जिला बना था तब शहर छोटा था। इसे आज भी भीतरी शहर कहते हैं। तब पाडनपोल के अंदर जेल थी तथा बाहर के भवन में कलक्ट्री थी। वहां जिला कलक्टर, उपखंड अधिकारी, तहसीलदार तथा अन्य अधिकारी, कर्मचारी बैठते थे। आज इस भवन में पाडनपोल का बालिका उच्च प्राथमिक विद्यालय तथा सिटी डिस्पेन्सरी चलती है।

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