लॉकडाउन ने बदल दी जिंदगी, घर से ही पूजा, इबादत

नौकरी या व्यवसाय की जिम्मेदारियों से मुक्त होने के बाद दिन का अधिकतर समय पूजापाठ, इबादत में धर्र्मस्थलों पर बीत रहा था। अब कोरोना वॉयरस के कारण पिछले करीब तीन माह से लॉकडाउन की स्थिति ने सबसे बड़ी समस्या जिले के उन वरिष्ठ नागरिकों के सामने खड़ी कर दी जिनकी आदत में मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरूद्वारा जाना बन चुका था। सुबह उठते ही पूजास्थलों पर जाने की आदत इनके द्वार बंद हो जाने से बड़ी मुश्किल से छोडऩी पड़ी है।

By: Nilesh Kumar Kathed

Updated: 14 Jun 2020, 11:59 PM IST

चित्तौडग़ढ़. नौकरी या व्यवसाय की जिम्मेदारियों से मुक्त होने के बाद दिन का अधिकतर समय पूजापाठ, इबादत में धर्र्मस्थलों पर बीत रहा था। अब कोरोना वॉयरस के कारण पिछले करीब तीन माह से लॉकडाउन की स्थिति ने सबसे बड़ी समस्या जिले के उन वरिष्ठ नागरिकों के सामने खड़ी कर दी जिनकी आदत में मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरूद्वारा जाना बन चुका था। सुबह उठते ही पूजास्थलों पर जाने की आदत इनके द्वार बंद हो जाने से बड़ी मुश्किल से छोडऩी पड़ी है। प्रतिदिन वहां जाने की आदत होने से द्वार बंद होने पर भी अब भी कई बुर्जुग सुुबह या शाम को घर के नजदीक होने पर पूजास्थल पर पहुंच बाहर से ही उसको देखते है। उन्हें फिर इनके खुलने का इंतजार है ताकि फिर वो इन स्थानों पर बैठ अपने भगवान की प्रार्थना या खुदा की इबादत कर सके। पूूजास्थल बंद हुए तो अब भक्तगण घर में ही सुबह उठते ही भगवान की पूजा में समय दे रहे तो मुस्लिम धर्मावलम्बी घर पर ही नमाज अदा कर रहे है। सिख धर्मावलम्बी भी गुरूद्वारा बंद होने से घर से ही गुरू की अरदास कर रहे है तो चर्च के द्वार बंद होने से ईसाई धर्म को मानने वाले भी अपने घर से ही गॉड यीशू से प्रार्थना कर रहेे है।
मुश्किल तो हुई पर बदलना तो होगा ही
वर्षो से प्रतिदिन सुबह मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारा जाने की आदत वाले बुर्जुगों को ये बंद मिलने से मुश्ेिकल तो हुई। घर पर प्रार्थना या इबादत की आदत नहीं थी लेकिन अब ऐसा करना पड़ रहा है। सेवानिवृत कर्मचारी ७५ वर्षीय धर्मीचंद शर्मा कहते है कि कोरोना ने सबसे बड़ी परेशानी उन जैसे बुर्जुगों के लिए खड़ी कर दी जिनके लिए जीवन के इस पड़ाव में बदलाव बहुत मुश्किल होता है। इसके बावजूद वो बदलने का प्रयास कर रहे है। घर पर ही पूजा करने की आदत डाल ली। सुबह-शाम प्रार्थना का समय होने पर मंदिर बंद है तो घर पर ही कर लेते है।
मोबाइल फ्रेण्डली नहीं होने से भी परेशानी
कई मंदिरों व धर्र्मस्थलों की प्रतिदिन की पूजा-आराधना ऑनलाइन देखी जा सकती है लेकिन वहां प्रतिदिन जाने वाले कई बुर्जुग मोबाइल फ्रेण्डली नहीं होने से इनका लाभ नहीं उठा पा रहे है। हालांकि कुछ जगह परिवार के अन्य सदस्य बुर्जुगों को इससे जोडऩे का प्रयास करते है। कई बुर्जुग सामान्य मोबाइल फोन तो चला लेते है लेकिन टचस्क्रीन वाले स्मॉर्टफोन चलाने में परेशानी महसूस करते है।
बुर्जुगों को रखनी अधिक सावधानी
कोरोना काल में बुर्जुगों को आमदिनों से अधिक सावधानी रखनी है। लॉकडाउन में छूट के बावजूद सरकार ने ६५ वर्ष या उससे अधिक उम्र वालों को बहुत जरूरी नहीं होने पर घर से नहीं निकलने की सलाह दी है। बुर्जुगों को बाहर निकलने पर मास्क लगाने के साथ सोशल डिस्टेसिंग के प्रति भी अधिक जागरूक रहना होगा ताकि स्वयं को कोरोना संक्रमण से बचा सके।

Nilesh Kumar Kathed
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