चित्तौडग़ढ़ में डेढ सौ गांवों के पानी में घुला हुआ है इस तरह का जहर, आप भी जानकर रह जाएंगे हैरान

चित्तौडग़ढ़ जिले के करीब डेढ़ सौ गांवों में बच्चों पर ब्लू बेबी सिण्ड्रोम और बड़ों पर गुर्दे और लीवर खराब होने का खतरा मंडरा रहा है। इसकी खास वजह यह है कि इन गांवों के पानी में नाइट्रेट की मात्रा बहुत अधिक है। कई गांवों में तो इसकी मात्रा निर्धारित से १२ गुना तक ज्यादा पाई गई। इस संबंध में राज्य सरकार को भी रिपोर्ट भिजवाई जा चुकी है।

By: jitender saran

Published: 11 Jun 2021, 10:50 AM IST

चित्तौडग़ढ़
जिले के ग्रामीण अंचल में पीने के पानी को फिल्टर करने के कोई इंतजाम नहीं होने के कारण यहां की आबादी ट्यूबवैल और हैण्डपम्प के पानी पर निर्भर हैं। पानी में नाइट्रेट की अधिक मात्रा किडनी और लीवर को प्रभावित करने के साथ ही बच्चों को ब्लू बेबी सिण्ड्रोम का शिकार बना सकती है।
मापदण्ड से ज्यादा है स्तर
स्वास्थ्य के लिए पानी में नाइट्रेट का सुरक्षित स्तर ४५ मिलीग्राम माना गया है। इसके विपरीत जिले के पारी खेड़ा गांव के पानी में इसका स्तर ५२५ मिलीग्राम है। इसी तरह बड़ीसादड़ी के परबती गांव में २९३ मिग्रा, पायरों का खेड़ा में ३५३, बड़वल में १८२, भियाणा में ३८१, भुरकिया कलां में १०९, सरथला १२२, कचुमरा में १५७, पण्डेडा में ३४२ और बुल गांव में २२० मिलीग्राम पाया गया है। टाण्डा में २०५, गाडरियावास में २१०, कपासन क्षेत्र के जाशमा में २१०, मालीखेड़ा में २९०, निलोद में २३०, बंजारा खेड़ा में २२०, पारीखेड़ा में ५२५, पारी में ३२५, शिव नगर में ३६५, करजाली में पानी में नाइट्रेट की मात्रा २३३ मिलीग्राम है। यह तो सिर्फ उदाहरण है। जिले में ऐसे ही करीब डेढ़ सौ गांव हैं, जहां लोगों के शरीर में पानी के साथ नाइट्रेट की अत्यधिक मात्रा पहुंच रही है।

सरकार को भेजी थी रिपोर्ट
जिले के गांवों में पानी में नाइट्रेट की मात्रा को लेकर राज्य सरकार को भी रिपोर्ट भेजी गई थी, लेकिन इन गांवों के पानी में नाइट्रेट की मात्रा पर नियंत्रण को लेकर अब तक कोई इंतजाम नहीं किए गए हैं।

डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार पेयजल में नाइट्रेट की अधिकता का सर्वाधिक दुष्प्रभाव दुधमुंहे और छोटे बच्चों को झेलना पड़ता है। इससे बच्चों में 'ब्लू बेबीÓ उर्फ नीलापन रोग की संभावनाएं बढ जाती है। इसमें बच्चे के पाचन व श्वसन तंत्र में दिक्कत आती है। आंतों के कैंसर का खतरा होता है। यहां तक कि ब्रेन डैमेज या मौत तक हो सकती है। यह शरीर में ऑक्सीजन को विभिन्न अंगों तक लाने-ले जाने का काम करने वाले हिमोग्लोबिन का स्वरूप भी बिगाड़ देता है। लिहाजा ऑक्सीजन उत्तकों तक नहीं पहुंच पाती। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, भारत में ७.८ लाख लोग प्रदूषित पानी व गंदगी से बीमारियों से मरते हैं।

यह भी है वजह
शहरी इलाकों में भूमिगत जल में नाइट्रेट की मात्रा सामान्य पाई जाती है। गांवों के भूमिगत जल में इसकी ज्यादा मात्रा की बड़ी वजह है खेतों में यूरिया सरीखे रसायनों का इस्तेमाल। इंसान ८० से ९० प्रतिशत नाइट्रेट सब्जियों से लेता है, लेकिन इससे बीमारी की गुंजाइश कम रहती है क्योंकि इसकी बहुत ही कम मात्रा नाइट्राइट में बदलती है, जो इंसान के लिए खतरनाक होती है।

क्या है नाइट्रेट
नाइट्रेट मुख्यतया अकार्बनिक है। यह ऑक्सीडायजिंग एजेंट का काम करता है और विस्फोटक बनाने में भी इस्तेमाल होता है। पोटेशियम नाइट्रेट शीशा निर्माण उद्योग में तो सोडियम नाइट्रेट खाद्य प्रसंस्करण में इस्तेमाल होता है।

खेती-मछली पालन पर भी असर
-नाइट्रोजन उर्वरकों के अधिक उपयोग से कृषि जमीन की उत्पादक क्षमता घटती है।
-पानी में नाइट्रेट की अधिकता के कारण में अवांछित शैवाल की वृद्धि से मछली उत्पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।

बचाव के तरीके
-भू-जल में घातक तत्व हों, वहां सुनिश्चित किया जाए कि शुद्ध पेयजल ही इस्तेमाल किया जाए।
-जैविक उर्वरक एवं प्राकृतिक खाद के उपयोग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
-रेन वाटर हार्वेस्टिंग एवं परलोकेशन टैंक के जरिए भू-जल स्तर बढ़ाकर इसके स्रोतों हानिकारक तत्वों की मात्रा कम की जा सकती है।

घातक है ज्यादा नाइट्रेट
शरीर में आवश्यकता से अधिक नाइट्रेट जाने से आमाशय का कैंसर व ब्लड कैंसर हो सकता है। नाइट्रेट शरीर में में हिमोग्लोबिनिया का स्वरूप बदल देता है, इससे सांस लेने में तकलीफ, बच्चों में ब्लू बेबी सिण्ड्रोम, लीवर व गुर्दे पर कूप्रभाव पड़ सकता है। इसके अलावा थायरॉइड और हारमोन्स भी प्रभावित होते हैं।
डॉ. मधुप बक्षी
वरिष्ठ फिजीशियन, बिरला अस्पताल चित्तौडग़ढ़

jitender saran Reporting
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