scriptAjola will become a boon for livestock farmers, full of nutrients | Ajola is a balanced diet for animals- पशुपालकों के लिए वरदान बनेगा अजोला, पौष्टिकता से भरपूर | Patrika News

Ajola is a balanced diet for animals- पशुपालकों के लिए वरदान बनेगा अजोला, पौष्टिकता से भरपूर

चूरू (सरदारशहर). क्षेत्र में इन दिनों पशुओं का चारा सबसे बड़ी समस्या है। भूमि, पानी और वातावरण मुफीद न होने से पशुपालक और किसान चारा संकट से हमेशा जूझते रहते हैं, लेकिन यहां कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिकों ने अजोला प्रजाति के चारे का उत्पादन किया है। यह मामूली लागत और कम समय में पैदा होने के साथ ही पोषक तत्वों से भरपूर है। इसका इस्तेमाल जैविक खाद के रूप में भी हो सकता है।

चुरू

Published: June 20, 2022 12:53:27 pm

चूरू (सरदारशहर). क्षेत्र में इन दिनों पशुओं का चारा सबसे बड़ी समस्या है। भूमि, पानी और वातावरण मुफीद न होने से पशुपालक और किसान चारा संकट से हमेशा जूझते रहते हैं, लेकिन यहां कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिकों ने अजोला प्रजाति के चारे का उत्पादन किया है। यह मामूली लागत और कम समय में पैदा होने के साथ ही पोषक तत्वों से भरपूर है। इसका इस्तेमाल जैविक खाद के रूप में भी हो सकता है। यह चारा पशुओं के भूसा व चारा में मिलाकर खिलाया जाता है। पशु बड़े चाव से खाते हैं। इससे दूध में वृद्धि होती है। मुर्गियां भी इसे पसंद करती हैं, इससे अंडा उत्पादन में बढ़ोत्तरी होती है। अजोला चारा की पैदावार पूरे वर्ष होती है। यह छिछले (6 से 8 इंच) पानी में होता है। गड्ढे या पिट खोदकर उसमें पॉलिथिन बिछाकर पानी भर दिया जाता है। 4 से 6 दिन पुराना गोबर डाला जाता है। 12 से 15 दिन में अजोला तैयार हो जाता है। इसकी बुवाई केवल एक बार की जाती है। बचे हुए चारे से यह 15 दिन में तैयार हो जाता है।
Ajola is a balanced diet for animals- पशुपालकों के लिए वरदान बनेगा अजोला, पौष्टिकता से भरपूर
Ajola is a balanced diet for animals- पशुपालकों के लिए वरदान बनेगा अजोला, पौष्टिकता से भरपूर
अजोला जलीय फर्न है
अजोला जल सतह पर मुक्त रूप से तैरने वाली जलीय फर्न है। यह छोटे-छोटे समूह में सघन हरित गुच्छे की तरह तैरती एवं फैलती है। भारत में इसकी प्रजाति अजोला पिन्नाटा एवं एनाबियाना काफी उपयुक्त पाई गई है। यह अधिक गर्मी सहन करने वाली किस्म है। इसकी खेती काफी वृहद रूप से चीन, वियतनाम और फिलीपीन्स में की जाती है। दक्षिण भारत में खासकर तमिलनाडु और केरल एवं कृषि विज्ञान केन्द्रों में काफी क्षेत्रों में इसका उत्पादन किया जा रहा है। अजोला कम लागत का, पशुओं के लिए एक पौष्टिक आहार है। शुष्क भार के आधार पर इसमें 25-35 प्रतिशत प्रोटीन, 10-12 प्रतिशत खनिज पदार्थ एवं 7-10 प्रतिशत अमीनो अम्ल पाए जाते हैं। यह शीघ्र वृद्धि वाली किस्म है। बुआई के पश्चात इसका उत्पादन 8-10 दिनों के अंदर प्राप्त होना शुरू हो जाता है। अजोला को पशु आसानी से पचा सकते हैं, क्योंकि इसमें रेशा तथा लिग्निन कम मात्रा में पाया जाता है। अजोला को पूरक आहार के रूप में भी प्रयोग करने पर 15-20 प्रतिशत कुल दुग्ध उत्पादन बढ़ जाता है।
अजोला का चुनाव खासकर इसलिए किया गया क्योंकि इसका पशुओं के लिए एक संतुलित आहार के रूप में प्रयोग किया गया है। इसमें प्रोटीन की प्रचुर मात्रा, खनिज पदार्थ एवं अमीनो अम्ल भी पाए जाते हैं। अजोला खिलाने से न केवल पशु स्वस्थ एवं निरोग रहता है बल्कि दूध की उत्पादकता में भी 10-15 प्रतिशत की वृद्धि पाई गई है। इसके अलावा शारीरिक विकास में भी यह काफी सहायक सिद्ध हुआ है। कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिक श्यामबिहारी व्यास ने बताया कि अजोला पशु पालकों एवं कृषि के लिए वरदान साबित हो रहा है। अजोला का प्रयोग हरी खाद की तरह भी होता है। इसके अलावा इन्हें मुर्गी, बत्तख, गाय, भैंस, बकरी को खिलाया जाता है। इसका बीज (मदर कल्चर) 200 रुपए प्रति किलो है। उन्होंने बताया कि थोड़ी सी मेहनत और प्रयास से अजोला चारा एक गड्ढे से रोजाना एक से दो किलो तक हासिल किया जा सकता है।

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