‘आयुर्वेद’ को खुद ‘पंचकर्म’ इलाज की जरूरत, जानिए कैसे...

आयुर्वेद को सच में देखा जाए, तो फिलवक्त खुद के ‘पंच कर्म उपचार’ की जरूरत है।

Brijesh Singh

February, 1512:14 PM

चूरू. उदर रोग समेत पूरे शरीर की चिकित्सा में एक समय भरोसेमंद उपचार विधियों में शुमार रहे आयुर्वेद को सच में देखा जाए, तो फिलवक्त खुद के ‘पंच कर्म उपचार’ की जरूरत है। ऐसा नहीं है कि मरीज यहां चिकित्सालयों में आते नहीं हैं। लेकिन यहां मौजूद चिकित्सकों की भी मजबूरी है कि उन्हें सिर्फ चूरन-चटनी जैसी न्यूनतम मौजूद औषधियों के बलबूते ही उनका इलाज करना पड़ रहा है। गौरतलब है कि आयुर्वेद की सशक्त धारा, जो औषधियों के साथमिल कर उपचार को और कारगर बनाती हैं, वह फिलहाल चूरू के राजकीय चिकित्सालय में मौजूद नहीं हैं। हालांकि, इन सबके बावजूद यहां मौजूद चिकित्सकों और उनके गिनती के मौजूद चंद सहायकों का जज्बा ही कहा जाएगा कि वे किसी न किसी तरह से पंचकर्म जैसी इलाज पद्धति को भी यहां पर जीवित रखे हुए हैं।

बिना मसाजर पंचकर्म
जानकारी के मुताबिक, करीब 11 महीनों से आयुर्वेद विभाग में मसाजर (मालिश करने वाला) नहीं है। बताया जाता है कि एक एनजीओ के माध्यम से पहले 36 मसाजर यानी मालिश करने वाले पूरे प्रदेश के 33 जिलों में लगाए गए थे। इनमें जयपुर और जोधपुर में दो-दो मसाजर शामिल हैं। चूरू के हिस्से में भी एक मसाजर आया था, जिसके चलते यहां पर पंचकर्म का लाभ लेने वाले मरीजों की संख्या उन दिनों उल्लेखनीय रूप से बढ़ी थी। उन्हीं दिनों में आयुर्वेद चिकित्सालयों में, जहां पंचकर्म की सुविधा थी, वहां विभाग की ओर से काठ के व बिजली से चलने वाले विभिन्न उपकरण भी भेजे गए। यह और बात है कि उन उपकरणों को संचालित करने के बारे में न तो कभी कोई ट्रेनिंग देने आया और न ही पारंपरिक रूप से पंचकर्म पद्धति से इलाज करने वाले डॉक्टरों/सहायकों ने उन्हें छुआ। नतीजे में लाखों के उपरकरण यहां कोने में पड़े शोभा बढ़ा रहे हैं।

अब भी आता है एक मसाजर, लेकिन...
जानकारी के मुताबिक, एनजीओ से आने वाले मसाजरों को 6 100 रुपए प्रतिमाह के हिसाब से भुगतान होता था। पहले भी उनका भुगतान कई महीनों तक अटका रहा था और एक साथकई महीनों का भुगतान मिला था। लेकिन बताया जाता है कि गत 11 महीने से मसाजर को लेकर स्थिति अनिश्चित बनी हुई है। चूरू के उपनिदेशक, आयुर्वेद डॉ. अनिल मिश्रा की मानें, तो गत वर्ष मार्च में एनजीओ से मसाजर के रूप में मैन पॉवर उपलब्ध कराने का करार पूर्ण हो जाने के बाद सरकार की ओर से कोई नया आदेश नहीं आया, लिहाजा अब यहां पर कोई मसाजर नहीं है। हालांकि, हकीकत यह है कि यहां पर पूर्व में एनजीओ की ओर से उपलब्ध कराया गया मसाजर अब भी बदस्तूर आ रहा है। उसे उम्मीद है कि जैसे पहले एकमुश्त कई महीनों का भुगतान उसे एकसाथमिला था, वैसा ही इस बार भी होगा। हालांकि, यह और बात है कि उसके भुगतान को लेकर छाया संकट इस रूप में और गहरा हो गया है कि तकनीकी तौर पर एनजीओ का इस संबंध में सरकार से किया गया करार खत्म हो चुका है। बहरहाल, डीबीएच में अब भी पंचकर्म के तहत मालिश, भाप और शिरोधारा के चलते इलाज हो रहा है, यह भी एक सुखद अहसास है, क्योंकि यहां पर तकनीकी रूप से पंचकर्म में महज एक कार्मिक तैनात है और वह खुद एक आयुर्वेद चिकित्सक ही हैं।

इतने कर्मी हों, तो चले पंचकर्म
जानकारी के मुताबिक, डीबीएच स्थिति आयुर्वेद चिकित्साल में पंचकर्म की इच्छा को लेकर आने वाले मरीजों की तादाद काफी होती है, लेकिन कुछ-एक को ही पंचकर्म के कुछ उपचारों का लाभ मिल पाता है। उसकी वजह महज कार्मिक के रूप में महज एक चिकित्सक का मौजूद होना है। देखा जाए, तो यहां दो पुरुष और दो महिला मसाजरों की जरूरत है। इसके अलावा एक कंपाउंडर, दो परिचारक हों, तो पंचकर्म उपचार की सुविधा गति पकड़ जाए। गौरतलब है कि मसाजर यानी मालिश करने वाले को ही प्रशिक्षित करके उन्हें पंचकर्म के उपकरण संचालित करने के लायक बनाया जा सकता है। गत वर्ष जून माह तक डीबीएच हॉस्पिटल परिसर स्थित आयुर्वेद चिकित्सालय में एक चिकित्सक के अलावा एक कंपाउंडर, एक महिला परिचारक और एक मसाजर (फरवरी 2019) तक औपचारिक रूप से तैनात था। लेकिन अब यहां तकनीकी तौर पर देखें, तो महज एक चिकित्सक ही तैनात है, जिसके जिम्मे पंचकर्म इकाई का सारा कार्यभार है।

उपकरण, जो उपयोग में नहीं आ रहे
कार्मिकों की कमी के कारण बिजली से चलने वाली सर्वांगधारा मशीन और अवगाहन मशीन काम में नहीं ली जा रही। जानकारी के मुताबिक, इसमें से अवगाहन मशीन तो जब से आई है, तभी से वैसे ही पड़ी है, यहां आने के बाद से उसे संचालित करने की विधि बताने तक कोई नहीं आया। विद्युत संचालित होने से अनहोनी की आशंका में चिकित्सकों ने इससे परहेज करते हुए पारंपरिक तरीके यानी काठ के उपकरणों से ही इलाज जारी रखा।

Brijesh Singh Desk
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