लिजर्डस के लिए तालछापर आते हैं शिकारी पक्षी

जिले के पश्चिमी छोर पर स्थित एशिया प्रसिद्ध तालछापर कृष्ण मृग अभ्यारण्य की पहचान बतौर काले हरिणों व पक्षियों के तो है ही। इसकी खासियत ये है कि यहां पर कई प्रजातियों के सरीसृप बसते हैं।

By: Madhusudan Sharma

Published: 12 Jul 2021, 10:22 AM IST

अजय स्वामी
चूरू. जिले के पश्चिमी छोर पर स्थित एशिया प्रसिद्ध तालछापर कृष्ण मृग अभ्यारण्य की पहचान बतौर काले हरिणों व पक्षियों के तो है ही। इसकी खासियत ये है कि यहां पर कई प्रजातियों के सरीसृप बसते हैं। अभयारण्य में छिपकली परिवार के स्पाइनी टेल्ड लिजर्ड, डेजर्ट मॉनीटर लिजर्ड व बंगाल मॉनीटर लिजर्ड पाए जाते हैं। यही वजह है कि इनके शिकार के लिए कई देशों के शिकारी पक्षी तालछापर अभयारण्य आते हैं। इनके अलावा कोबरा, धामण, वाइपर व करैत सांपों की प्रजातियां यहां देखने को मिलती है। करीब 780 हैक्टेयर में फैले अभयारण्य में मॉनीटर लिजर्ड (पाटा गोह) व स्पाइनीटेल्ड लिजर्ड (सांडा) बड़ी संख्या में है, जबकि मरूस्थलीय भू भाग में (डेजर्ट मॉनीटर लिजर्ड) चंदन गोह इंसानों द्वारा चमड़े के लिए अंधाधुंध शिकार किए जाने के चलते अब केवल सौ के करीब शेष बची हैं। अभयारण्य में अपने पसंदीदा भोजन के लिए भारत के ऊपरी हिस्सों हिमालय के तराई व मैदानी भागों सहित अमेरिका, यूरोप, चीन, भूटान, नेपाल व अफगानिस्तान आदि देशों से शिकारी पक्षी साल भर यहां जुटेे रहते हैं।
ये पक्षी बनाते हैं इन्हें अपना भोजन
मौसम के हिसाब से यहां आने वाले सैलानी व लोकल रेजीडेंट पक्षी गोह व सांडा को अपना भोजन बनाते हैं।
जिसमें वहाइट आई बजर्ड, स्टेपी इगल, मार्स हैरियर, शिकरा, टॉनी इगल, लेगर फॉल्कन, रेड नेक्ड फॉल्कन, पेल हैरियर, इस्र्टन इंपीरियल इगल, व्हाइट टेल्ड इगल, बॉनेलीज इगल, शॉर्ट टेल्ड इगल, लोंग लेगड बजर्ड सहित कई पक्षी इन्हें अपना भोजन बनाते हैंं। उन्होंनेे बताया कि इनका शिकार गैरकानूनी है। इन्हें वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के शैड्यूल 2 में संरक्षित प्राणी घोषित किया गया है। इनका शिकार करने पर 3 साल की सजा का प्रावधान है और यह गैर जमानती अपराध है।
खतरे की कगार पर है डेजर्ट मॉनीटर लिजर्ड
चमड़े के लिए अंधाधुंध शिकार के कारण मॉनीटर लिजर्ड अब खतरे की कगार पर पहुंच गई है। स्टेट वाइल्ड लाईफ बोर्ड के सदस्य सूरतसिंह पूनिया ने बताया कि चंदन गोह यानि कि डेजर्ट मॉनीटर लिजर्ड की संख्या महज सौ के आसपास रह गई है। सुंदर चमड़ा इनके शिकार की मुख्य वजह है, जिससे पर्स, जूते व बेल्ट बनाए जाते हैं। सांडे के शिकार का कारण इसमें पाई जाने वाली वसा है, जिसे यौनवर्धक व दर्द निवारक माना जाता है। सड़क के किनारों पर बैठने वाले नीम हकीमों द्वारा इसके तेल से यौनशक्ति बढ़ाने व दर्द से राहत का दावा किया जाता है, जो कि बिल्कुल गलत है।
छिपकलियों को रास आते हैं नमभूमि वाले मैदान
भरपूर मांसल शरीर व खूबसूरत चमड़ी वाले इन सरीसृपों को अभयारण्य के नम भूमि वाले घास के मैदान भाते हैं। शर्मिले स्वभाव के ये जीव जमीन में अपने बिल बनाकर रहते हैं। अभयारण्य में कई तरह की घास पाई जाती है, जिसके चलते कीट- पतंगों की भरमार रहती है। भोजन की प्रचुरता व सुरक्षित आवास के चलते गोह व सांडा यहां पर विचरण करते हैं। स्पइनीटेल्ड लिजर्ड (सांडा) शर्मिले स्वभाव का है,अपने बिल से Óयादा दूर नहीं जाता। बिल से बाहर धूप सेवन व भोजन के लिए निकलते ही शिकारी पक्षी इसे अपना भोजन बना लेते हैं। वहीं मॉनीटर लिजर्ड यानी कि गोह भोजन की तलाश में बिल से बाहर आती है तो शिकारी पक्षी इस पर टूट पड़ते हैं। प्रोटीन और मांस से भरपूर ये जीव पक्षियों के पसंदीदा शिकार हैं।
इनमें जहर नहीं होता
बंगाल मॉनीटर लिजर्ड ( पाटा गोह), डेजर्ट मॉनीटर लिजर्ड (चंदन गोह) और स्पाइनी टेल्ड लिजर्ड ( सांडा ) में जहर की बात भ्रांति है। वन विभाग में फोरेस्टर योगेंद्रसिंह ने बताया कि गोह व सांडे में जहर नहीं होता। दरअसल लिजर्ड परिवार के ये सदस्य वातावरण को समझने के लिए बिना मुंह खोले सांप के जैसे अपनी लंबी दो धारी जीभ बाहर निकालते रहते हैं, इसकी वजह से आमतौर पर लोग इन्हें जहरीला समझते हैं। उन्होंने बताया कि ये जंगल के सफाईकर्मी होते हैं। इनकी लार में घातक बेक्टिरिया होते हैं जो कि मृत पशुओं के मांस को सड़ा देते हैं। इसके बाद ये सड़े - गले मांस को चटकर जंगल के वातावरण को साफ करते हैं। वहीं सांडा घास व उसमें पाए जाने वाले कीड़े - मकोड़ों को खाकर अपनी भूख मिटाता है।

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Madhusudan Sharma Bureau Incharge
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