मौसम की नमी से बढ़ सकते हैं कोरोना के मामले

मानसून सीजन कोरोना संक्रमण से जूझ रहे मानव समाज के लिए दोहरी परेशानी लेकर आता दिखाई दे रहा है। मई के पहले सप्ताह से प्रवासियों की आमद के साथही चूरू में कोरोना संक्रमितों की तादाद में जहां गुणात्मक वृद्धि देखी गई, वहीं इनके ठीक होने की रफ्तार उतनी ही धीमी पड़ती जा रही है।

By: Madhusudan Sharma

Published: 14 Jun 2020, 10:35 AM IST

बृजेशसिंह
चूरू. मानसून सीजन कोरोना संक्रमण से जूझ रहे मानव समाज के लिए दोहरी परेशानी लेकर आता दिखाई दे रहा है। मई के पहले सप्ताह से प्रवासियों की आमद के साथही चूरू में कोरोना संक्रमितों की तादाद में जहां गुणात्मक वृद्धि देखी गई, वहीं इनके ठीक होने की रफ्तार उतनी ही धीमी पड़ती जा रही है। आंकड़ों के हवाले से देखें, तो पहले जहां मरीजों को ठीक होने में तीन से पांच दिन ही लग रहा था, वहीं अब कोरोना संक्रमित मरीजों को ठीक होने में 7 से 10 दिन तक का समय लग जा रहा है। कुछ मामलों में तो यह 15 दिन को भी पार करता दिखाई दे रहा है। चिकित्सा विशेषज्ञ भी वायरस के इस रूप को देख कर हैरत में हैं। इतना ही नहीं, पहले जहां असिम्टोमैटिक यानी अलाक्षणिक (जिनमें लक्षण न दिख रहे हों) मरीजों की बहुतायत थी। इक्का-दुक्का मरीजों में ही लक्षण दिखाई दे रहे थे, वहीं एक जून के बाद से न सिर्फ मरीजों की तादाद में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हुई है, बल्कि उनमें लक्षणों के दिखने की भी पुष्टि हुई है। हालांकि, विशेषज्ञों की राय इस बात पर बंटी हुई है कि मानसून में कोरोना का प्रभाव बढ़ सकता है अथवा कम होगा, लेकिन सभी इस तथ्य पर एकराय हैं कि यह मौसम बैक्टीरियल और वायरल संक्रमण के लिहाज से सबसे ज्यादा मुफीद होता है। लिहाजा, हमारे-आपके लिए बेहतर यही रहेगा कि सभी लोग लॉकडाउन जैसे नियमों का ही पालन करें। मास्क, सैनेटाइजर और सोशल डिस्टेंसिंग की पालना करते रहें।
मुंबई की आद्र्रता और संक्रमण को नजरंदाज करना समझदारी नहीं
चिकित्सा क्षेत्र में पिछले 32 साल से सक्रिय वरिष्ठ फिजीशियन और पीडीयू मेडिकल कॉलेज के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. एफ.एच. गौरी इस तथ्य से इनकार नहीं करते कि कोविड-19 के बारे में कोई भी तथ्य सर्वमान्य नहीं पाया गया है। लिहाजा, स्पष्टत: तो कुछकहा नहीं जा सकता, लेकिन मुंबई के पूरे साल आद्र्रतायुक्त मौसम और वहां कोरोना के स्ट्रेन की मौजूदा परिस्थिति को नकारना समझदारी नहीं होगी। वे फिर दोहराते हैं कि यूं तो कोई सीधा सा साम्य मुंबई और चूरू में नजर नहीं आता, लेकिन इतना जरूर है कि मानसून के मौसम में चूरू का आद्र्रता स्तर भी कुछ-कुछ मुंबई जैसा ही रहता है। डीबीएच की मेडिसिन यूनिट-तीन में कोरोना मरीजों की देखभाल में भी संलग्न डॉ. गौरी के मुताबिक मुंबई से चूरू आने वाले प्रवासियों में खासतौर से यह बात देखी जा रही है कि उनके ठीक होने में औसतन समय अधिक लग रहा है। पहले जहां तीन से पांच दिन में कोरोना मरीज ठीक हो जाते थे, तो अब तो कुछ मामले तो बेहद हैरान भी कर रहे हैं। श्वसन रोगियों की सतर्कता की जरूरत डॉ. गौरी भी बताते हैं। उनका कहना है कि ठंड और नमी का मौसम आमतौर पर वायरस के अनुकूल होता ही है और यह तथ्य कोरोना पर भी लागू है। उदाहरण देकर वे समझाते हैं कि जिस प्रकार साधारण जुकाम के मामलों में भी मानसून के दौरान वायरस की सक्रियता देखने को मिलती है, कोरोना संक्रमण उससे ज्यादा जुदा दिखाई नहीं देता। नमी के मौसम में ड्रॉपलेट इन्फेक्शन बढ़ता है, इस तथ्य से कोई इनकार नहीं कर सकता। एक तथ्य की ओर वे और ध्यान दिलाते हैं। कहते हैं कि इस मौसम में वायरस शरीर और कपड़ों की सतह पर शुष्क और गर्म मौसम की अपेक्षा डेढ़ या दोगुने समय तक मौजूद रह सकते हैं, जो संक्रमण फैलाने के लिहाज से घातक है।
टेस्टिंग-ट्रेसिंग और आईसोलेशन ही उपाय
चूरू मेडिकल कॉलेज के कम्युनिटी मेडिसिन डिपार्टमेंट के प्रभारी और महामारी पर काम कर रहे प्रो. राजेश कुमार सिंह तापमान में उतार-चढ़ाव अथवा नमी के मौसम में कोरोना संक्रमण के मामलों के बढऩे अथवा घटने की किसी भी संभावना या थ्योरी से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि इस वायरस के बारे में जानकारी अब भी बहुत सीमित रूप में ही मौजूद है। यह आम वायरस के नेचर से भी मेल नहीं खाता। पहले कहा जाता था कि गर्मी बढऩे पर वायरस का असर कम होगा, लेकिन मई गया, जून भी आधा निकल रहा है, वायरस तो तूफानी गति से फैलाव ले रहा है। डॉ. राजेश के मुताबिक मौसम को लेकर कोरोना संक्रमण के मामले में कोई एविडेंस अब तक मौजूद नहीं है। जहां तक कोरोना संक्रमण के नमी से जुड़ाव की बात है, तो नमी का कोई फर्क नहीं पड़ता, अब तक का अध्ययन तो यही कहता है। इसकी वजह यह है कि वायरस तो शरीर के अंदर होता है, जहां उसका भी तापमान शरीर के तापमान के बराबर यानी 37 डिग्री होता है। हालांकि, वर्षाकाल में सावधानी बरतनी पड़ेगी, इस तथ्य से किसी को इनकार नहीं है, क्योंकि यह समय वायरल और बैक्टीरियल संक्रमण दोनों के मुफीद होता है। वे इस मौसम में लोगों से कम्युनिटी लेवल पर ज्यादा सतर्क होने की अपील करते हैं। साथही सरकार से भी उनकी अपेक्षा है कि टेस्टिंग, ट्रेसिंग और आईसोलेशन के फार्मूले पर न सिर्फ अमल होगा, बल्कि इसकी सुविधा और बढ़ाई जाएगी। उनका मानना है कि नमी या शुष्क मौसम से कोई उम्मीद या आशंका करने के बजाय लोगों को ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है।

चुनौतियां बढ़ेंगी...सांस संबंधी दिक्कतों वाले मरीज रहें सावधान
पीडीयू मेडिकल कॉलेज के सहायक आचार्य और डीबीएच चिकित्सालय की मेडिकल यूनिट-दो के प्रभारी डॉ. दीपक चौधरी का मानना है कि मानसून का सीजन चुनौतियों भरा हो सकता है। डॉ. दीपक बताते हैं कि पिछले एक जून के बाद से कोरोना संक्रमित मरीजों की आमद तो बढ़ी ही है, लेकिन साथही उनमें लक्षण भी नजर आने लगे हैं, जो कि पहले नहीं आते थे। काबिलेगौर है कि कोरोना संक्रमित लाक्षणिक मरीजों में निमोनिया जैसे ही संक्रमण दिखते हैं। पिछले 12-13 दिनों से निमोनिया के मरीज बढऩे शुरू हो गए हैं। डॉ. दीपक के मुताबिक हम ऐसे मरीजों की कोरोना जांच करा रहे हैं, लेकिन तथ्य यह नहीं है। तथ्य यह है कि नमी का मौसम खासतौर से श्वसन संबंधी बीमारियों से पीडि़त मरीजों के लिए कोरोना के संदर्भ में ज्यादा चिंतित करने वाला हो सकता है। डॉ. दीपक के मुताबिक साधारण भाषा में कहें तो वातावरण में नमी के कारण कफ बाहर निकल नहीं पाता, तो स्वाभाविक रूप से इन्फे क्शन की संभावना बढ़ जाती है। तापमान में 24 घंटे के भीतर 10-10 डिग्री का अंतर भी इन्फेक्शन के ही मुफीद है। लिहाजा, जितने भी इम्युनोकंप्रोमाइज्ड पेशेंट (प्रतिरोधक क्षमता में कमी वाले मरीज) हैं, उन्हें इस मौसम में खास सावधानी बरतने की जरूरत है। डॉ. दीपक के मुताबिक, पिछले कुछदिनों में वायरस के निगेटिव होने की समय सीमा बढ़ रही है। यानी ट्रेंड बदल रहा है। पहले जहां तीन से पांच दिनों में वायरस रिपोर्ट निगेटिव आ जाती थी, अब 10 दिन तक या उससे ज्यादा भी लग रहे हैं। मरीजों के एक्सरे कराने पर पैचे•ा (धब्बे) नजर आने लगे हैं, जो पहले क्लीयर होते थे।

Madhusudan Sharma Bureau Incharge
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